Opposition Unity: क्या विपक्षी एकता से भाजपा को हराया जा सकता है?

Opposition Unity: 'सभी क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो रही हैं, जो नहीं हुई हैं, वे भी जल्द खत्म हो जाएंगी। रहेगी तो सिर्फ भाजपा।' 30 जुलाई 2022 को बिहार की राजधानी पटना में जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने यह बात कही थी तो भाजपा अध्यक्ष नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी को इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि दस दिन बाद इसी बिहार में उनके सहयोगी नीतीश कुमार तमाम क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर बिहार की सत्ता से भाजपा को न सिर्फ बाहर कर देगें बल्कि पूरे देश में भाजपा विरोधी दलों को एकसाथ लाने की रणनीति बनाने के मुख्य वार्ताकार भी बन जाएंगे।

बिहार मे 9 अगस्त 2022 को भाजपा से संबंध तोड़ने की घोषणा और राजद, कांग्रेस के साथ बिहार में फिर से सरकार बनाने वाले नीतीश कुमार 2024 में मोदी को केन्द्र की राजनीति से बाहर करने के लिए पूरे देश में विपक्षी एकता यथासंभव विशाल गठबंधन खड़ा करने में दिनरात एक कर रहे है। अब इसी एकता को मूर्त रूप देने के लिए 23 जून को बिहार में विभिन्न दलों की बैठक आयोजित की है।

lok sabha election 2024 Can BJP be defeated by opposition unity?

नीतीश जिन दलों को जोड़ना चाहते हैं उनके बीच वैचारिक स्तर पर भारी मतभिन्नता को देखते हुए नीतीश के लिए यह बहुत बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य होने वाला है। नीतीश इसमें कितने सफल होते हैं, यह आने वाला समय बताएगा, लेकिन नीतीश की कोशिश से परेशान भाजपा ने मांझी की पार्टी के मंत्रियों को बिहार में नीतीश के मंत्रीमंडल से त्यागपत्र दिलवाकर यह जता दिया है कि नीतीश कितनी भी विपक्षी एकता की कोशिश कर लें, भाजपा उसमें दरार डालने का कोई मौका नहीं चूकेगी।

नीतीश के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी खेमे के ऐसे चार प्रमुख खिलाड़ियों को कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए तैयार करना है जिनके सबंध कांग्रेस से सहज नहीं है और कांग्रेस भी इन चार दलों को कंधो पर बिठाकर ढोने को तैयार नहीं है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) और के. चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) क्रमशः पश्चिम बंगाल, दिल्ली और पंजाब और तेलंगाना में सत्ता में हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में एक मजबूत विपक्षी ताकत हैं। इन पांच राज्यों में लोकसभा की कुल 159 सीटें हैं। यानी निचले सदन की कुल सीटों का लगभग 30 प्रतिशत। फिलहाल, उनमें से 94 यानी लगभग 60 प्रतिशत पर भाजपा का कब्जा है। नीतीश चाहते हैं कि इन पांच राज्यों में कांग्रेस और भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दल आपस में अतिरिक्त उदारता का परिचय दें जिससे भाजपा को 159 सीटों पर तगड़ा झटका दिया जा सके।

नीतीश के साथ साथ भाजपा विरोध के एक और दिग्गज नेता शरद पवार का भी मानना है कि इन राज्यों में भाजपा इसलिए इतनी सफल रही क्योंकि भाजपा विरोधी वोटों में विभाजन हो गया। नीतीश विपक्ष के सबसे बड़े दल कांग्रेस को यह समझाने में जुटे हैं कि कांग्रेस इन पांच राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं की संयुक्त ताकत को पहचाने और भाजपा को 2024 में फिर से सरकार बनाने से रोकने के लिए 'अब तक जितनी उदार' रही है उससे कहीं अधिक उदार होने के लिए अपना मन बनाए।

