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नयी पीढ़ी को देखनी चाहिए हिंदी की ये पॉलीटिकल फिल्में

Political Film: भारत की फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ा दौर उन राजनीतिक फिल्मों का चला, जिनमें कोई मजदूर किसी मिल मालिक के खिलाफ उठ खड़ा होता है और उसका साथ देने वाले नेता को भी नहीं छोड़ता।

इमरजेंसी के दौर में तब तक कांग्रेस सरकारों से दोस्ती निभाते रहे कुछ वामपंथियों का जमीर जागा तो कुछ फिल्में इमरजेंसी के खिलाफ भी आईं। लेकिन अब दौर है उन कहानियों को कहने का, जिनको बनाने की हिम्मत दशकों तक लोगों की नहीं हुई।

lok sabha chunav

नेहरूजी की मौत से ठीक पहले एक मूवी आई थी दिलीप कुमार की 'लीडर'। दिलचस्प बात यह थी कि इसकी कहानी खुद दिलीप कुमार ने लिखी थी। कहानी है वकालत के एक छात्र की जो एक अखबार 'लीडर' में जमकर जनता की समस्याएं उछालता है और नेताओं के खिलाफ जमकर लिखता है। एक राजकुमारी से उसे प्रेम हो जाता है लेकिन बाद में उसे एक नेता के खून में ही फंसा दिया जाता है।

दिलचस्प बात थी कि 'लीडर' कभी मोतीलाल नेहरू का अखबार था और उसके एक मुस्लिम सम्पादक से उनकी बेटी स्वरूप (विजय लक्ष्मी पंडित) का अफेयर हो गया था। उस सम्पादक को गांधीजी ने लंदन भेजकर इस समस्या से निजात दिलवाई थी। यूं इस मूवी के गाने 'अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं' और 'मुझे दुनियां वालों शराबी ना समझो' कालजयी हिट साबित हुए थे।

राजनीति पर आधारित फिल्मों में इमरजेंसी के दौरान कुछ फिल्में बनीं जिनमें 'आंधी' और 'किस्सा कुर्सी' का ज्यादा चर्चा में रहीं। हालांकि आंधी इमरजेंसी लगने से पहले यानी फरवरी 1975 में रिलीज हुई थी।

चर्चा होने लगी कि ये मूवी इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी के रिश्तों को लेकर बनी है। सुचित्रा सेन और संजीव कुमार की यह मूवी गुलजार ने निर्देशित की थी। लेकिन इंदिरा गांधी सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो इस फिल्म को दूरदर्शन पर दिखाया गया था।

'किस्सा कुर्सी का' भी इमरसेंजी के फौरन बाद रिलीज हुई थी, जिसे निर्देशित किया था कांग्रेस के ही सांसद रहे अमृत नाहटा ने। यह मूवी इंदिरा गांधी और संजय गांधी के ऊपर एक करारा व्यंग्य था। इस मूवी में शबाना आजमी, उत्पल दत्त, मनोहर सिंह आदि थे। इस मूवी में संजय गांधी के कार मैन्युफैक्चरिंग प्लान, योग गुरू धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर. के. धवन और संजय की करीबी अमृता सिंह की मां रुखसाना सुल्ताना तक का मजाक उड़ाया गया था। इसलिए फिल्म को सरकार ने एक 7 सदस्यों की प्रिव्यू कमेटी के पास भेज दिया। कमेटी ने 51 आपत्तियां लगाईं, फिर इमरजेंसी लग गई।
इसी बीच सूचना प्रसारण मंत्री वी.सी. शुक्ला ने सेंसर बोर्ड से फिल्म के प्रिंट लिए और संजय गांधी के साथ मिलकर गुड़गांव की मारुति फैक्ट्री में जला दिए। फिर भी एक प्रिंट बच गया था, सो यह मूवी भी बाद में रिलीज हो गई। यह फिल्म भी देखी जानी चाहिए।

इमरजेंसी के फौरन बाद रिलीज हुई आईएस जौहर की मूवी 'नसबंदी' भी काफी चर्चा में रही थी। 1978 में आयी इस मूवी के गाने प्रख्यात हास्य कवि हुल्लड़ मुरादाबादी ने लिखे थे। टाइटल गीत था- ''क्या मिला सरकार को इमरजेंसी लगा के, नसबंदी करा के हमारी बंशी बजा के''। नसबंदी की दोबारा चर्चा हुई मधुर भंडारकर की मूवी 'इंदु सरकार' में जब मोदी सरकार के आने के बाद फिल्मकारों को थोड़ी हिम्मत हुई कि वो इमरजेंसी की ज्यादतियों पर मूवी बना सकें। इस मूवी में संजय गांधी के तुर्कमान गेट कांड को भी नई पीढ़ी को दिखाया गया, साथ में अमृता सिंह की मां रुखसाना सुल्ताना ने कैसे संजय गांधी के इमरजेंसी अभियान की कमान संभाली, वो भी दिखाया गया है।

