Kuttey Film Review: फिल्मों के जरिए नक्सलवाद का महिमामंडन क्यों?

विशाल भारद्वाज की फिल्में भले ही थियेटर में हिट न हुई हों लेकिन उनकी फिल्मों में भारत विरोधी विचारधारा का खुलकर प्रदर्शन और महिमामंडन होता है।

Kuttey Film Review

Kuttey Film Review: कुत्ते फिल्म का निर्देशन भले ही उनके बेटे आसमान भारद्वाज ने किया हो लेकिन असल में विशाल ही इस फिल्म के कर्ता धर्ता हैं। उनकी फिल्म कंपनी विशाल भारद्वाज प्रोडक्शन इसकी निर्माता है। अपनी पिछली फिल्मों की तरह इसमें भी विशाल भारद्वाज ने कम्युनिज्म और नक्सली आतंकवाद को जस्टिफाई करने का प्रयास किया है। बैकग्राउंड में, हाथ में बंदूकें और हंसिए लिए, आजादी के नारे लगाते नक्सली और अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा की कहानी, फिल्म 'कुत्ते' में नक्सलियों का खुलेआम महिमामंडन है।

'कुत्ते' के एक सीन में पुलिस की गिरफ्त में नक्सल लीडर कोंकणा एक पुलिसवाले को एक कहानी सुनाती है कि जंगल का राजा शेर शिकार के लिए बकरी और कुत्ते की मदद लेता है। बकरी उसके कहने पर शिकार के तीन बराबर के हिस्से करती है, इसे देख शेर गुस्से में बकरी को खा जाता है और फिर कुत्ते से हिस्से करने को बोलता है। डरकर कुत्ता सारा शिकार उसे देकर खुद बकरी का बचा खुचा मांस खाकर ही खुश हो जाता है। आखिर में कोंकणा उस पुलिस वाले को बोलती है, "हम हैं वो बकरी, और तुम हो वो कुत्ते और शेर है तुम सबका मालिक"।

उसके बाद भी छीनकर लेंगे आजादी जैसे कोंकणा के डायलॉग्स पर फिल्म का कोई किरदार ज्यादा ऐतराज करता नहीं दिखाया जाता। फिल्म के पहले सीन और क्लाइमेक्स में जबरन नक्सलवाद घुसेड़कर, वो भी मुंबई में, विशाल भारद्वाज के बेटे ने अपने पिता की ही लीक को ही फॉलो किया है।

आस्मान भारद्वाज की बतौर निर्देशक ये पहली मूवी है, लेकिन लेखन, म्यूजिक में विशाल का दखल रहा है। हालांकि पूरी मूवी जिस तरह से डार्क थीम पर बनी है, वो विशाल का पैटर्न है। सवाल ये उठता है कि एक के बाद एक फिल्मों में लेफ्ट विचारधारा को बढ़ावा देने वाली विशाल की फिल्में पिटती रहीं, फिर भी एजेंडे को तिलांजली क्यों नहीं देते? एक और सवाल है कि मार्तंड सूर्य मंदिर को 'शैतान की गुफा' के तौर पर दिखाने के बावजूद मनमोहन सरकार के सेंसर बोर्ड ने पास कर दिया था। अब नक्सली आतंकवाद का महिमामंडन किये जाने पर भी सेंसर बोर्ड ने कैसे पास कर दिया?

विशाल आमतौर पर अपने इंटरव्यूज और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अनुराग कश्यप जैसी खुलेआम एकतरफा लाइन नहीं लेते, लेकिन उनकी फिल्में उनका एजेंडा साफ बताती हैं। यहां तक कि उनकी फिल्मों के किरदारों में कहां हिंदू होगा, कहां मुस्लिम, और कहां ईसाई और उसका क्या रोल होगा, इसको लेकर भी उनके इरादे गहराई से उतरने में ही समझ आते हैं। चूंकि ज्यादातर मूवीज माफिया, ड्रग्स, गैंग्स पर आधारित रही हैं, सो उन्हीं के किरदारों के जरिए ये सब दिखाते आए हैं विशाल भारद्वाज।

'मकबूल' में अब्बाजी (पंकज कपूर) का डॉन का किरदार है। जब से मुंबई बम विस्फोट हुए हैं, मुस्लिम गैंगस्टर्स को मिलने वाली सुहानुभूति कम हो गई है। ऐसे में फिल्म 'मकबूल' में अब्बाजी को ड्रग बिजनेस में पार्टनर बनने का ऑफर मिलता है, जिसके जरिए उसे दुनियाभर में अपना साम्राज्य फैलाने का मौका मिलता जिसे वो यह डायलॉग बोलकर खारिज कर देता है, "मुंबई हमारी महबूबा है, इसे छोड़कर हम कराची या दुबई में नहीं बस सकते हैं"। ये डायलॉग मुस्लिम गैंगस्टर्स के फेवर वाला था। सोचिए इससे क्या असर पड़ा होगा? मुस्लिम गैंगस्टर्स की घटती इज्जत बढ़ गई होगी।

फिल्में आम आदमी पर बहुत गहरा असर छोड़ती हैं। तभी तो ओमकारा के ज्यादातर किरदार एक ही जाति के थे। ओमकारा शुक्ला, लंगड़ा त्यागी, डॉली दीक्षित, केशु उपाध्याय। ओमकारा की मां दलित दिखाकर, उसे आधा वामन कहा गया। हिंदुओं को तोड़ने के लिए जातियों के बीच वैमनस्य फैलाना पुरानी रणनीति रही है। फिर ओमकारा, गोपाल, शंकर जैसे नाम वालों को गुंडा दिखाने की क्या रणनीति है?

