महात्मा गांधी और अन्ना हजारे की शराबबंदी बनाम केजरीवाल की राजनीति
महात्मा गांधी को आदर्श मानने वाले समाजसेवी अन्ना हजारे की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उन्होंने रालेगन सिद्धी गांव में सबसे पहले शराब बंदी करवाई थी। लेकिन उन्हीं अन्ना हजारे के दिल्ली में हुए आंदोलन से जिस आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ, उस पार्टी की सरकार आज शराब नीति में हुए घपले को लेकर कटघरे में है। शराब के ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए बनायी गयी आबकारी नीति में जब केजरीवाल सरकार फंसी तो ध्यान भटकाने के लिए तरह तरह के स्वांग रच रही है।

19 अगस्त को दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और आबकारी विभाग के मंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया कि "ये लोग दिल्ली की शिक्षा और स्वास्थ के शानदार काम से परेशान है। इसीलिए दिल्ली के स्वास्थ मंत्री और शिक्षा मंत्री को पकड़ा है ताकि शिक्षा और स्वास्थ के अच्छे काम रोके जा सके।"
जब उनके इस दांव का कोई प्रभाव नहीं हुआ तो उन्होंने अगला दांव चला। मनीष सिसोदिया ने मीडिया के सामने आकर आरोप लगाया कि उन्हें भाजपा के एक नेता ने आम आदमी पार्टी तोड़कर भाजपा में शामिल होने का प्रस्ताव दिया है। बदले में उनके ऊपर चल रहे सारे मुकदमे वापस ले लिये जाएंगे और उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। जबकि मनगढंत आरोप लगाने के बाद सिसोदिया ने ना तो उस व्यक्ति का नाम सार्वजनिक किया और ना ही बातचीत का कोई सबूत जारी किया है।
इस संबंध में एक न्यूज़ चैनल ने एक सर्वेक्षण किया। जिसमें उन्होंने सवाल पूछा कि मनीष सिसोदिया को बीजेपी नेता के कथित कॉल का खुलासा करना चाहिए या नहीं? इस सर्वेक्षण में 70 फीसदी लोगों ने कहा है कि सिसोदिया को भाजपा नेता का नाम सार्वजनिक करना चाहिए। उनके फोन की रिकॉर्डिंग हो तो उसे भी मीडिया को देना चाहिए।
आज 2022 में पार्टी तोड़ने का जो आरोप मनीष सिसोदिया भाजपा पर लगा रहे हैं, वर्ष 2013 में यही आरोप अरविन्द केजरीवाल भी भाजपा पर लगा चुके हैं। उस समय केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि "पिछले चार महीनों में भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली के लोगों को अपने काले पैसे से खरीदने की कोशिश की। लेकिन ये आम आदमी पार्टी के एमएलए हैं। यह पहली बार भारत के इतिहास में हुआ कि एक भी एमएलए नहीं बिका।" उस आरोप पर एक बड़ा खुलासा आम आदमी पार्टी के ही नेता और करनाल से पार्टी के उम्मीदवार रहे परमजीत सिंह कात्याल ने किया था।
परमजीत ने एक साक्षात्कार में अरविन्द के षडयंत्र की पूरी कहानी कुछ इस तरह से सुनाई थी - "मेरे पास फोन आया कि आप जल्दी आइए। पांच लोगों को जो 24 घंटे आपके साथ रहते हैं, उन्हें साथ लेकर आइए। साढे पांच-छह बजे हम दिल्ली के बॉर्डर के पास होते हैं। हमे वहीं रूकने के लिए कह दिया जाता है। सोनीपत पार करके दिल्ली बॉर्डर से थोड़ा पहले आप रूक जाइए। हम रूक गए। शाम साढ़े सात का वक्त हो गया था। वहां हमें एक शख्स मिला। उसने हमें दो सिम कार्ड दिए। बताया गया कि इसे फोन में डाल लीजिए। हमने डाल लिए। फिर हमें फोन आया कि आप इन पच्चीस लोगों को फोन कीजिए। हमने एक एक कर फोन घुमाने शुरू किए। हमें जो जो बताया गया था, वह हमने बोलना शुरू कर दिया कि हम नीतिन गडकरी के आफिस से बोल रहे हैं, या हम अरूण जेटली के ऑफिस से बोल रहे हैं। हम एक एक कर सबसे बात कर रहे थे।"