इमरजेंसी के बैकड्रॉप में ही सुधीर मिश्रा की फिल्म 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' भी रची गई है, जिसमें एक नक्सल विचारधारा के युवक से लंदन से आई युवती का बार-बार प्रेम और अलगाव पर फोकस किया गया है। छात्र राजनीति पर भी तमाम फिल्में आईं, जिनमें पीयूष मिश्रा के गानों आरम्भ हैं प्रचंड.. और जैसे दूर देश के टॉवर में घुस जाए रे एयरोप्लेन.. वाली 'गुलाल' ने अपनी अलग ही जगह बनाई। वहीं नागार्जुन की 'शिवा', गोविंदा की 'शोला और शबनम' और अजय देवगन और अभिषेक बच्चन की 'युवा' काफी चर्चाओं में रहीं।

25 जनवरी 1984 को रिलीज हुई टी. रामाराव की मूवी 'इंकलाब', जिसमें अमिताभ एक पुलिस ऑफिसर होते हैं, लेकिन अपनी प्रेमिका श्रीदेवी के बिजनेसमैन पिता उत्पल दत्त व उसके नेता दोस्त कादर खान की चालों के चलते राजनीति में उतर जाते हैं। आखिर में वो दिन आता है जब अमिताभ चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली ही कैबिनेट मीटिंग में अपने सारे मंत्रियों को गोलियों से भून देते हैं। बाद में इंदिरा गांधी की मौत के बाद उन्हें भी राजीव गांधी की जिद पर इलाहाबाद से चुनाव लड़ना पड़ा था और वो जीते भी।

राजेश खन्ना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। 1984 में उन्होंने एक विधायक का रोल किया फिल्म 'आज का एमएलए रामअवतार' में और कुछ साल बाद ही राजनीति में आ गए। दसारी नारायण राव की ये मूवी तेलुगू फिल्म का रीमेक थी, जिसमें उनका रोल एक ऐसे नाई का था, जो एक नेता के बाल काटता था। नेता खुश होकर एक दिन उसको टिकट दे देता है और एकदम से रामअवतार की जिदंगी भी बदल जाती है और मिजाज भी।

1991 में अनुपम खेर की एक मूवी आई थी 'हक'। इस मूवी में यह दिखाया गया है कि अनुपम खेर सीएम बन जाते हैं, लेकिन उनकी पत्नी बनी डिम्पल कपाड़िया एक हमले में अपने पेट में पल रहा बच्चा खो देती हैं। एक नेता की निजी जिंदगी कैसे राजनीति से प्रभावित होती है, इस मूवी में दिखाया गया है। हालांकि आम लोगों को अनिल कपूर की 'नायक' ज्यादा पसंद आई, जिसमें एक पत्रकार एक दिन का सीएम बनकर ऐसे ऐसे फैसले 24 घंटे में लेता है कि जनता उसकी फैन हो जाती है।

पत्रकार का ही रोल किया था शशि कपूर ने 'नई दिल्ली टाइम्स' में, जिसमें एक विधायक की हत्या का राज खोलते-खोलते संपादक शशि कपूर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है और पूरा राजनीतिक सिस्टम उनके खिलाफ हो जाता है। लेकिन विवेक ओबेरॉय की रक्त चरित्र से आपको भारतीय राजनीति का चुनाव वाला चरित्र पता चलता है कि कैसे चुनाव जीते जाते हैं और कितनी हिंसा होती है। वहीं हालिया मूवी धारा '370' में आपको संसदीय बहस और फैसले लेने के पीछे अधिकारियों की मेहनत देखी जा सकती है।

ठाकरे ही नहीं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तमाम ऐसी राजनीतिक हस्तियां जिनकी जिंदगी पर फिल्में बन चुकी हैं। उनको बेहतर समझने के लिए आप ये मूवीज देख सकते हैं, जिनमें रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी' से लेकर नेताजी 'सुभाष चंद्र बोस द फॉरगॉटन हीरो', विवेक ओबेरॉय की 'पीएम नरेन्द्र मोदी' से लेकर 'गडकरी' मूवी तक शामिल है।

लेकिन कुछ मूवी ऐसी हैं, जो समाज में राजनीति के अलग अलग आयामों को एक सशक्त कहानी के जरिए दिखाती है। इसमें प्रकाश झा की एक मूवी है 'राजनीति'। महाभारत की थीम पर बनी इस मूवी में उसी तरह के रिश्ते और महत्वाकांक्षाएं दिखाई गई हैं जैसी महाभारत में थीं। वहीं 'सरकार' सीरीज की मूवीज पर ठाकरे परिवार की छाप है।

पिछले 10-15 सालों में जब से नैरेटिव वॉर शुरू हुई है, ऐसी फिल्में भी बढ़ी हैं, जो एक खास तरह का राजनीतिक मैसेज ऑडियंस को देती हैं। इनमें शाहरुख खान की 'माई नेम इज खान' टैररिस्ट के ठप्पे लगने के मुद्दे को उठाती है तो फिल्म रजनीकांत की मूवी 'काला' सनातन धर्म के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ संदेश देती है। रिचा चड्ढा की 'मैडम चीफ मिनिस्टर' मायावती जैसी एक महिला के संघर्ष की कहानी है, तो अनुपम खेर और अक्षय खन्ना की 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' बायोग्राफिकल होते हुए भी, मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर फोकस है। हाल ही में आईं कश्मीर फाइल्स, द केरला स्टोरी या रजाकार भी इसी नैरेटिव वॉर को समझने के लिए देखे जाने लायक फिल्में हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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