विशाल भारद्वाज पर लगातार वामपंथ को बढ़ावा देने वाली फिल्में बनाने के आरोप लगे तो उन्होंने 'रंगून' बनाई, जिसमें एक देशभक्त शाहिद कपूर अंग्रेजी सेना में भर्ती होकर आजाद हिंद फौज की एक काल्पनिक तलवार को किसी खास जगह पहुंचाने के सीक्रेट मिशन में जुटा है। यूं नेताजी बोस की तारीफ हुई, लेकिन मूवी के मुख्य पात्रों में एक भी हिंदू पात्र विशाल ने नहीं रखा। शाहिद कपूर का नाम जमादार नवाब मलिक, सैफ अली का नाम रूसी विल्मोरिया, कंगना का नाम जूलिया। ऐसे में विशाल पर सवाल उठने लाजिमी ही हैं कि आखिर चाहते क्या हैं?

उनकी कोई भी मूवी बिना पॉलिटिक्स के पूरी होती ही नहीं, चाहे मूल कहानी में पॉलिटिक्स ना हो। जैसे प्रियंका चोपड़ा की 'सात खून माफ'। इस मूवी में प्रियंका चोपड़ा की सात शादियों और पतियों के कत्ल की कहानी है, लेकिन मूवी में तमाम राजनीतिक घटनाएं बैकड्राप में उसी तरह शामिल की गई हैं, जैसे 'मौसम' फिल्म में पंकज कपूर हर बड़े दंगे को दिखाते हैं। बर्लिन की दीवार गिरने से लेकर पोखरण परमाणु टेस्ट तक, बाबरी मस्जिद गिरने से लेकर 26/11 हमले तक। एजेंडा तो तब साफ लगता है जब प्रियंका के मौलाना पति के किरदार में बाबरी मस्जिद के गिरने के विजुअल्स को टीवी पर देखते हुए दुखी दिखते हैं, जबकि ये फुटेज सेंसर बोर्ड ने कैसे पास कर दी, सवाल इस पर उठने चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल शाहिद कपूर, तब्बू, केके स्टारर 'हैदर' पर उठना चाहिए। आर्मी की ज्यादतियों को उठाना तो एक बारगी बहस का विषय हो सकता है, लेकिन जिस तरह दुनिया के सबसे पुराने सूर्य मंदिरों में से एक मार्तंड सूर्य मंदिर को 'शैतान की गुफा' के तौर पर दर्शा कर उसके मुख्य द्वार पर शैतान खड़ा कर 'बिस्मिल बिस्मिल' गाना फिल्माया गया, उससे लगता है कि ना मनमोहन सरकार को और ना ही विशाल भारद्वाज को हिंदुओं खासतौर पर कश्मीरी पंडितों की भावनाओं से कुछ भी लेना देना था। क्या देश की किसी भी मस्जिद में रावण का पुतला खड़ा करके शूट किया जा सकता है? आखिर सरकार ने उसे मंजूरी कैसे दी? उस पर मनमोहन सरकार में 'हैदर' को पांच पांच नेशनल अवॉर्ड दिए गए।

हालांकि सिस्टम विशाल भारद्वाज का मजबूत है, मोदी सरकार में भी। पिछले साल ही उन्हें एक मूवी में म्यूजिक देने के लिए नेशनल अवॉर्ड दिया गया है, मोदी सरकार के सेंसर बोर्ड ने ही उनके बेटे की मूवी 'कुत्ते' में नक्सलवाल के इतने खुले प्रमोशन के बावजूद पास कर दिया है। ये अलग बात है कि फिल्म के क्लाइमेक्स में मोदी की नोटबंदी को पॉजीटिव नोट पर दिखाया गया है।

हिटलर से वामपंथियों की खास चिढ़ होती है और माओ से खास लगाव। विशाल की मूवीज में भी यही दिखता है। 'रंगून' में हिटलर को किसी देश के नक्शे पर पेशाब करते दिखाया गया है, शायद जर्मनी ही होगा। 'मटरू की बिजली का मंडोला' में जिस तरह से माओ के किरदार को फनी तरीके से महिमा मंडित किया गया है, उससे साफ लगता है कि माओ के किरदार को भारत में लोकप्रिय बनाना था। 'सात खून माफ' में भी बर्निल की दीवार टूटते दिखाई गई है। यूं मटरू के किरदार में इमरान खान को जेएनयू स्कॉलर दिखाना, एक ट्रांसजेंडर का तेरे घर में मां बहन नहीं है की तर्ज पर, 'तेरे घर में माओ लेनिन नहीं है के' कहना भी उनका एक एजेंडा ही तो था।

विशाल प्रतीकों के माध्यम से एजेंडा चलाते आए हैं। तभी तो दो बहनों की लड़ाई झगड़े वाली मूवी पटाखा में मोदी और ट्रम्प की गले लगाते फोटो को देर तक दिखाने का कोई तो उद्देश्य था। 'रंगून' में जापानी सैनिक का घर पहुंचकर मां के हाथ की 'बीफ की डिश' खाने का डायलॉग, शायद सभी गौ भक्तों को इशारा था। अब पुलिस वालों को 'कुत्ते' दर्शाना भी एक तरह से नक्सलियों के मन की बात करने जैसा ही है। इन इशारों को आम जनता समझ भी नहीं पाती। यूं भी विशाल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि "मैं आम लोगों के लिए फिल्में नहीं बनाता, वो देखती भी नहीं, मेरी फिल्में बुद्धिजीवी, क्रिटिक्स लोग देखते हैं और पसंद भी करते हैं।"

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+