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अहंकार के कारण भाजपा के हाथ से जा सकते हैं दो राज्य

Maharashtra aur Haryana chunav: वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष के एलायंस को घमंडिया एलायंस कहते हैं, लेकिन असल में घमंड भाजपा के नेतृत्व को था, जिसने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे से और पंजाब में अकाली दल से एलायंस नहीं होने दिया, और हरियाणा में एलायंस तोड़ लिया| इन तीनों ही राज्यों में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है|

महाराष्ट्र, बिहार और पंजाब तीन ऐसे राज्य थे, जहां एनडीए की जड़ें सबसे ज्यादा गहरी थीं| महाराष्ट्र में प्रमोद महाजन को बाला साहेब ठाकरे से गठबंधन करवाने, पंजाब में कृष्ण लाल शर्मा को प्रकाश सिंह बादल से गठबंधन करवाने, बाद में मदन लाल खुराना को गठबंधन पक्का करवाने और बिहार में जार्ज फर्नाडिस- नीतीश कुमार से गठबंधन करवाने में सीधे अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी की भूमिका थी| बिहार में जब तक जार्ज फर्नाडिस के हाथ में समता पार्टी और जेडीयू की बागडोर थी भाजपा से अटूट रिश्ता बना रहा|

Maharashtra aur Haryana chunav

भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा नेतृत्व ने 2019 लोकसभा चुनाव में 303 सीटें जीतने के बाद अपने सबसे पुराने सहयोगियों शिवसेना, जेडीयू और अकाली दल को कमजोर करने की जिस रणनीति पर काम करना शुरू किया था, उस रणनीति से भाजपा ने खुद को और तीनों कांग्रेस विरोधी दलों को भी नुकसान पहुंचाया, जबकि कांग्रेस को फायदा पहुंचाया| महाराष्ट्र, बिहार और पंजाब, इन तीनों ही राज्यों में भाजपा की सीटें घट गईं और कांग्रेस की सीटें बढ़ गई|

महाराष्ट्र में भाजपा 23 से 9 पर आ गई, बिहार में 17 से 12 पर आ गई और पंजाब में पिछली बार जीती हुई दोनों सीटें हार गई| 21 सीटों का नुकसान तो इन तीन राज्यों में ही हो गया| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक रतन शारदा ने आर्गेनाईजर में लिखे लेख में भाजपा के अजीत पवार के साथ गठबंधन पर सवाल उठाए हैं| हालांकि अजीत पवार को सीट शेयरिंग में सिर्फ चार सीटें लड़ने को दी गई थी, जिनमें से एक सीट शिरूर पर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के शिवाजी राव और एक अन्य परभनी सीट पर आरएसपी के महादेव जनकर को उम्मीदवार बनाया गया था|

Maharashtra aur Haryana chunav

लेकिन बात यह नहीं है कि एनसीपी ने रायगढ़ और बारामती में ही अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से वह एक सीट जीत गई| बात यह है कि अजीत पवार को साथ लेने और उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाए जाने से संघ और भाजपा का काडर इतना खफा था कि उसने भाजपा से मुंह मोड़ लिया और भाजपा 23 से 9 पर आ गिरी| शिंदे और अजीत पवार के साथ भाजपा ने 29 सीटें लड़ कर सिर्फ 9 सीटें जीती थी, जबकि 2019 में उद्धव ठाकरे के साथ चुनाव लड़कर 24 में से 23 सीटें जीती थी| उद्धव ठाकरे ने भी भाजपा के साथ गठबंधन में 23 सीटें लड़कर 18 जीती थी|

भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने इस रणनीति के तहत शिवसेना से गठबंधन तोड़ दिया था कि पहले उसे महाराष्ट्र में शिवसेना की जरूरत थी, लेकिन अब वह खुद सक्षम हो गई है| उसकी रणनीति यह थी कि बाला साहेब ठाकरे के रहते मुम्बई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों का जो हिंदू वोटर शिवसेना के साथ था, वह मोदी और अमित शाह के कारण भाजपा के साथ आ जाएगा और भाजपा को शिवसेना की जरूरत ही नहीं रहेगी|

भाजपा ने मुख्यमंत्री पद की मांग पर अड़े उद्धव ठाकरे को कांग्रेस एनसीपी के साथ जाने दिया| नतीजा सामने है, शिवसेना टूट कर भी उसके दोनों दल 16 सीटें जीत गए (उद्धव ठाकरे 9 सीटें, एकनाथ शिंदे 7 सीटें) जबकि भाजपा 23 से 9 पर आ गई| उद्धव ठाकरे के साथ रहने से जो फायदा भाजपा को होना था वह कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) को हो गया| कांग्रेस एक सीट के मुकाबले 13 जीत गई और एनसीपी (शरद पवार) 4 के मुकाबले आठ जीत गई| एनसीपी टूट कर भी दोनों गुट 9 सीटें जीत गए|

