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2024 Elections: लोकसभा के रण में उतारे जाएंगे राज्यसभा में रहे मंत्री

2024 Elections: लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भारतीय जनता पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में अपनाए गए मॉडल को लागू करेगी।

lok sabha election 2024 Ministers who were in Rajya Sabha fielded in Lok Sabha

जिस तरह विधानसभा चुनाव में लोकसभा सांसदों को मैदान में उतार दिया था, उसी तर्ज पर कई बड़े नेताओं और मंत्रियों को जो राज्यसभा से सांसद हैं, उनको लोकसभा चुनाव लड़वाया जाएगा।

दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने यह प्रयोग समिति स्तर पर किया था। इस बार 2024 के लोकसभा चुनाव में व्यापक स्तर पर इसका प्रयोग करना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी को लग रहा है कि मोदी की लोकप्रियता अपने चरम पर है और संगठन भी जमीनी स्तर पर मजबूत है, ऐसे में मोदी सरकार के मंत्री जो राज्यसभा से हैं, उनको लोकसभा चुनाव में उतार कर जीत हासिल की जा सकती है। मोदी और शाह भी चाहते हैं कि केन्द्रीय मंत्रियों की पहचान अब बन चुकी है, ऐसे में उनको लोकसभा चुनाव लड़ने का साहस करना चाहिए इससे उनकी खाली सीटों पर किसी अन्य को राज्यसभा भेजा जा सकेगा।

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा खुद राज्यसभा से हैं। ऐसे में उनके सामने भी चुनाव लड़ने की चुनौती होगी। हालांकि खुद जेपी नड्डा इस बात से इंकार कर रहे हैं लेकिन समझा जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी नड्डा से हिमाचल की किसी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कह सकते हैं। अगर भाजपा के अध्यक्ष लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी के अन्य राज्यसभा सांसदों को भी चुनाव लड़ने का नैतिक आधार बनेगा।

फिलहाल मोदी सरकार में 18 मंत्री राज्यसभा से हैं। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री और राज्यसभा सांसद धर्मेन्द्र प्रधान ने लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की है। धर्मेन्द्र प्रधान 2004 में उड़ीसा की देवगढ़ सीट से लोकसभा सांसद रह चुके हैं। इस सीट का परिसीमन होने के बाद इसे दो सीटों ढ़ेकानाल और संबलपुर में बांट दिया गया। इन दोनों सीटों में से किसी एक सीट से धर्मेंद्र प्रधान लोकसभा के उम्मीदवार हो सकते है।

मोदी और शाह के गृह राज्य गुजरात से भी मोदी के दो केन्द्रीय मंत्रियों के लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना है। केन्द्रीय स्वास्थ्य और उर्वरक मंत्री मनसुख मंडाविया को सौराष्ट्र से आने वाली राजकोट से लोकसभा चुनाव लड़ाया जा सकता है। सौराष्ट्र के अलावा मनसुख भाई मंडाविया के गृह क्षेत्र की सीट भावनगर से भी उम्मीदवार बनाने की चर्चा है। केन्द्रीय पशुपालन मंत्री पुरूषोत्तम रूपाला को गुजरात की अमरेली से भाजपा उम्मीदवार बना सकती है।

राजस्थान से भी राज्यसभा से आने वाले दो केन्द्रीय मंत्रियों को भाजपा चुनाव मैदान में उतार सकती है। केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ओडिसा कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं और राज्यसभा में भी उड़ीसा से ही हैं, लेकिन उनका गृह राज्य राजस्थान है। अश्विनी वैष्णव जयपुर से लोकसभा लड़ सकते हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि भाजपा हाईकमान अश्विनी वैष्णव को उड़ीसा की ही किसी सीट से मैदान में उतार दे।

राजस्थान से राज्यसभा सांसद और केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव को भी राजस्थान की अलवर सीट से लड़ाया जा सकता है। अलवर सीट से सांसद बाबा बालकनाथ विधायक बन चुके है। ऐसे में भूपेन्द्र यादव के अलवर सीट से लड़ने की प्रबल संभावना है। भूपेन्द्र यादव दिल्ली से सटी सीट गुरूग्राम से भी लड़ सकते हैं।

मोदी कैबिनेट में वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रही निर्मला सीतारामन को तमिलनाडु की मदुरै सीट से उतारा जा सकता है। खबर है कि निर्मला सीतारामन को उनकी पंसदीदा सीट बताने के लिए कहा गया है। तमिलनाडु से मोदी सरकार के विदेश मंत्री एस जयशंकर को भी पार्टी चुनाव पार्टी लड़वा सकती है। जयशंकर के माता पिता जरूर तमिलनाडु से हैं लेकिन उनका जन्म दिल्ली में और पढ़ाई भी दिल्ली में हुई है।

