BJP: भाजपा की एकला चलो रणनीति से तीन और राज्यों में कामयाबी का रास्ता
BJP: भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में पहली बार तमिलनाडु, हरियाणा और बिहार में अकेले चुनाव लड़ा था| उससे पहले इन तीनों ही राज्यों में गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा करती थी|
बिहार में वह जेडीयू की जूनियर पार्टनर थी, हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल की जूनियर पार्टनर थी और तमिलनाडु में कभी अन्नाद्रमुक और कभी द्रमुक की जूनियर पार्टनर बन कर चुनाव लडती थी|

2014 में भाजपा ने ओम प्रकाश चौटाला की इनलो से गठबंधन तोड़ कर हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ मिल कर लोकसभा चुनाव लड़ा था| जिससे भाजपा तो दस में से सात सीटें जीत गई, लेकिन इनलो दो सीटों पर रूक गई| 2019 में भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा और सभी 10 सीटें जीत गईं| बिहार में भाजपा ने 2014 में जेडीयू के बिना अकेले चुनाव लड़कर 22 सीटें जीती थीं| लेकिन 2017 में जेडीयू दुबारा भाजपा के साथ आ गया तो गठबंधन के कारण भाजपा 17 सीटों पर चुनाव लड़ी और सभी 17 जीती|
2009 तक भाजपा उड़ीसा में भी बीजू जनता दल की जूनियर पार्टनर थी| 2009 में उड़ीसा में भाजपा पहली बार अकेले चुनाव लड़ी थी, तब से वह अपनी ताकत बढ़ाती रही है। पिछले लोकसभा चुनावों में बीजू जनता दल को 21 में से 12 और भाजपा को 8 सीटें मिलीं थी| इस बार उसके बीजू जनता दल से आगे निकल जाने के पूरे आसार लग रहे हैं|
भाजपा हरियाणा जैसा प्रयोग इस बार तमिलनाडु और पंजाब में भी दोहरा रही है| ये दोनों ही ऐसे अहिन्दी भाषी राज्य हैं, जहां भाजपा के पांव कभी नहीं जमे| तमिलनाडु में तो भाजपा पहले भी एक बार 2014 में अकेले चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन पंजाब में लंबे समय से अकाली दल के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी|

पंजाब में भाजपा 1998 तक किसी चुनाव में कोई सीट हासिल नहीं कर सकी थी। 1998 में पहली बार अकाली दल के साथ गठबंधन में अमृतसर, गुरदासपुर और होशियारपुर सीटें जीती, जबकि आठ सीटें अकाली दल और एक सीट जनता दल जीती थी| 1999 में जब वाजपेयी ने दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाई, भाजपा की सीट पंजाब में तीन से घट कर एक रह गई थी| 2004 में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी, तो भाजपा पंजाब में फिर तीन सीटें जीत गई| 2009 में सिर्फ एक सीट जीती, जबकि 2014 और 2019 में दो-दो सीटें ही जीती|
भाजपा का अकाली दल के साथ लोकसभा की तीन और विधानसभा की 23 सीटों पर गठबंधन हुआ था| जिस कारण भाजपा उन्हीं सीटों पर सिमट कर रह गई थी| इस बार पहली बार भाजपा अकेले चुनाव लड़ रही है, तो उसने अब तक छह उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं| भाजपा और अकाली दल के अलग अलग लड़ने तथा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के भी अलग अलग लड़ने से पंजाब का चुनाव चौकोना हो गया है|
जिस आम आदमी पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में रिकार्ड सीटें जीती थीं, उसे पंजाब में उम्मीदवार तक नहीं मिल रहे| आम आदमी पार्टी ने अपने पांच मंत्रियों को चुनाव मैदान में उतार दिया है| कांग्रेस भी अपने पांच विधायकों को चुनाव लड़ाने का मन बना चुकी है|
देश के बाकी हिस्सों की तरह पंजाब में भी बड़े पैमाने पर दलबदल हो रहा है| आम आदमी पार्टी का जालन्धर का एक उम्मीदवार भाजपा में शामिल हो गया है| आम आदमी पार्टी के पूर्व सांसद धर्मवीर गांधी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं| आम आदमी पार्टी और भाजपा दोनों कांग्रेसियों को अपनी पार्टी में शामिल करवा कर उन्हें उम्मीदवार बना रही है|
भाजपा ने जालन्धर में आम आदमी पार्टी के सांसद को टिकट दिया है, तो पटियाला और लुधियाना में कांग्रेस के सांसद को टिकट दिया है| ये तीनों सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा कभी नहीं जीती| इसके अलावा अमृतसर, गुरदासपुर और होशियारपुर भाजपा की जीतने वाली सीटें हैं| फरीदकोट में भाजपा ने अपने दिल्ली के सांसद हंस राज हंस को मैदान में उतारा है| नरेंद्र मोदी के चेहरे और चौकोने मुकाबले में भाजपा 13 में से छह सात सीटें आसानी से जीत सकती है|
