किसकी संपत्ति का होगा बंटवारा, किसका होगा वारा न्यारा?
Sampatti ka Punarvitaran: अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है। 2016 के नवंबर महीने की आठ तारीख की रात अचानक देश में नोटबंदी की घोषणा कर दी गयी। रात के बारह बजे से सभी पुराने नोटों को अमान्य घोषित कर दिया गया। बहुत अफरा तफरी मची। किसी तरह कई महीने में हालात काबू में आये। उस समय स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार अपने भाषण में कहा था कि इस नोटबंदी से गरीब आदमी का फायदा ही हुआ है।
असल में वो इशारा कर रहे थे कि जिन्होंने बहुत सारा कैश रखा हुआ था जब उन्हें नोट बदली करवाना हुआ तो अपने यहां काम करनेवाले या परिचित गरीब लोगों के एकाउण्ट में ढाई लाख तक जमा करवाया। इसमें से कुछ तो कमीशन देकर ये रकम वापस पा गये बाकी बहुत से लोगों का पैसा लेकर 'गरीब आदमी' गायब हो गये। पीएम मोदी शायद इसीलिए बोल रहे थे कि नोटबंदी से गरीब आदमी का फायदा ही हुआ है।

वर्ष 2016 में नोटबंदी में 'गरीब आदमी का फायदा' बताने वाले वही प्रधानमंत्री मोदी आज लोगों को बता रहे हैं कि अगर कांग्रेस सत्ता में आयी तो वह धनी लोगों की संपत्ति का बंटवारा उन लोगों में कर देगी जिनके पास बच्चे अधिक है। अर्थात जो अमीर हैं, पैसेवाले हैं उनका पैसा और संपत्ति लेकर कांग्रेस गरीबों में बांट देगी। अब सवाल यह उठता है कि कौन से मोदी पर यकीन करें? वह जो नोटबंदी में पैसा दबा लेनेवाले गरीबों का फायदा बता रहा था या फिर वह जो 'अमीरों का पैसा गरीबों में बांटने' के कांग्रेस के वादे पर सवाल उठा रहे हैं? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या यह बात सही है कि कांग्रेस के घोषणापत्र में इस तरह का कोई वादा किया भी गया है या नहीं?
इसके लिए सबसे पहले कांग्रेस के घोषणापत्र की ही पड़ताल करनी होगी। कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में आर्थिक न्याय कॉलम के तहत कह रही है कि वह कंपनियों के एकाधिकार, अल्पाधिकार और क्रोनी कैपिटलिज्म का विरोध करती है। कांग्रेस यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी कंपनी या व्यक्ति उन सुविधाओं को सिर्फ अपना न समझे जो सभी उद्यमियों के लिए उपलब्ध है।
कांग्रेस घोषणापत्र में कही गयी इसी बात को प्रधानमंत्री मोदी ने संपत्ति के बंटवारे से जोड़कर इस तरह प्रस्तुत किया है मानों कांग्रेस सत्ता में आयी तो सभी अमीर लोगों की संपत्ति छीनकर गरीबों में बांट देगी। इस आरोप का जवाब देते हुए कांग्रेस के हितैषी सैम पित्रोदा ने जो बात कही उससे भी विवाद बढ़ गया। सैम पित्रोदा ने कहा है कि बड़ी कंपनियों की संपत्ति या वेल्थ क्रियेशन को एक सीमा के बाद सीमित किया जा सकता है। अमेरिका जैसे कैपिटलिस्ट देश में भी यह होता है।
सैम पित्रोदा का कहना है कि कोई भी व्यक्ति जो संसाधन इकट्ठा करता है और उससे इतनी बड़ी कंपनी का निर्माण हो जाता है जो अरबों-खरबों डॉलर के मूल्य वाली हो तो ऐसे व्यक्ति के मरने पर जरूरी नहीं कि वह सारी संपत्ति उसके बच्चों के पास जाए। उसका आधा हिस्सा सरकार के पास भी जा सकता है जिसका इस्तेमाल जनकल्याण के लिए होगा। आखिरकार उस कंपनी की इतनी बड़ी पूंजी बनाने के पीछे सरकारी सुविधाओं का भी योगदान होता है।
सैम पित्रोदा ने इसके लिए अमेरिका के इन्हैरिटेन्स टैक्स उदाहरण दिया है जहां किसी बड़ी कंपनी के मालिक के मरने के बाद उसकी संपत्ति का 55 प्रतिशत वेल्थ सरकार के पास चला जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उस संपत्ति को बनाने में उस व्यक्ति के बच्चों का कोई रोल नहीं होता। सैम का कहना है कि यह सिर्फ उन कंपनियों के मामले में ही होता है जो बड़ी कॉरपोरेशन हैं। सैम का कहना है कि दुनिया के हर पूंजीवादी लोकतंत्र में इस तरह की व्यवस्था है ताकि कंपनियां इतनी बड़ी न हो जाएं कि सरकार चलाने लगें। सैम का कहना है कि भारत के संदर्भ में भी ऐसे उपायों पर चर्चा होनी चाहिए।
कांग्रेस या फिर उसके समर्थक सैम पित्रोदा जो कह रहे हैं वह सिर्फ बड़े कॉरपोरेट घरानों के संदर्भ में है। उसका सामान्य धनिकों या कारोबारियों से कोई लेन देन नहीं है। फिर भी यहां यह तथ्य नहीं भूलना नहीं चाहिए कि अमेरिका में इस तरह का कानून होने के बावजूद आज दुनिया में सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने अमेरिका में ही पाये जाते हैं। इन्हैरिटेन्स एक्ट होने के बावजूद अमेरिकी कंपनियां दुनियाभर में घूमकर वेल्थ क्रियेशन करती हैं और अमेरिकी सरकार उनके लिए लॉबींग भी करती है।
