Congress Alliance: गठबंधन से कांग्रेस तो घाटे में ही रहेगी

Congress Alliance: समाजवादी पार्टी के बाद आम आदमी पार्टी के साथ भी कांग्रेस की सीट शेयरिंग हो गई है| अब बचा है महाराष्ट्र और पश्चिमी बंगाल| इन दोनों राज्यों में फिर से बातचीत शुरू हुई है, लेकिन जिस तरह की सीट शेयरिंग समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी से हुई है, उससे कांग्रेस में नए सिरे से भगदड़ मचने की आशंका पैदा हो गई है|

पश्चिम बंगाल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने धमकी दे दी है कि अगर ममता बनर्जी के साथ सिर्फ दो सीटों पर समझौता किया गया, तो वह कांग्रेस छोड़ देंगे| आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस की दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, गोवा और असम में सीट शेयरिंग हुई है| जबकि दिल्ली और पंजाब को छोड़कर आम आदमी पार्टी की कहीं कोई हैसियत नहीं थी|

lok sabha election

कांग्रेस को इंडी एलायंस टिके होने का एक मेसेज देना था, कांग्रेस की इस मजबूरी का अरविन्द केजरीवाल ने खूब फायदा उठाया| आम आदमी पहले भी कांग्रेस की कीमत पर दिल्ली और पंजाब में सत्ता में पहुंची है| और अब भी कांग्रेस की कीमत पर हरियाणा, गुजरात, गोवा और असम में पैर फैलाने की कोशिश कर रही है|

पंजाब और दिल्ली की तरह गुजरात और गोवा में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा कर ही राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल किया है| केजरीवाल को पता है कि हरियाणा, गुजरात, गोवा और असम में कांग्रेस को हरा कर भारतीय जनता पार्टी ने अपने पैर फैलाए हैं|

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केजरीवाल जानते हैं कि इन चारों ही राज्यों में कांग्रेस प्रमुख विपक्षी पार्टी है, और अगले विधानसभा चुनावों में वही भाजपा को चुनौती देगी| इसलिए केजरीवाल की रणनीति कांग्रेस की जमीन हथियाना है, ताकि अगले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के बजाए आम आदमी पार्टी सशक्त दावेदार बन कर उभर सके। ऐसी स्थिति में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को इन चारों राज्यों में अपनी कीमत पर घुसने की इजाजत देकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है|

कांग्रेस ने इन चारों ही राज्यों में वही गलती दोहराई है, जो गलती उसने 2013 में करके दिल्ली में केजरीवाल को समर्थन देकर उनकी सरकार बनवाई थी| इसके बाद हुए दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को उसका खामियाजा भुगतना पड़ा, कांग्रेस का दिल्ली में सूपड़ा ही साफ़ हो गया| दिल्ली की सत्ता का इस्तेमाल करके आम आदमी पार्टी ने पंजाब में भी अपनी जड़ें जमा ली और कांग्रेस का स्थान हासिल कर लिया|

अरविन्द केजरीवाल का लक्ष्य स्पष्ट है, कि वह कांग्रेस का स्थान ग्रहण करना चाहते हैं, ताकि भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के रूप में कांग्रेस को नहीं, आम आदमी पार्टी को देखा जाए| अरविन्द केजरीवाल ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा भी है कि 2024 में तो नहीं, लेकिन 2029 में आम आदमी पार्टी ही देश के सामने भाजपा का विकल्प बनेगी| इसका मतलब साफ़ है कि वह अगले पांच सालों में कांग्रेस का स्थान ग्रहण करने का लक्ष्य तय किए हुए हैं|

दूसरी तरफ कांग्रेस का हाईकमान दूरगामी सोच की बजाए तात्कालिक फायदे की उम्मीद में आम आदमी पार्टी के सामने झुक गया है और दिल्ली, पंजाब के अलावा भी चार राज्यों में उनकी दावेदारी को स्वीकार कर लिया है| जबकि हरियाणा, गुजरात, गोवा और असम में आम आदमी पार्टी का ऐसा कोई वोट बैंक नहीं है, जिसका 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को फायदा हो|

कांग्रेस का वर्कर इस बात को अच्छी तरह जानता है, इसलिए हरियाणा, गुजरात, गोवा और असम के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह सीट शेयरिंग रास नहीं आ रही| जैसे कांग्रेस ने गुजरात में आम आदमी पार्टी को भरूच की वह सीट दे दी है, जिस पर सोनिया गांधी के राजनीति सलाहकार रहे अहमद पटेल की बेटी मुमताज पटेल चुनाव लड़ने की योजना बना रही थी|