दो आम चुनावों में स्पष्ट बहुमत की सरकार बना चुकी और तीसरी बार 2024 में भी भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने की पूरी संभावना के बाद भी नीतीश को लगता है कि अगर विपक्ष एकता और समझदारी का परिचय दे तो मोदी को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से रोका जा सकता है। नीतीश का इसके पीछे गणित यह है कि 2019 के आम चुनाव में जब भाजपा ने 303 सीटें जीतीं, उनमें से 87 प्रतिशत सीटें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और हरियाणा से भाजपा के खाते में गई थीं। फिर भी इनमें से पांच राज्यों में विपक्षी दलों ने अपनी या सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकारें बनाई।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार का भी मानना है कि कांग्रेस के बिना संयुक्त विपक्षी मोर्चा सफल नहीं हो सकता। यह तय है कि बिना कांग्रेस के धुरी बने, एक व्यापक आधार वाला विपक्षी गठबंधन न आकार ले सकता है और न चुनावों में सफल हो सकता है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से रहता है। असम और हरियाणा में कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल है। पंश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र और झारखंड में भी कांग्रेस की महत्वपूर्ण उपस्थिति है। नीतीश जिस विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं उसमें कांग्रेस ही एकमात्र ऐसा दल है, जिसका वोट बैंक पूरे देश में है। आंकड़े भी इसको प्रमाणित करते हैं।

2019 के आम चुनाव में कांग्रेस ने 421 सीटों पर चुनाव लड़कर 52 सीटें जीती थी। जबकि भाजपा ने 437 सीटों पर चुनाव लड़कर 303 सीटें जीती थी। 2019 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को करीब 45% वोट मिले जिसमें 38 फीसदी वोट भाजपा के खाते में गया था। दूसरी ओर यूपीए को मिले 26 प्रतिशत वोट में कांग्रेस को लगभग 20 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। 29 प्रतिशत वोट ऐसे क्षेत्रीय दलों को मिले थे जो न एनडीए का हिस्सा थे और न यूपीए। इस तरह नीतीश कुमार की कोशिश भाजपा विरोधी उसी 55 प्रतिशत वोट को एकजुट करने की है, जिससे भाजपा को 2024 में सत्ता से बेदखल किया जा सके।

नीतीश और भाजपा विरोधी दल एकजुटता के लिए 23 जून को पटना में भले ही एकत्र होकर एक साथ हाथ उठाकर फोटो खिंचवा लें, लेकिन जमीनी धरातल पर वैचारिक रूप से बंटे दलों की महत्वकांक्षाओं को आपस में टकराने से रोकना बड़ी चुनौती होगी। विपक्षी एकता मेें सबसे बड़ी चुनौती ज्यादा से ज्यादा सीट पाने की चाहत को रोकना और एक सर्वस्वीकार उम्मीदवार पर सहमति बनाना है। विपक्षी एकता के सामने दूसरी बड़ी चुनौती मोदी के सामने प्रधानमंत्री का चेहरा तय करने की होगी। चुनाव के बाद विपक्ष का प्रधानमंत्री का चेहरा कौन होगा, इस पर भी सहमति बनना आसान नहीं होगा। विपक्ष के लिए यह भी तय करना आसान नहीं होगा कि लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में विपक्षी एकता में विभिन्न दलों के हितों को कैसे एडजस्ट किया जाएगा।

नीतीश के विपक्षी एकता के प्रयास में कांग्रेस कितने दूर तक साथ जाएंगी, यह देखने वाली बात होगी क्योंकि कांग्रेस का एक सीमा से ज्यादा उदार बनना कांग्रेस के लिए ही घातक होगा। कांग्रेस को इस बात का अहसास है कि क्षेत्रीय पार्टियों को जगह देने और कम सीटों पर चुनाव लड़ने से पहले से ही कमजोर कांग्रेस और कमजोर हो जाएगी। कांग्रेस के राज्य स्तरीय नेता भी एक सीमा से ज्यादा इसे स्वीकार नहीं करेगे क्योंकि उन्हें अपनी प्रासंगिकता खोने का डर होगा। केन्द्र के नेता भी इस बात से वाफिक हैं कि एक बार जमीन छूट गयी तो उत्तर प्रदेश की तरह फिर से उसे हासिल करना बहुत कठिन हो जाएगा।

नीतीश कुमार को छह लोकसभा कार्यकाल के साथ 17 साल से मुख्यमंत्री बने रहने का अनुभव है। वो भी इतना जरूर समझते होंगे कि भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस से ज्यादा उदार बनने के लिए राजी करना आसान नहीं होगा। फिलहाल विपक्षी एकता का यह भागीरथ प्रयास कहां तक जाता है, आनेवाले दिनों में और स्पष्ट हो जाएगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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