Karnataka Election Campaign: लिंगायत वोटरों के गढ़ में कौन जीतेगा बाजी?
लिंगायत बहुल मध्य कर्नाटक का चुनाव परिणाम ही बतायेगा कि लिंगायत वोटों पर भाजपा की पकड़ बनी हुई है या कांग्रेस ने उसमें सेंध लगा दी है। कर्नाटक में इस बार सबसे ज्यादा ध्यान मध्य कर्नाटक के चुनाव परिणामों पर रहेगा।

Karnataka Election Campaign: मध्य कर्नाटक में चार जिले हैं: दावणगेरे, चित्रदुर्ग, चिकमगलूर और शिवमोगा। यहां कुल 25 विधानसभा सीटें हैं। 2018 तक यहां 26 सीटें थी लेकिन नए जिले के गठन के बाद हुविनाहडगली विधानसभा क्षेत्र विजयनगर से जुड़ गया।
मध्य कर्नाटक के चार जिलें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां की 25 सीटों की राजनीतिक जमीन पर कांग्रेस और भाजपा दोनों में टक्कर होती रही है। हालांकि इस टक्कर के बावजूद यहां की सियासी जमीन डेढ दशक से भाजपा के लिए उपजाऊ रही है। 2013 को छोड़कर यहां के मतदाताओं ने हमेशा भाजपा का साथ दिया है। लिंगायत वोटरों तथा अनुसूचित जाति/जनजाति के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में 2013 में येदियुरप्पा की बगावत के कारण भाजपा को नुकसाना उठाना पड़ा था।
परंपरागत लिंगायत मतदाताओं के कारण भाजपा को उम्मीद है कि इस बार फिर मध्य कर्नाटक उसे निराश नहीं करेगा। वहीं कांग्रेस को उम्मीद है कि भाजपा से पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और वरिष्ठ नेता लक्ष्मण सावदी के कांग्रेस से जुड़ने के कारण इस क्षेत्र के लिंगायत इस बार भाजपा का साथ छोड़ कांग्रेस का साथ देंगे।
ऐसे में भाजपा के लिए इस बार यहां अपना प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं होगा। वर्ष 2018 के चुनावों मे यहां की 26 में से 21 सीटें भाजपा के खाते में गई थी, जबकि कांग्रेस को केवल 5 सीटें हाथ लगी थी। जद (एस) का खाता भी नहीं खुला था। तब भाजपा में बीएस येदियुरप्पा सीएम पद के उम्मीदवार थे। उससे एक दशक पहले वर्ष 2008 में भी भाजपा ने येदियुरप्पा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था और 26 में से 17 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन 2013 में जब येदियुरप्पा ने भाजपा से बगावत कर अपनी पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष बनाकर चुनावी ताल ठोका था तब भाजपा के खाते में इस क्षेत्र से केवल 3 सीटें आई थीं।
येदियुरप्पा की वापसी के साथ इस क्षेत्र में भाजपा का परंपरागत वोटर फिर से भाजपा में लौट आया था। लेकिन अब जब येदियुरप्पा मुख्यमंत्री के उम्मीदवार नहीं है और चुनाव भी नहीं लड़ रहे है, तब कितने लिंगायत वोटर भाजपा के पास आते हैं यह देखना होगा। पिछड़ी जातियों ने भी यहां भाजपा का साथ दिया है। लेकिन इस बार पिछड़ी जातियां कांग्रेस के साथ खड़ी नजर आ रही हैं।
लिंगायत और पिछड़ी जातियों के वर्चस्व वाले मध्य कर्नाटक में गुरू पीठ और धार्मिक मठ खूब हैं। शिवमोगा पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का गढ़ है, वहीं चिकमगलूर में भाजपा ने अपनी स्थिति को मजबूत किया है। दावणगेरे का झुकाव भाजपा की ओर रहा है लेकिन कुछ हद तक कांग्रेस को भी यहां समर्थन मिला है। वहीं, चित्रदुर्ग ने साबित किया है कोई भी पार्टी उसे हल्के में नहीं ले सकती।
लिंगायतों के वर्चस्व वाले दावणगेरे जिले ने पिछले डेढ दशकों से भाजपा और कांग्रेस दोनों का साथ दिया है। राज्य में जो भी दल सत्ता में आया, उसने आर्थिक विकास पर जोर देने की बजाय दावणगेरे और चित्रदुर्ग के धार्मिक मठों को ध्यान में रखकर अपने कार्यक्रम बनाए। लिंगायतों के उप संप्रदाय के अलावा कुरूबा, वाल्मीकि, दलित और अन्य जातियों के भी मठ हैं। भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जनवरी में दावणगेरे, तुमकुरु और चित्रदुर्ग में 7 मठों का दौरा किया था। राहुल गांधी भी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कई मठों में गए थे। लेकिन बासवराज बोम्बई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के आरक्षण को लेकर किए गए फैसले इस बार दावणगेरे में चर्चा का केन्द्र है।
