चुनाव परिणाम चाहे जो हो, प्रदेश भाजपा में बदलाव होना निश्चित
Madhya Pradesh BJP: 4 जून को जब लोकसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा हो रही होगी तो मध्य प्रदेश में मात्र लोकसभा प्रत्याशियों की क़िस्मत का फ़ैसला ही नहीं होगा वरन नई नवेली मोहन सरकार और प्रदेश भाजपा संगठन के भविष्य की राह भी तय होगी।
देश में बेहद मज़बूत भाजपा संगठन, 2003 से अब तक स्थाई सरकार (इसमें कमलनाथ के बतौर मुख्यमंत्री डेढ़ साल कम कर दें) के साथ ही संघ का विशाल ज़मीनी नेटवर्क, मध्य प्रदेश भाजपा का गढ़ बन चुका है। प्रदेश की 29 में से 28 लोकसभा सीटों पर वर्तमान में भाजपा काबिज है और इस बार कमनलनाथ के "दुर्ग" को ढहाने के लिए भी बिसात बिछाई गई है।

हालांकि यह इतना आसान भी नहीं दिखता। आसान तो दिग्विजय सिंह की राजगढ़, कांतिलाल भूरिया की रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट का गणित भी नहीं है किंतु प्रदेश नेतृत्व को भरोसा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़े गए चुनाव को वह जीत लेगी।
दरअसल, केंद्रीय नेतृत्व ने मध्य प्रदेश भाजपा संगठन के समक्ष सभी 29 लोकसभा सीटों को जीतने का लक्ष्य दिया है जिसे मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। तभी उन्होंने लंबे समय के लिए छिंदवाड़ा में ही डेरा जमा लिया था। इसके अलावा वे हर उस सीट पर पहुंचे जहां भाजपा की स्थिति कमजोर नजर आ रही थी। हालांकि पिछली बार से कम मतदान और महिलाओं के मत प्रतिशत में 10 फीसद की गिरावट भाजपा नेतृत्व को परेशान कर रही है।
2023 के विधानसभा चुनाव में "लाड़ली बहना" ने पार्टी को जो प्रचंड बहुमत दिया था, उसमें शिवराज सिंह चौहान की महिलाओं में लोकप्रियता भी एक बड़ा कारक थी। ऐसे में महिलाओं के मत प्रतिशत का घटना कहीं शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री न बनाने के फैसले का विरोध है? यह सवाल भी मोहन यादव सरकार को परेशान किए हुए हैं। इन सबके बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि प्रदेश में लोकसभा चुनाव परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आए तो मोहन सरकार सहित भाजपा संगठन में बदलाव होगा?
"पर्ची वाले सीएम" का दाग मोहन यादव का पीछा नहीं छोड़ रहा। जिस प्रकार शिवराज सिंह चौहान के बरक्स उनकी ताजपोशी हुई है उसका लिटमस टेस्ट है लोकसभा चुनाव जिसका परिणाम उनके सियासी कद को परिभाषित करेगा। प्रदेश की कुल जनसंख्या में उँगली पर गिने जाने वाले यादव समुदाय के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उत्तर प्रदेश, बिहार सहित हरियाणा के यादवों को साधने का जो उपक्रम केंद्रीय नेतृत्व ने रचा था, फिलहाल तो वह पूरा होता दिख नहीं रहा है।
बिहार में लालू परिवार और उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की राजनीतिक जड़ें इतनी गहरी हैं कि उज्जैन के मोहन को उन्हें हिला पाने में अभी समय लगेगा। इसके अलावा योगी की तर्ज पर शुरू हुई उनकी पारी पर नर्सिंग घोटाले से लेकर इंदौर नगर निगम घोटाले के दाग भी लग रहे हैं। दिग्विजय सिंह के जिस बिजली विहीन और गड्ढों वाली सड़क के युग को मुद्दा बनाकर भाजपा प्रदेश में सत्ता में आती रही है, वर्तमान में वैसा ही हाल प्रदेश में हो गया है।
प्रदेश की जनता शिवराज सिंह के कार्यकाल को याद करने लगी है। विपक्ष "लोकसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बदलेगा" के दिवास्वप्न देख रहा है। तो क्या वास्तव में प्रदेश में मुख्यमंत्री बदल जाएगा? यह इतना आसान भी नहीं दिखता। मोहन यादव को अभी मुख्यमंत्री बने 6 माह ही हुए हैं और किसी के लिए भी इतने कम समय में अपनी छाप छोड़ पाना कठिन है। वह भी ऐसे माहौल में जबकि 3 महीने से लगी आचार संहिता के चलते उन्हें काम करने का अवसर ही नहीं मिला है। फिर इसी वर्ष हरियाणा में विधानसभा चुनाव हैं तो अगले वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव हैं। फिर उत्तर प्रदेश में चुनाव होंगे और 2028 में उज्जैन में सिंहस्थ होना है।
निश्चित तौर पर केंद्रीय नेतृत्व मोहन यादव को अभी और अवसर देगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से उनकी नज़दीकी भी उनके पक्ष में जाती दिख रही है। इसके अलावा पूरा लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा गया है तो प्रदेश में हार-जीत भी मोदी के हिस्से आएगी। अतः वर्तमान और भविष्यगत राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए मोहन यादव की कुर्सी पर कोई खतरा नहीं दिखता है।
हां, पहले और दूसरे चरण के मत प्रतिशत के अप्रत्याशित रूप से घटने के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने भोपाल विमानतल पर मंत्रियों को चेतावनी भरे लहजे में समझाईश दी थी और विधायकों को मंत्री बनने के लिए मत प्रतिशत बढ़ाने की बात की थी। अब जबकि चार चरणों में प्रदेश में लोकसभा चुनाव समाप्त हो चुके हैं तो निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार करीब 90 प्रतिशत मंत्रियों के क्षेत्र में मत प्रतिशत पिछली बार की अपेक्षा घटा है और जिन विधायकों ने मंत्री बनने की आशा में अपने क्षेत्रों में मत प्रतिशत बढ़वाया है, उनके मंत्री बनने की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं।
इसके अलावा अभी मुख्यमंत्री के पास डेढ़ दर्जन मंत्रालयों का अतिरिक्त प्रभार है, जिसे कम करके नए मंत्री बनाए जा सकते हैं। कुछ मंत्रियों की कार्यशैली को लेकर संगठन नाखुश है और कई मंत्री सीधे केंद्रीय नेतृत्व की निगरानी में हैं। फिर सभी मंत्रियों को लोकसभा सीट वार प्रभारी बनाया गया था। जीत-हार के अलावा "मार्जिन" भी उनके मंत्रीपद की कसौटी को तौलेगा।
जहां तक प्रदेश भाजपा की बात है तो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा ने जिम्मेदारी मिलने के बाद कई बार अपनी संगठन क्षमताओं का लोहा मनवाया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व पदाधिकारी होने के चलते वे संघ के भी लाड़ले हैं। खजुराहो से सांसद होने के चलते उनके दिल्ली दरबार से भी मधुर संबंध हैं। हालाँकि उन्हें प्रदेश में अब लंबा समय हो गया है इसलिए प्रदेश अध्यक्ष पद पर नवीन नियुक्ति को लेकर चर्चाएँ चलने लगी हैं।
फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा स्वयं एक्सटेंशन पर चल रहे हैं और चुनाव परिणाम के बाद उनके भी भविष्य का फैसला होना है। ऐसे में मध्य प्रदेश में भी प्रदेश संगठन में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। कई पदाधिकारी लंबे समय से अपने पद पर जमे हैं जिन्हें बदला जाना निश्चित दिखाई दे रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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