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Kisan Andolan: अमीर किसानों के ट्रैक्टर प्रदर्शन में गरीब किसान गायब क्यों?

जब किसान नेताओं की सबसे बड़ी चिंता यह होनी चाहिए कि सरकारी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ छोटे किसानों को कैसे मिल सकता है तो वे कुछ ऐसी मांगों के साथ पंजाब-हरियाणा के बॉर्डर पर आ डटे हैं, जिसे लेकर यह बता पाना कठिन है कि ये लोग किसानों के अधिकार के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं या फिर इन्होंने 'स्टेट' के खिलाफ कोई जंग का ऐलान कर दिया है।

देश के अंदर 2 हेक्टेयर या उससे कम जमीन वाले किसानों की संख्या 80 प्रतिशत तक है। यदि कोई किसान नेता होने का दावा करता है तो उसे अपने बीच के 80 प्रतिशत समाज की आवाज बनना चाहिए। शंभू बॉर्डर पर खड़े सैकड़ों ट्रैक्टरों और उसके साथ खड़ी आक्रामक भीड़ को देखकर उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल का किसान उस प्रदर्शन से खुद को जोड़ नहीं पायेगा।

Kisan Andolan Why are poor farmers missing in the tractor demonstration of rich farmers?

छोटे जोत के किसान को यही लगता है कि शंभू बॉर्डर पर इकट्ठे हुए प्रदर्शनकारी खेतों में काम करने वाले नहीं बल्कि राजनीति करने वाले किसान हैं। एक अनुमान के अनुसार दो हेक्टेयर वाला कोई किसान अगर एक ट्रैक्टर अपनी जमीन के लिए खरीद लेता है तो उस ट्रैक्टर के लिए लिया गया कर्ज वह आजीवन उतार नहीं पाता। सालभर में कम से कम एक हजार घंटे जिसका ट्रैक्टर खेतों में चलता है, उसके लिए खेती में इसकी सार्थकता है। औसतन एक दिन में कम से कम तीन घंटे ट्रैक्टर को खेतों में चलना चाहिए।

ट्रैक्टर ऋण

एक रिपोर्ट के अनुसार देश में किसानों पर ट्रैक्टर ऋण 14,000 करोड़ से अधिक का है। ऐसे में सवाल बनता है कि किसानों के नाम पर चल रहे किसी प्रदर्शन की पहचान ट्रैक्टर कैसे हो सकता है? जबकि वह किसानों के कर्ज और आत्महत्या के लिए सबसे अधिक जिम्मेवार है। किसान नेताओं के बीच छोटे जोत के किसानों का प्रतिनिधित्व होता तो उन्हें समझाने में सुविधा होती कि यह प्रदर्शन किसानों का आंदोलन नहीं लगता। ना ही हुडदंग में शामिल प्रदर्शनकारी महेन्द्र सिंह टिकैत और भारत रत्न चौधरी चरण सिंह की किसानी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले दिखते हैं।

आज की तारीख में महिन्द्रा या स्वराज का 50 एचपी का एक ट्रेक्टर सात-आठ लाख रुपए से कम नहीं आता। छोटे जोत के किसानों के लिए इसे खरीद पाना नामुमकिन है। उनकी इतनी बचत नहीं है कि वे आठ लाख रुपए निवेश करें। उनके खेतों में एक दो दिनों के लिए किराए पर ट्रैक्टर आता है। गरीब किसानों का साथ हमेशा हल और बैल ने ही दिया है। ट्रैक्टर तो किसानों की आत्महत्या की वजह बनी है। ना जाने कितने किसानों ने अपनी जान ट्रैक्टर का कर्ज ना चुका पाने की वजह से दी होगी। ट्रैक्टर ने उनकी जमीन और जिंदगी छीनी है।

स्टेटस का सिंबल

पंजाब में पैसे वाले प्रदर्शनकारियों के लिए ट्रैक्टर उनके स्टेटस का सिंबल है। इसलिए 70 से 80 लाख के नए ट्रैक्टर भी आंदोलन में शामिल होने के लिए लाए गए। कई ट्रैक्टरों को मोडिफाई किया गया। उसमें भी हजारों-लाखों रुपए लगाए गए। जबकि यही दिखावा छोटे किसानों के लिए कर्ज और खुदकुशी की वजह बना है। पंजाब इसमें पीछे नहीं रहा है।

भारत रत्न एमएस स्वामीनाथन की हरित क्रांति का सबसे अधिक लाभ पंजाब को मिला, इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन सबसे अधिक कीमत भी पंजाब ने चुकाई। पंजाब की जो मिट्टी सोना उगलती थी, कुछ साल उस मिट्टी पर कैंसर पसरने लगा। यह किसानों को चेतावनी थी कि अधिक स्वार्थ मिट्टी की सारी उर्वरा शक्ति को सोख लेगा। छोटे जोत के किसानों को सुभाष पालेकर के जीरो बजट की खेती की आवश्यकता है। आमदनी बढ़ाने की बात की जा रही है लेकिन खेती की लागत कम करने के प्रश्न पर यह प्रदर्शन पूरी तरह खामोश है।