भाजपा को उत्तर प्रदेश के बाद जहां सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, वह महाराष्ट्र है| अब जरूरत मंथन और गलती सुधारने की है| भाजपा विधानसभा चुनावों से पहले क्या गलती सुधारती है, या नहीं सुधारती है, यह वक्त बताएगा| अगर भाजपा गलती नहीं सुधारती तो दस साल बाद महाराष्ट्र में अगला मुख्यमंत्री कांग्रेस का होगा|

बिहार वह राज्य हैं, जहां भाजपा महाराष्ट्र की तरह अपने सहयोगी जेडीयू को लगातार कमजोर करके खुद का मुख्यमंत्री बनाने की रणनीति पर चल रही थी| जिससे नाराज हो कर नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़ गए थे| यह तो भाजपा के लिए अच्छा हुआ कि कांग्रेस ने उन्हें उतना महत्व नहीं दिया, जितनी वह अपेक्षा कर रहे थे, इसलिए वह वापस भाजपा के साथ आ गए|

भाजपा ने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को भी अपने साथ लेकर ठीक समय पर अपनी गलती सुधार ली, इसके बावजूद जेडीयू से ज्यादा नुकसान भाजपा को हुआ है| भाजपा पिछली बार की जीती हुई पांच सीटें हार गई, जबकि जेडीयू 17 की बजाए 16 सीटें लड़ कर भी 12 सीटें जीत गई| भाजपा बिहार में जो सपना ले रही थी, उसे 2024 के नतीजों से सबक लेना चाहिए| वह बिना नीतीश कुमार को साथ लिए बिहार में सत्ता में नहीं आ सकती|

पंजाब में पिछली बार भाजपा-अकाली मिल कर चुनाव लड़े थे| अकाली दल के खिलाफ वातावरण का खामियाजा दोनों दलों को भुगतना पड़ा था| भाजपा तीन में से दो सीटें जीत गई थी, जबकि अकाली दल दस सीटें लड़ कर भी दो ही जीत पाया था| बाद में कृषि कानूनों के कारण अकाली दल एनडीए छोड़ गया था| दोनों दलों को विधानसभा में भारी नुकसान उठाना पड़ा|

इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के भाजपा के साथ आने से भाजपा की ताकत बढी है| इसलिए भाजपा ने अकाली दल से आधी सीटों की मांग रखी थी, जिस पर सुखबीर सिंह बादल सहमत नहीं हुए और दोनों पार्टियों ने सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ा| अकाली दल तो एक सीट जीत गया, लेकिन भाजपा एक भी नहीं जीत पाई|

अगर दोनों दलों ने मिल कर चुनाव लड़ा होता, तो भाजपा-अकाली दल गठबंधन कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का सूपड़ा साफ़ कर सकते थे| क्योंकि चुनावों में भाजपा को 25 लाख 877 वोट मिले हैं और अकाली दल को 18 लाख 8 हजार 837 वोट मिले हैं| दोनों को कुल मिला कर 43 लाख 9 हजार 714 वोट मिले, जबकि 7 लोकसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस को 35 लाख 43 हजार 824 वोट मिले, तीन सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी को 35 लाख छह हजार 939 वोट मिले| अगर अकाली और भाजपा मिल कर लड़ते तो कांग्रेस भले ही एक-दो सीटें जीत जाती, आम आदमी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकती थी| पंजाब में हालांकि विधानसभा चुनाव अभी बहुत दूर हैं, लेकिन पंजाब में भी ज्यादा वोटों का घमंड छोड़ कर भाजपा को ले देकर गठबंधन में वापस जाना पड़ेगा|

हरियाणा में ठीक चुनाव से पहले भाजपा ने अपने गठबंधन की सहयोगी जेजेपी को सरकार से निकाल बाहर किया| हालांकि भाजपा ने पिछ्ला विधानसभा या लोकसभा चुनाव जेजेपी से मिलकर नहीं लड़ा था, लेकिन विधानसभा में बहुमत नहीं आने पर जेजेपी के साथ मिल कर सरकार बनाई थी| जहां एक तरफ विपक्ष भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रहा था, वहीं भाजपा ने अपने सहयोगी दल से सीट शेयरिंग करने के बजाए आख़िरी समय पर उन्हें सत्ता से ही निकाल फेंका, भले ही जेजेपी एक भी सीट नहीं जीत पाई, लेकिन उसने भाजपा को तो 10 से पांच सीट पर ला दिया| महाराष्ट्र की तरह हरियाणा विधानसभा के चुनाव भी इसी साल हैं| सामने कांग्रेस पहले से कहीं ज्यादा मजबूत खडी है, इसलिए भाजपा को गठबंधन वाली नई रणनीति से ही चुनाव लड़ना होगा, नहीं तो हरियाणा में भी मुख्यमंत्री कांग्रेस का होगा|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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