"हमें बताया गया था कि अपनी ही पार्टी के जिन विधायकों को हम फोन कर रहे हैं यह सब लोग बीजेपी की तरफ जा सकते हैं। आप इनका मन टटोलो। ऐसा होता है तो हमें सूचना दो। फिर हम इनकी घेराबंदी करेंगे। मजे की बात देखिए कि जहां हम चाय पी रहे थे, वहीं एक टीवी चल रही थी। हमने जब मुड़कर देखा तो अरविन्द केजरीवाल टीवी पर थे। केजरीवाल कह रहे थे कि मेरे एमएलए को भारतीय जनता पार्टी वाले फोन कर रहे हैं। खरीद फरोख्त की बात कर रहे हैं और 35 लाख रुपए देने का ऑफर कर रहे हैं। तब पहली बार माथा ठनका। हमें लगा कि यह काम तो वो हमसे करवा रहे हैं और टीवी पर इतना बड़ा झूठ बोल रहे हैं। पहली बार एहसास हुआ था कि हम गलत काम कर रहे है।"
परमजीत सिंह कात्याल के 2014 के साक्षात्कार का यह हिस्सा निकाल कर यदि आज के समय में मनीष सिसोदिया की कहानी के साथ जोड़ दिया जाए तो ऐसा लगेगा कि आठ-नौ साल पुरानी वही कहानी आम आदमी पार्टी आज फिर से दोहरा रही है।
यह अरविन्द केजरीवाल ही थे जिन्होंने शांतिभूषण, आनंद कुमार, अंजली दमानिया, मयंक गांधी, कैप्टन गोपीनाथ, कपिल मिश्रा, मीरा सान्याल, कुमार विश्वास, आशुतोष, किरण बेदी, शाजिया इल्मी, आशीष खेतान, योगेन्द्र यादव समेत कई बड़े और आम आदमी पार्टी में सक्रिय नामों को किनारे लगा दिया। उसके बाद इस बात में कोई संदेह नहीं बचा कि पार्टी पूरी तरह से अरविन्द की है, पार्टी के अंदर अब ना लोकतंत्र है और ना कोई पारदर्शिता बची है।
उस ऑडियो टेप को दिल्ली वाले नहीं भूले होंगे जिसमें अरविन्द केजरीवाल बुरी तरह से पार्टी के वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार को गालियां देते हुए लात मारकर पार्टी से बाहर करने की बात कर रहे हैं। इस पूरे प्रकरण के बाद ही यह बात साफ हो गई थी कि आम आदमी पार्टी अरविन्द केजरीवाल के इशारे पर चलने वाली पार्टी बनकर ही चल पाएगी।
आम आदमी पार्टी के छोटे से इतिहास को कोई भी उठाकर देख सकता है कि पार्टी के अंदर उसे ही जगह मिली जिसने अरविन्द केजरीवाल की नजरों मे अपने लिए जगह बनाई और जिसने असहमति का स्वर बुलंद किया उसने पार्टी के अंदर इसकी कीमत चुकाई, या फिर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
ऐसे में मनीष सिसोदिया विधायकों को तोड़ने की बात करते है या फिर सौरभ भारद्वाज विधायको के लिए पांच करोड़ के ऑफर की बात करते हैं, तो दोनों में से कोई सबूत पेश नहीं कर पाता है। संभव है कि यह सब केजरीवाल की स्क्रिप्ट का हिस्सा हो। ये लोग वही बोल रहे हैं जो केजरीवाल ने इन्हें स्क्रिप्ट लिखकर दिया है। जैसे कभी परमजीत सिंह कात्याल को दिया गया था। पूरे नाटक को पहले भी केजरीवाल खुद डॉयरेक्ट करते थे, आज भी वही कर रहे हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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