लेकिन वो अपने अनुभवों से वो यह बात भी समझते हैं कि कंपनियां इतनी प्रभुत्वशाली नहीं होनी चाहिए कि सरकार के काम काज में दखल देनें लगे। एक ऐसी कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी के कारण ही भारत डेढ सौ साल अंग्रेजों का गुलाम रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी कारोबार करते करते इतनी बड़ी हो गयी कि उसने शासन करने और सेना जमा करने का काम भी शुरु कर दिया। भारत ने उसकी क्या कीमत चुकाई हम सब उसका इतिहास जानते हैं।
लेकिन बीते कुछ दशकों से भारत में बड़ी कॉरपोरेशन बनाने की मुहिम सी चल रही है। केन्द्र में बैठी सरकारों को भी लगता है कि अगर देश में पांच दस इतनी बड़ी कंपनियां बना दी जाएं जो दुनिया के बड़े कॉरपोरेट घरानों के बराबर हों तो हम भी संसार में एक आर्थिक महाशक्ति बनकर उभर सकते हैं। लेकिन कंपनियां केवल कहने से तो बड़ी नहीं बन जाती। इसके लिए उनके पास बड़ा कारोबार और कारोबार पर एकाधिकार होगा तभी वो एक बड़ी कॉरपोरेशन के रूप में स्थापित होंगी।
ऐसा करने के लिए सरकारों की नीति ऐसी बनायी जा रही है कि उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में बड़े कॉरपोरेशन के लिए रास्ता तैयार किया जा रहा है ताकि छोटे कारोबारी उसमें से बाहर हो जाएं। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक बड़े कॉरपोरेट घराने तैयार नहीं होंगे। सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य भारत में ऐसा बहुत तेजी से हो रहा है। ऑक्सफैम के अनुसार भारत के शीर्ष 10 प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश की कुल पूंजी का 77 प्रतिशत केन्द्रित हो चुका है। बीते एक दशक में खरबपतियों की पूंजी में दस गुना से ज्यादा की वृद्धि हुई है। जबकि इसके उलट देश के 77 करोड़ लोगों की आय में सिर्फ एक प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
विकास का यह दृष्टिकोण किसी भी रूप से भारत के हित में नहीं है। इससे जो असमानता निर्मित हो रही है वह आज नहीं तो कल एक गृहयुद्ध को निमंत्रण देगी। 140 करोड़ लोगों के देश में आय की असमानता और विकसित होने के अवसर उस प्रकार निर्धारित नहीं किये जा सकते जैसा यूरोप के छोटे छोटे देशों में हुआ है। भारत की सामाजिक स्थिति ऐसी है कि यहां बड़े कॉरपोरेट घरानों वाला मॉडल बड़ी तबाही ले आयेगा। इसकी इतनी बड़ी सामाजिक कीमत चुकानी पड़ेगी जिसकी अभी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। अगर देश का सारा कारोबार कुछ चुनिंदा कारपोरेट घरानों तक सिमटता जाएगा तो सबसे पहली समस्या नौकरी और रोजगार की खड़ी होगी। दूसरी समस्या पूंजी के भीषण केन्द्रीकरण की होगी जिसके कारण आय की असमानता में जमीन आसमान का अंतर आयेगा।
जैसे जैसे ये दोनों परिस्थितियां बनती जाएंगी एक तीसरा संकट पैदा होगा और वह होगा लॉ एण्ड आर्डर का। अगर किसी समाज में उसके एक बड़े वर्ग को पूंजी निर्माण से दूर कर दिया जाता है तो वहां चोरी, डकैती, छिनैती, राहजनी जैसी घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ती हैं। आज हमारे शहरों में इसके हालात बनने शुरु हो गये हैं जिन्हें पुलिसवाले एफआईआर न लिखकर छिपाये हुए हैं। दिल्ली की कच्ची कालोनियां हों या फिर मुंबई की झुग्गी झोपड़ी। वहां ये घटनाएं आम होती जा रही हैं।
ऐसे में वेल्थ क्रियेशन पर कहीं न कहीं सरकार के स्तर पर ही चेक रखना होगा। चार बड़े कॉरपोरेट घरानों को खड़ा करके हम बाकी को मुफ्त राशन देकर आर्थिक न्याय नहीं कर सकते। आर्थिक विकास का अवसर सबके लिए समान होना चाहिए और ट्रिकल डाउन थ्योरी को सैद्घांतिक नहीं बल्कि व्यावहारिक बनाना होगा ताकि पूंजी का प्रवाह समाज में नीचे तक पहुंचे और ईज आफ डूईंग बिजनेस के बजाय सबके लिए ईज ऑफ लिविंग लाइफ संभव हो सके।
इसलिए कांग्रेस या सैम पित्रोदा जो कह रहे हैं उसे सही संदर्भों में समझने और विश्लेषित किये जाने की जरूरत है। देश में दस अरबपतियों की संपत्ति में सौ गुना बढोत्तरी हो जाने से राष्ट्र संप्रभु नहीं होगा। वह तब होगा जब आम जन के पास पूंजी होगी। अतीत में भारत सोने की चिड़िया था तो इसी कारण था क्योंकि वेल्थ डिस्ट्रीब्यूशन का इससे बढिया मॉडल संसार में कहीं नहीं था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications