Bihar Crime: अपराधियों के सामने बिहार पुलिस हो चुकी सरेंडर
एक ओर उत्तर प्रदेश है जो अपने सख्त लॉ एण्ड आर्डर के लिए चर्चा में रहता है तो दूसरी ओर उससे सटा हुआ बिहार है जहां का मुख्यमंत्री खुद कहता है कि (नागरिक) सुरक्षा का कोई खास मतलब नहीं है।

Bihar Crime : देश भर में जब 08 मार्च को रंगों की होली खेली जा रही थी, उस दौरान बिहार में कानून व्यवस्था अपराधियों के सामने सरेंडर कर चुकी थी। बिहार के आधा दर्जन से अधिक जिलों में खून की होली खेली जा रही थी। कहीं बंदूक की फयरिंग हो रही थी, कहीं जातीय संघर्ष और कहीं साम्प्रदायिक हिंसा।
गोपालगंज के सिधवलिया थाना क्षेत्र के बुचेया गांव में अबीर-गुलाल खेलने के दौरान होली की देर शाम दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प हो गयी। घटना में दोनों पक्ष से 10 से ज्यादा लोग घायल हो गए। मुंगेर, भागलपुर, वैशाली, गया, दानापुर, समस्तीपुर से हिंसा की तस्वीरें सामने आई। ये अलग अलग घटनाएं बता रहीं हैं कि बिहार में अपराधी बेखौफ हैं और मानो वे पुलिस को चुनौती दे रहे हैं।
अपराधी हावी, पुलिस सरेंडर
जैसे ही बिहार में कोई बड़ा त्यौहार आता है अपराधी सक्रिय हो जाते हैं और मानों पुलिस उनके सामने सरेंडर कर देती है। इसी होली में मुंगेर में हिंसक झड़प के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई, भागलपुर में गोलीबारी के दौरान एक बीएड के छात्र को गोली लग गई। समस्तीपुर में एक महिला की हत्या कर दी गई और दानापुर में आपसी संघर्ष में जमकर गोलियां चली। वैशाली में एक व्यक्ति गोली का शिकार हुआ। मझौलिया (पश्चिम चंपारण) के शेखटोली में होली के गीत को लेकर प्रारंभ हुआ विवाद, बढ़ते बढ़ते रोड़ेबाजी में तब्दील हो गया।
बताया जा रहा है कि मुस्लिम बस्ती शेख टोली से गाजे बाजे के साथ होली खेलते हुए गुजर रहे समूह द्वारा फगुआ गीत गाने और रंग उड़ाने पर स्थानीय लोगों को आपत्ति थी। इसी को लेकर बहसबाजी प्रारंभ हुई और देखते देखते पूरा विवाद हिंसा में तब्दील हो गया। महत्वपूर्ण है कि इस पूरे विवाद के दौरान किसी को नहीं लगा कि स्थानीय थाने में फोन करना चाहिए। एक व्यक्ति की जान चली गई। छह लोग घायल हुए।
हिंसा हो जाने के बाद माधोपुर के नगीना दास के आवेदन पर 27 लोगों को नामजद तथा 60 से 70 अज्ञात के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। इसमें खुर्शीद आलम, शेख जमीर आलम, समीर आलम, संपत अली, शेख सरफुद्दीन, सफरे आलम तथा मुहम्मद इलियास को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। वहीं मृतक शब्बीर मियां के बेटे ने 22 लोगों को नामजद तथा 90 से 100 अज्ञात पर प्राथमिकी दर्ज कराई है। दोनो पक्षों से 16 लोगों की गिरफ्तारी हुई है।
अब पुलिस द्वारा हालात नियंत्रण में बताये जा रहे हैं लेकिन सवाल फिर यही है कि जब सैकड़ों लोग वहां इकट्टे थे तो किसी एक व्यक्ति को भी इस बात का ख्याल नहीं आया कि उसे स्थानीय पुलिस को समय रहते फोन करना चाहिए? जब इतना बड़ा विवाद खड़ा हुआ, उस दौरान पुलिस कहां थी?
अपराधियों को दौड़ाओ, नहीं तो वे पुलिस को दौड़ाएंगे
दो महीने पहले की बात है, बिहार में अपराध को नियंत्रित करने का मंत्र डीजीपी आरएस भट्टी ने पुलिस अधिकारियों को दिया था। उन्होंने कहा था कि ''अपराधियों को दौड़ाओ, इससे क्राइम कंट्रोल होगा। अपराधियों को नहीं दौड़ाया तो वे पुलिस को दौड़ाएंगे।'' उनकी बात को लगता है कि बिहार में उनके ही महकमे के अधिकारियों ने गंभीरता से नहीं लिया। इसी का परिणाम है कि अपराधियों में पुलिस खौफ दिखाई नहीं पड़ता।
बिहार पुलिस ने अपराध नियंत्रण के लिए जरूर एक नया रास्ता अपना लिया है कि वे एफआईआर दर्ज नहीं करते। जितने मामले एनसीआरबी के डाटा में सामने आ पाते हैं, अपराधों की संख्या उनसे कई गुना अधिक है।
बहुत आते हैं, सुरक्षा मांगने वाले
नीतीश कुमार ने तीन साल पहले व्यावसायियों की सभा को पटना में संबोधित करते हुए कहा था कि ''गड़बड़ करने वालों का अपना स्वभाव होता है। आप कितनों को रोक सकते हैं? गड़बड़ करने वाले करते रहते हैं, आप कितना कुछ कर लीजिए। कभी कभी बिना मतलब का मन में डर होता है। आजकल हमारे पास बहुत लोग आते हैं और कहते हैं कि हमको सुरक्षा प्रदान कीजिए। हम सबको समझाते हैं कि सुरक्षा का कोई मतलब है तो बताओ। देश की प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। उनको कौन मार दिया बताओ। कौन जानता है कि किसका कब क्या होगा, चिंता मत कीजिए। जो आदमी चिंता नहीं करेगा, वह आदमी बहुत बुलंदी के साथ काम करेगा।''
यह सुनकर लगा ही नहीं कि वक्तव्य किसी मुख्यमंत्री का है। जिन पर बिहार के 13 करोड़ लोगों के नेतृत्व का दायित्व है। जब सुरक्षा का वास्तव में कोई मतलब नहीं है, फिर नेताओं की अगवानी में इतनी सुरक्षा क्यों लगाई गई है? वैसे बिहार के लोगों को उनकी यह बात ठीक भी लग सकती है क्योंकि प्रदेश के अंदर अपराधी जिस तरह से बेखौफ होकर घूम रहे हैं, उसके बाद सुरक्षा का कोई मतलब नहीं है।
बिहारी होकर लॉ एंड आर्डर का सवाल
गुड़गांव में चल रहे एक स्टैन्डअप कॉमेडी शो के दौरान कॉमेडियन ने दर्शक दीर्घा में बैठी एक लड़की से उनके डर के संबंध में पूछा। लड़की ने कहा कि दिल्ली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। दिल्ली में रहते हुए यही उनका सबसे बड़ा डर है, जिससे उन्हें रोज दो-चार होना पड़ता है। कॉमेडियन के साथ बातचीत के क्रम में जैसे ही उस लड़की ने बताया कि वह बिहार की रहने वाली है। उसकी बातों को गंभीरता से सुन रहे लोग 'हंस' पड़े। जैसे वहां कोई कॉमेडी हुई हो। बातचीत की सारी संवेदनशीलता जाती रही, कॉमेडियन ने बड़े भोलेपन से कहा ''मैडम आप तो बिहार से आई हैं। आप भी लॉ एंड आर्डर की बात रही हैं?''
यह ऐसा अपमान है, जिससे बिहार से बाहर निकले हर एक बिहारी का आमना सामना होता ही है। रोजगार के लिए एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश में आते जाते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है लेकिन बिहार की स्थिति अलग है। यहां पलायन मजबूरी है। लोगों ने इसे नहीं चुना।
बिहार की राजनीति नहीं, बिहारी भी हैं दोषी
बिहार आज ऐसी स्थिति में है तो सिर्फ राजनीति को दोष देने से बात नहीं बनेगी। उसके लिए उन सभी लोगों को दोषी माना जाएगा जो बिहार में रहकर उसके परिवर्तन के लिए नहीं लड़ पाए। जिन्होंने वहां रहकर लड़ने की जगह पलायन का रास्ता चुना या जो बिहार में रह गए लेकिन जाति जनगणना, दलित, महादलित के राजनीतिक टोटको में उलझ कर रह गए, बिहार की बदहाली के लिए वो सब जिम्मेवार है।
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बिहार के लोग जाति से जुड़े सवालों में इस तरह दशकों से उलझा कर रखे गए कि वह कभी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर अपनी सरकार से संवाद भी नहीं कर पाए। वह कभी अपने नेता से नहीं पूछ पाए कि बिहार को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने की क्या योजना है आपके पास? तीस सालों से बिहार में जदयू और राजद शासन में हैं। इन तीस सालों में गरीब और वंचित समाज को पलायन और देश भर में अपमान-बोध के सिवा क्या मिला?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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