इसी तरह तमिलनाडु में भाजपा 2014 को छोड़कर पिछले 25 साल से द्रमुक या अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती रही है| 1999 में जब सोनिया गांधी ने जयललिता के साथ सांठगांठ करके एक वोट से वाजपेयी सरकार गिराई थी, तो कांग्रेस ने अन्ना द्रमुक के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था| क्योंकि अन्ना द्रमुक कांग्रेस के साथ चली गई तो उसकी प्रतिद्वन्दी द्रमुक भाजपा के साथ आ गई थी|
वाजपेयी की सरकार गिराने के कारण तमिलनाडु में जयललिता के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा था, जिसका भाजपा के साथ साथ द्रमुक को भी फायदा हुआ| भाजपा नीलगिरी, कोयंबटूर, तिरुचिरापल्ली, नागरकोईल चार सीटें जीत गई थी, दो सीटों पर भाजपा दूसरे नंबर पर रही| इनमें एक सीट शिवगंगा कांग्रेस से 23 हजार वोट से हारी थी, और दूसरी सीट तेनकाशी अन्नाद्रमुक से सिर्फ 883 वोटों से हारी थी|
करीब पांच साल द्रमुक वाजपेयी सरकार में भाजपा के साथ एनडीए में रही| 2004 के चुनावों से पहले द्रमुक भाजपा का साथ छोड़ गई, तो अन्नाद्रमुक साथ आ गई| यह आश्चर्यजनक चुनाव था, जिसमें द्रमुक 16 और कांग्रेस दस सीटें जीत गई थी| अन्नाद्रमुक के साथ भाजपा को भी कुछ नहीं मिला|
2009 में भी यही गठबंधन रहा| अन्नाद्रमुक तो 39 में से 12 सीटें जीत गई थी, लेकिन भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पाई| 2014 में वह टर्निंग प्वाईंट आया, जब देश में मोदी लहर चल रही थी, भाजपा ने द्रमुक या अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन नहीं किया था|
भाजपा ने छोटे छोटे सात दलों के साथ मिल कर अपना मोर्चा बनाया और तीसरी ताकत के रूप में उभरने की कोशिश की| वह कन्याकुमारी की एक सीट जीत गई, उसके सहयोगी पीएमके ने भी एक सीट जीती| भाजपा के गठबंधन को 18.80 प्रतिशत वोट मिले, बाकी सारी 37 सीटें अन्नाद्रमुक जीत गई|
इसका कारण था यूपीए सरकार में द्रमुक के मंत्रियों का अंधाधुंध भ्रष्टाचार| जिसमें ए. राजा और कनिमोई को जेल जाना पड़ा था और जिसके बाद द्रमुक और कांग्रेस का गठबंधन भी टूट गया था| ये दोनों भी अलग अलग लड़े थे, भाजपा तो एक सीट जीत गई थी, लेकिन कांग्रेस 39 सीटें लड़ कर एक भी नहीं जीत पाई थी|
2019 में द्रमुक कांग्रेस का फिर गठबंधन हुआ, द्रमुक 20 और कांग्रेस 8 सीटें जीती| भाजपा अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन में थी, जिसमें उसने 5 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन 2014 में जीती हुई एक सीट भी हार गई| अन्नाद्रमुक भी सिर्फ एक सीट जीत पाई|
2021 के विधानसभा चुनाव में चार सीटें जीतने के बाद भाजपा ने 2024 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का मन बना लिया था| भाजपा को अन्नामलाई जैसा जुझारू नेता मिल गया, जिसने प्रदेश भर में यात्राएं कर के भाजपा को अन्नाद्रमुक के विकल्प के रूप में खड़ा करना शुरू कर दिया था| तमिलनाडु में अन्नामलाई की लोकप्रियता वैसी ही हो गई है, जैसी यूपी में योगी आदित्यनाथ की| उन्हें लोग तमिलनाडु का मोदी भी कह रहे हैं| अन्नामलाई ने गैर द्रविड़ वोटरों को एकजुट करने का अद्भुत काम किया है, बिलकुल वैसे ही जैसे 2014 में भाजपा ने गैर जाट जातियों को एकजुट करके हरियाणा का चुनाव जीता था|
जब अन्नाद्रमुक को भी यह महसूस हो गया कि भाजपा उसका स्थान लेने की कोशिश कर रही है, तो उसने फरवरी में भाजपा से नाता तोड़ लिया| भाजपा लोकसभा का यह चुनाव 2014 वाली रणनीति पर लड़ रही है, उसने छोटी छोटी पार्टियों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया है|
अन्नामलाई की दिन रात की मेहनत ने चुनाव पूर्व के सर्वेक्षणों में भाजपा को दूसरे नंबर पर ला कर खड़ा कर दिया है| भाजपा छह से आठ सीटों पर मुकाबले में आ गई है, सर्वेक्षणों में उसका वोट भी अन्नाद्रमुक से ज्यादा बताया जा रहा है| अगर भाजपा 1999 वाला आंकडा भी छू लेती है, यानी किसी घोर द्रविड़वादी दल के साथ गठबंधन किए भाजपा अगर 4 या पांच सीटें जीत लेती है, तो दक्षिण में भाजपा की सीटें कांग्रेस से ज्यादा हो जाएँगी|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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