उल्लेखनीय है कि 2023 में मोदी सरकार के नौ साल पूरे होने पर भाजपा ने जो महाजनसंपर्क अभियान चलाया, उसमें जयशंकर को दिल्ली की चार लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी। ऐसे में संभावना है कि पार्टी विदेश मंत्री जयशंकर को दिल्ली की किसी सीट से मैदान में उतारे। संभावना है कि मीनाक्षी लेखी की सीट से भी जयशंकर को टिकट दिया जा सकता है।

मोदी सरकार के एक और मंत्री पीयूष गोयल के भी लोकसभा चुनाव लड़ने की पूरी संभावना है। 2010 से पीयूष गोयल लगातार राज्यसभा सांसद और 2014 से लगातार मोदी सरकार में मंत्री है। पीयूष गोयल को पुणे लोकसभा सीट से उतारा जा सकता है। पिछले पांच लोकसभा चुनाव की बात करें तो तीन चुनाव में भाजपा यहां से जीत रही है।

भाजपा ऐसे राज्यसभा सांसदों को भी लोकसभा चुनाव लड़ा सकती है जो मंत्री नहीं है लेकिन लोकसभा चुनाव लड़ने को उत्सुक है। इन राज्यसभा सांसदों में भाजपा के मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी उत्तराखंड से, पूर्व लोकसभा सांसद और वर्तमान में राज्यसभा सांसद सरोज पांडे और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी शामिल हैं।

2019 के लोकसभा चुनाव में भी कुल 11 राज्यसभा के सांसदों ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था जिनमें से सात को हार का सामना करना पड़ा। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गांधीनगर से, केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी अमेठी से, केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद पटना साहिब से जीते थे। वहीं पूर्व नौकरशाह और मोदी सरकार में राज्य मंत्री रहे हरदीप पुरी अमृतसर से हार गए थे और मोदी सरकार के एक और मंत्री केजे अल्फांस एनाकुर्लम सीट से तीसरे नंबर पर रहे थे।

भाजपा को लग रहा है कि अगर उसे 2019 में मिली 303 से अधिक सीटें जीतनी है तो विपक्ष की मजबूत सीटों पर भी दमदार उम्मीदवार खड़े करने होंगे। पार्टी का आकलन है कि जिन सीटों से केन्द्रीय मंत्री लड़ते हैं उसके आसपास की सीटों पर भी उसका असर पड़ता है। भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता का कहना है कि 'जब विपक्ष हर एक सीट पर एक साझा उम्मीदवार देने की तैयारी कर रहा हो तो ऐेसे में अगर भाजपा केन्द्र में मंत्री रहे राज्यसभा सांसद चुनाव मैदान में उतरते हैं तो इन विपक्षी नेताओं को उनकी सीटों पर चुनौती देने के मामले में भाजपा बेहतर स्थिति मे रहेगी।'

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी के भीतर एक व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया था, जिसके अंतर्गत लगातार दो बार राज्यसभा सांसद रहे नेताओं को तीसरी बार राज्यसभा नहीं भेजा जाए। मोदी ने कहा था कि कोई सांसद यह कहता है कि वह लगातार तीन बार से राज्यसभा का सासंद है तो इसका मतलब है कि पार्टी अन्य विकल्पों पर विचार नहीं कर रही है। मोदी का मानना है कि एक ही व्यक्ति को दो बार से अधिक राज्यसभा में भेजना यह दर्शाता है कि पार्टी की उस पर अत्याधिक निर्भरता है और वह व्यक्ति निर्भरता का पूरा लाभ ले रहा है। मोदी ने साफ कहा था कि पार्टी में ऐसी अपरिहार्य स्थिति किसी भी नेता को लेकर नहीं बननी चाहिए।

पार्टी की इसी लाईन को अमित शाह ने आगे बढ़ाते हुए राज्यसभा से सांसद और मोदी सरकार में मंत्रियों से दो टूक कह दिया है कि चुनाव लड़ने की तैयारी रखें और अपनी पंसद की सीट पार्टी नेतृत्व को अवगत करा दे। अगर आपके पास सीट का विकल्प नहीं है तो पार्टी आपके लिए उचित सीट उपलब्ध करा देगी। मोदी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में साफ कहा था कि कोई लोकसभा सीट न होना और जीतने की गारंटी न होना बार-बार राज्यसभा भेजने का आधार नहीं हो सकता है।

दरअसल मोदी का मानना है कि एक नेता के रूप में आप संगठन में बड़े पद पर रहें, किसी राज्य के चुनाव प्रभारी रहते प्रदेश के नेताओं को चुनाव जीतने की रणनीति भी बताएं, केन्द्र में मंत्री भी रहें लेकिन चुनाव लड़ने से तौबा करें और राज्यसभा सांसद बन कर मंत्री पद को सुभोशित करें, यह स्वीकार्य नहीं है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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