जैसे ही यह खबर आई कि कांग्रेस ने भरूच सीट गठबंधन में आम आदमी पार्टी को दे दी है, तो अहमद पटेल की बेटी और बेटे ने पब्लिकली नाराजगी का इजहार किया| बेटे ने तो साफ साफ़ कह दिया है कि वह कांग्रेस के इस फैसले का विरोध करते हैं| जबकि मुमताज पटेल ने कहा है कि उन्होंने राहुल गांधी से बात की है, वह भी इस फैसले से सहमत नहीं है और दुबारा से बातचीत हो रही है|

ठीक इसी तरह उत्तर प्रदेश में नेहरू की विरासत वाली फूलपुर और प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा बड़े नेता सलमान खुर्शीद की फरूखाबाद सीट भी समाजवादी पार्टी से नहीं ले सकी| सलमान खुर्शीद ने भी अहमद पटेल के परिवार की तरह इस पर सार्वजनिक तौर पर नाराजगी का इजहार किया है|

इसी तरह समाजवादी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई पूर्वी वर्मा के लिए लखीमपुर खीरी सीट भी अखिलेश यादव से नहीं ले पाई| जबकि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रवि वर्मा अपनी बेटी के राजनीतिक भविष्य के लिए खुद और अपनी बेटी को कांग्रेस में लेकर आए थे| सीट शेयरिंग में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के नेताओं की एक नहीं सुनी|

अलबत्ता इस बात पर हैरानी हुई कि कांग्रेस ने लखीमपुर खीरी, कुशीनगर, फूलपुर, फरूखाबाद, मेरठ, बलिया, बिजनौर पर ज्यादा जोर देने के बजाए वाराणसी पर ज्यादा जोर क्यों दिया| अगर प्रियंका गांधी या राहुल गांधी खुद वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चुनाव में खड़े नहीं होते हैं, तो वाराणसी सीट लेने का कांग्रेस को क्या फायदा होगा| इंडी एलायंस की एक मीटिंग में ममता बनर्जी ने सुझाव दिया था कि राहुल गांधी को वाराणसी में चुनाव लड़ना चाहिए| लेकिन राहुल गांधी ने जिस तरह वाराणसी के युवाओं को नशेड़ी कहा है, उससे उनके वाराणसी से चुनाव लड़ने के लक्षण तो दिखाई नहीं देते|

वाराणसी को छोड़कर कांग्रेस को दी जाने वाली बाकी सारी सीटें समाजवादी पार्टी ने खुद तय की, मजबूरी में कांग्रेस ने इसे जस का तस स्वीकार भी कर लिया| कांग्रेस ने 33 सीटों की सूची दी थी, समाजवादी पार्टी ने उस सूची में से सिर्फ 13 सीटें कांग्रेस को दी हैं। इनके अलावा समाजवादी पार्टी के लिए कमजोर इलाहाबाद, झांसी, बुलन्दशहर, गाजियाबाद कांग्रेस को जबरदस्ती थमा दी गई|

जो 17 सीटें कांग्रेस को मिली हैं, उनमें से अमेठी और रायबरेली को छोड़कर बाकी सभी सीटों पर पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जमानत जब्त हुई थी| कांग्रेस ने 2019 में 67 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से 63 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हुई थी|

बेशक उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से और पंजाब, दिल्ली, गुजरात, गोवा, असम में आम आदमी पार्टी से हुई सीट शेयरिंग से माहौल बना है कि इंडी एलायंस पटरी पर आ रहा है, लेकिन जमीन पर उसका कोई असर दिखाई नहीं दे रहा| कम सीटों पर चुनाव लड़ने का दूरगामी नुकसान कांग्रेस को ही होगा, एक तो उसका वोट प्रतिशत काफी घट जाएगा, दूसरे कांग्रेस की जमीन पूरी तरह खोखली हो जाएगी|

यह एक गलतफहमी है कि मोदी विरोधी मिलकर चुनाव लड़ेंगे, तो भाजपा को हराया जा सकता है| उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण हमारे सामने है| 2019 में बसपा को 19.43 प्रतिशत, सपा को 18.11 प्रतिशत और कांग्रेस को 6.36 प्रतिशत वोट मिले थे| इन तीनों को जोड़ दें, तो 43.90 प्रतिशत वोट बनता है, जबकि भाजपा को अकेले ही 49.98 प्रतिशत वोट मिले थे| हाँ, 2019 में सपा-बसपा के मिल कर लड़ने से भाजपा को दस सीटों का नुकसान हुआ था, लेकिन इस बार बसपा गठबंधन में शामिल नहीं है| उत्तर प्रदेश में बसपा की हैसियत कम से कम कांग्रेस से तो ज्यादा ही है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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