बैंक ट्रैक्टर के लिए ना दे ऋण

किसानों के नाम पर प्रदर्शन करने वाले आंदोलनकर्मियों ने किसान रैली को ट्रैक्टर रैली बनाने से पहले उन छोटे किसानों के लिए एक बार क्यों नहीं सोचा जिन्होंने बड़े किसानों की देखा देखी ट्रैक्टर खरीद लिया और आजीवन कर्ज में डूबा रहा। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. गुरचरण सिंह कालकट ने इस समस्या की गंभीरता को समझा था। डॉ कालीकट जब पंजाब किसान आयोग के अध्यक्ष थे, उस समय उन्होंने पंजाब के सभी बैंकों को एक पत्र भेजा। जिसमें उन्होंने लिखा कि पंजाब के किसानों को एक लाख ट्रैक्टर की आवश्यकता है लेकिन इस समय प्रदेश में साढे चार लाख ट्रैक्टर है। किसानों को ऐसे में ट्रैक्टर के लिए ऋण की आवश्यकता नहीं है। बैंक पांच एकड़ से कम जमीन वाले किसानों को ट्रैक्टर के लिए कर्ज देना बंद करें।

बात वर्ष 2007 की है, उनके इस पत्र के बाद ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनियों के बीच भय का वातावरण रहा। इससे पंजाब में ट्रैक्टर कारोबार प्रभावित हुआ लेकिन कंपनियों ने इसकी भरपाई ट्रैक्टर निर्यात करके की। पंजाब में बनने वाले सोनालिका और महिन्द्रा एंड महिन्द्रा ट्रैक्टर की देश के बाहर भी खूब मांग है। वर्तमान में भारत से ट्रैक्टर के निर्यात में लगभग 40 फीसदी हिस्सेदारी पंजाब की है।

प्रदर्शनकारियों की क्या है मांग

यहां जान लेते हैं कि दिल्ली की तरफ बढ़ रहे पंजाब हरियाणा के प्रदर्शनकारियों की मांग क्या है। उन्हें सभी फसलों पर एमएसपी चाहिए, दस हजार रुपए बुजुर्ग किसानों के लिए प्रतिमाह की पेंशन चाहिए, बिजली बिल माफी चाहिए, डीजल सब्सिडी चाहिए, डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के हिसाब से फसलों की कीमत तय होनी चाहिए, सभी फसलों के उत्पादन की औसत लागत से पचास फीसदी ज्यादा एमएसपी मिलनी चाहिए, किसान और खेत में काम करने वाले मजदूरों का कर्जा माफ होना चाहिए, किसानों पर प्रदूषण कानून लागू नहीं होना चाहिए, भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 दोबारा लागू किया जाना चाहिए, लखीमपुर खीरी कांड के दोषियों को सजा मिले और आरोपियों की जमानत रद्द की जानी चाहिए, मुक्त व्यापार समझौतों को रद्द किया जाना चाहिए, विद्युत संशोधन विधेयक 2020 को खत्म किया जाना चाहिए।

मांगों की लिस्ट लंबी है। इस सूची में मनरेगा में हर साल 200 दिन का काम और 700 रुपये मजदूरी की बात भी है। प्रदर्शन के दौरान जिन आंदोलनकर्मियों की मृत्यु हुई, उनके परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी की मांग भी है। प्रदर्शन के दौरान घायल हुए आंदोलनकर्मियों को 10 लाख रुपये का मुआवजा और पिछले प्रदर्शन के दौरान देश भर में आंदोलनकर्मियों पर दर्ज सभी मुकदमे रद्द करने की मांग भी है। इसके अलावा भी कई अन्य मांगें इसमें शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों के रवैए से शासन और सरकार के पक्ष को समझा जा सकता है। उनकी तैयारी तीन महीने की है। मतलब प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर आश्वस्त हैं कि उनका प्रदर्शन लोकसभा चुनाव तक चलेगा। वे इसकी पूरी तैयारी करके मैदान में उतरे हैं।

प्रदर्शन के उद्देश्य पर सवाल

किसान आंदोलन के बड़े नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के बयान के बाद प्रदर्शनकारियों को लेकर संदेह अधिक गहराता है। डल्लेवाल ने कहा कि राम मंदिर से पीएम मोदी का ग्राफ ऊपर चला गया है। वे अपने प्रदर्शन से इस ग्राफ को नीचे लाना चाहते हैं। इससे साफ होता है कि प्रदर्शन का उद्देश्य खेती सुधार नहीं बल्कि मोदी को कमजोर करना है।

जब किसानों की खेती की लागत कम करने और छोटे किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ अधिक से अधिक दिलवाने के लिए आंदोलन होना चाहिए, उसकी जगह प्रदर्शनकारी अपने महंगे मोडिफाईड ट्रैक्टरों से जिस तरह के भय का माहौल बनाने की कोशिश में दिखाई दे रहे हैं, यह सब देखकर उनके आंदोलन का उद्देश्य आर्थिक कम राजनीतिक ज्यादा प्रतीत होता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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