दरअसल, बीदर से चामराजनगर तक पंचमशील लिंगायत मठों मे कुंडलसंगम मठ काफी प्रभावी माना जाता है। इस मठ के प्रमुख जयमुत्युंजय स्वामी ने आरक्षण को लेकर आंदोलन छेड़ा था। अंतत सरकार ने मुस्लिम कोटे का 4 प्रतिशत आरक्षण हटाकर लिंगायत और वोक्कलिग्गा समुदाय के बीच 2-2 प्रतिशत बांट दिया।
2018 के चुनावों में भाजपा ने यहां से 16 लिंगायत उम्मीदवारों को टिकट दिया था। उनमें से 14 की जीत हुई थी। कांग्रेस ने 5 लिंगायतों को मैदान में उतारा था और 3 जीतने मे सफल रहे थे। इस बार भी भाजपा ने टिकट बंटवारे में लिंगायतों को पूरी तवज्जो दी है। इस क्षेत्र से आने वाले भाजपा विधायक एम विरूपाक्षप्पा के भ्रष्ट्राचार के आरोपों में घिरने के बाद भाजपा असहज है, वहीं कांग्रेस भी यहां अंदरूनी कलह में घिरी है। कांग्रेस ने यहां से फिर पार्टी के 91 वर्षीय उम्मीदवार शामनूर शिवशंकरप्पा को दावणगेरे दक्षिण से टिकट दिया है। सबसे ज्यादा उम्र के उम्मीदवार भी इसी क्षेत्र से हैं।
चित्रदुर्ग की बात करें तो चित्रदुर्ग में पिछली बार 2018 में भाजपा को 6 में से 5 सीटें हासिल हुई थीं जबकि, कांग्रेस को एक सीट से संतोष करना पड़ा। अनुसूचित जनजाति के बड़े नेता बी. श्रीरामुलू का जिले के मोलकालमुरु सीट से चुनाव लड़ना पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हुआ था। इस बार भाजपा को इस क्षेत्र में बेल्लारी खदान से चर्चा में आए रेड्डी बंधुओं में से एक जनार्दन रेड्डी की नई पार्टी से चुनौती मिल सकती है। इसका फायदा इस क्षेत्र में कांग्रेस को मिल सकता है। कांग्रेस और भाजपा दोनों इस क्षेत्र में अंदरूनी घमासान से त्रस्त है। ऐसे में भाजपा के लिए सभी 6 सीटें बचाना, इस बार आसान नहीं होगा। कांग्रेस भाजपा को यहां बराबरी पर टक्कर दे रही है। फिलहाल दोनो राष्ट्रीय दलों का पलड़ा बराबर का लग रहा है।
चिकमगलूरु की बात करें तो 2018 में चिकमगलूरु की 6 में से 5 सीटें जीतने वाली भाजपा के लिए इस बार भी स्थितियां अन्य जिलों की तुलना में बेहतर हैं। जिले की शृंगेरी सीट कांग्रेस के लिए इस बार चुनौतीपूर्ण बन गयी है। भाजपा का भरोसा है कि जातिगत आरक्षण का फैसला उसे एक बार फिर चिकमगलूरु में बढ़त दिलाएगा।
शिवमोगा को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और ईश्वरप्पा का गढ़ इस बार भी भाजपा के लिए सुरक्षित रहेगा? जिले के 7 विधानसभा सीटों में से 6 भाजपा और 1 कांग्रेस के खाते में है। येदियुरप्पा इस बार चुनाव मैदान में नहीं है। यह क्षेत्र येदियुरप्पा की मजबूत पकड़ का माना जाता है। इस बार जिले के शिकारीपुर विधानसभा सीट से येदियुरप्पा के बेटे बी.वाई. विजयेन्द्र चुनाव मैदान में है। बी.वाई. विजयेन्द्र की जीत तय मानी जा रही है। कितने मतो के अंतर से वह अपनी सीट जीतते हैं, यह देखना होगा।
Recommended Video

येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री रहते अपने इस परंपरागत क्षेत्र के विकास पर विशेष ध्यान दिया था। जिले में काफी बुनियादी विकास हुआ है। फरवरी में शिवमोग्गा हवाई अड्डे का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने किया था। ऐसे में इस क्षेत्र में येदियुरप्पा की छवि दांव पर लगी है। अगर यहां कांग्रेस भाजपा के बराबर सीटें भी जीत जाती है तो कहा जा सकता है कि येदियुरप्पा की पकड़ में रहा यह क्षेत्र अब उनके हाथ से निकल चुका है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications