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Karnataka Elections: क्या कर्नाटक की हार से बीजेपी के लिए बंद हो गया दक्षिण का द्वार?

कर्नाटक को भाजपा के लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार कहा जाता है। बीजेपी की इस हार से सबसे बड़ा सवाल यही पैदा होता है कि क्या दक्षिण का द्वार भाजपा के लिए बंद हो गया है।

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    Karnataka Elections: कर्नाटक के चुनावी नतीजों से कांग्रेस में उत्साह स्वाभाविक है। पिछले 9 सालों से हर मोर्चे पर पिट रही कांग्रेस के लिए यह जीत डूबते को तिनके का सहारा सरीखी है। उसे यह सोचने की ना फुर्सत है ना जरूरत कि यह जनादेश उसके पक्ष में कम, भाजपा को दंडित करने के लिए अधिक दिया गया है। इसके लिए राज्य की भाजपा सरकार का 40% कमीशन का भ्रष्टाचार और इसके भंडाफोड़ के बाद भी जातिवादी कुतर्क के दबाव में उनके भयादोहन से त्रस्त भाजपा आलाकमान द्वारा उनका तुष्टीकरण प्रमुखता से जिम्मेदार है।

    दूसरी तरफ कांग्रेस का यह कहना कि यह मोदी की शिकस्त है। भाजपा की हिंदुत्ववादी विचारधारा को जनता द्वारा खारिज किया जाना है। यह 2024 की स्पष्ट भविष्यवाणी है। तो निश्चित रूप से इस तरह के बयान राजनीतिक नादानियां, हकीकत से दूर तथा खुद को भुलावे में रखने जैसा ही कहा जाएगा। देश की राजनीतिक पार्टियों को यह ध्यान रखना होगा कि देश की जनता ने कर्नाटक के साथ ही उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनाव में भाजपा को क्लीनस्वीप दिया है। अभी हाल ही में पूर्वोत्तर के कई राज्यों सहित गुजरात जैसे राज्य में भाजपा नंबर वन का दर्जा हासिल किए हुए हैं। ऐसे में क्या इन राज्यों के जनादेश को कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ समझा जाए?

    कर्नाटक से आए चुनाव नतीजों ने यह कलाई भी खोल दी है कि देश के दक्षिणी या पश्चिमी प्रांत उत्तर तथा पूर्व से अधिक आधुनिक सोच वाले और वास्तव में प्रगतिशील है। जाति तथा मजहब की दुखदायक बेड़ियों ने कर्नाटक के मतदाताओं को जिस तरह जकड़ा है वह यूपी बिहार लूटने वाले खलनायकों के उपकरणों से कम नहीं है। चुनाव के पहले महीनों से यह बहस गर्म रही है कि आबादी में लिंगायतों का प्रतिशत कितना है। वोकालिग्गा समुदाय का प्रतिशत कितना है। कुरुबा जो पिछड़ी जनजातियों में बहुसंख्यक हैं, कितने असरदार होंगे तथा अल्पसंख्यक मुसलमान किस करवट बैठेगा।

    इतना ही नहीं कर्नाटक में जो समस्याएं विकराल रूप में जनता की जिंदगी को दुष्कर बना चुकी हैं उनका जिक्र केवल रस्म अदायगी के तौर पर घोषणा पत्रों में किया गया। सूखा, किसानों की दुर्गति, पर्यावरण का संकट, चरमराती नागरिक सेवाएं, कावेरी जल विवाद, शहरों तथा देहात के बीच गहराती खाई, नक्सली हिंसा, सांप्रदायिक कट्टरपंथी का उफनता ज्वार जैसी समस्याओं पर किसी ने खुलकर बात नहीं की।

    कहते हैं कि आप दूसरों को भरमा सकते हैं अपनों को नहीं। भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं को पता था कि कर्नाटक चुनाव में क्या होने वाला है क्योंकि बबूल का पेड़ उन्होंने खुद ही लगाया था। हार के कारणों की पड़ताल की जाएगी तो ढेर सारे सवाल उठेंगे। कर्नाटक में बीजेपी की हार का प्रमुख कारण मजबूत चेहरा ना होना रहा है। येदयुरप्पा को बीच कार्यकाल हटाकर बसवराज बोम्मई को बीजेपी ने भले ही मुख्यमंत्री बनाया हो, लेकिन सीएम की कुर्सी पर बैठे हुए बोम्मई का कोई खास प्रभाव नजर नहीं आया। वही कांग्रेस के पास डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया जैसे मजबूत चेहरे थे।

    बीजेपी की हार के पीछे दूसरा अहम कारण भ्रष्टाचार का मुद्दा रहा। कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ शुरू से ही "40 फ़ीसदी" करप्शन का एजेंडा सेट किया और धीरे-धीरे बड़ा मुद्दा बन गया। कर्नाटक के राजनीतिक समीकरण भी बीजेपी साध कर नहीं रख सकी। तीसरा, बीजेपी न ही अपने वोट बैंक लिंगायत समुदाय को अपने साथ जोड़कर रख पाई, न ही दलित, आदिवासी, ओबीसी, वोकालिग्गा समुदाय का ही दिल जीत सकी। वहीं कांग्रेस मुस्लिमों से लेकर दलित, ओबीसी को मजबूती से जोड़े रखने के साथ लिंगायत, वोक्कालिग्गा समुदाय के वोट बैंक में भी सेंधमारी करने में सफल रही।

    चौथा, कर्नाटक में एक साल से बीजेपी के नेता हलाला, हिजाब के मुद्दे उठाते रहे। ऐन चुनाव के समय बजरंगबली की भी एंट्री हो गई, लेकिन धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति बीजेपी के काम नहीं आई। कांग्रेस ने बजरंग दल को बैन करने का वादा किया तो बीजेपी ने बजरंग दल को सीधे बजरंगबली से जोड़ दिया। बीजेपी ने जमकर हिंदुत्व का कार्ड खेला पर यह दांव भी बेअसर रहा।

    पांचवा, कर्नाटक में बीजेपी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा इस बार चुनाव में साइडलाइन रहे। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी का बीजेपी ने टिकट काटा तो दोनों ही नेता कांग्रेस का दामन थाम कर चुनाव मैदान में उतर गए। ये तीनों ही लिंगायत समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना बीजेपी को काफी महंगा पड़ा। छठवां, कर्नाटक में बीजेपी की हार की बड़ी वजह सत्ता विरोधी लहर की काट नहीं तलाश पाना भी रही है। बीजेपी के सत्ता में रहने की वजह से उसके खिलाफ लोगों में नाराजगी थी लेकिन बीजेपी इससे निपटने का कोई रास्ता नहीं ढूंढ पाई।

    अब ऐसे में यह सवाल तो पूछा ही जाएगा कि इस चुनाव परिणाम से अगले साल के लोकसभा चुनाव पर क्या असर होगा? इसका सामान्य उत्तर तो यही होगा कि भाजपा के आक्रामक तेवर ढीले पड़ेंगे और कांग्रेस अधिक आत्मविश्वास से विपक्षी दलों को साथ लेकर सामना करने को तैयार होगी। वर्ष 2024 के आम चुनाव में भाजपा की सीटें कर्नाटक में कम हो सकती है। 2019 लोकसभा चुनाव में राज्य की 28 सीटों में से बीजेपी ने 25 और उसके समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी ने एक सीट जीती थी, जबकि कांग्रेस और जेडीएस को केवल एक-एक सीट मिली थी। ऐसे में कर्नाटक में बीजेपी का 2019 के नतीजे को दोहरा पाना मुश्किल हो सकता है। पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र के साथ अब कर्नाटक में बीजेपी की सीटें घट सकती है। इन राज्यों में हो रहे सीटों के नुकसान की भरपाई के लिए बीजेपी को और नए राज्य तलाशने होंगे।

    दक्षिण के आंध्र प्रदेश, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और तेलंगाना में बीजेपी अभी तक खुद को स्थापित नहीं कर सकी है। दक्षिण के राज्यों में 130 सीटें आती है, जो कुल लोकसभा सीटों का 25% होता है। 2019 में बीजेपी को कर्नाटक और तेलंगाना में सीटें मिली थी, लेकिन साउथ के बाकी राज्यों में उसे कुछ नहीं मिला था। कर्नाटक के जरिए बीजेपी दक्षिण में अपना पैर पसारना चाहती है लेकिन अगर उसे कर्नाटक में ही झटका लग गया तो फिर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सहित दक्षिण के बाकी राज्यों में उसको बड़ा सियासी नुकसान हो सकता है।

    कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद दक्षिण भारत से उसकी घर वापसी की शुरुआत हो सकती है। कर्नाटक हारने से बीजेपी के अखिल भारतीय पार्टी होने वाले दावे को झटका लग सकता है। बीजेपी अपने दम पर दक्षिण के राज्यों में से सिर्फ कर्नाटक में ही जड़ें जमा पाई है। कर्नाटक को छोड़ दें तो दक्षिण के किसी राज्य में भी बीजेपी का कोई खास प्रभाव नहीं है। ऐसे में कर्नाटक की हार भाजपा के लिए व्यावहारिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक रूप से भी परेशान करने वाली है।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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