Judicial Overreach: संसद के अधिकार क्षेत्र में फिर दखल
Judicial Overreach: न्यायपालिका और विधायिका में टकराव का एक और मुद्दा खड़ा हो गया है| सुप्रीमकोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा के राज्यसभा से निलंबन संबंधी याचिका पर सुनवाई कर रही है| कायदे से यह याचिका स्वीकार नहीं की जानी चाहिए थी, लेकिन चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड ने इस याचिका को स्वीकार करके सुनवाई शुरू कर दी है| अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने अदालत में अपनी आपत्ति दायर की थी कि वह सदन के भीतर की किसी कार्रवाई पर याचिका स्वीकार नहीं कर सकती|
क्या यह याचिका उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के उन बयानों की वजह से स्वीकार की गई, जिनमें धनखड़ ने सुप्रीमकोर्ट के जजों के नियुक्ति संबंधी क़ानून को रद्द करने की आलोचना की थी| धनखड़ ने कुछ महीने पहले कोलिजियम सिस्टम की आलोचना करते हुए कहा था कि जजों की नियुक्ति के संबंध में संसद ने जो क़ानून बनाया था, सुप्रीमकोर्ट को उसे रद्द करने का अधिकार नहीं था, इस पर चर्चा होनी चाहिए|

राघव चड्ढा पहली बार राज्यसभा के सांसद बने हैं| 2019 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनकी संसदीय यात्रा 2020 से शुरू हुई थी, जब वह दिल्ली से विधायक चुने गए, दो साल बाद 2022 में वह राज्यसभा सदस्य बन गए| अनुभवहीनता कहें या खुराफाती दिमाग कि जब 7 अगस्त की रात को दिल्ली सेवा बिल पास हो रहा था, तो उन्होंने बिल को सलेक्ट कमेटी में भिजवाने के लिए पेश किए गए अपने प्रस्ताव में पांच ऐसे नाम जोड़ दिए, जो वास्तव में सत्ताधारी गठबंधन के सांसद थे| इनमें तीन भाजपा के, एक बीजद का और एक अन्नाद्रमुक का सांसद था|
इन पांचों ने राज्यसभा के सभापति और उपसभापति को शिकायत की थी| इस पर अमित शाह ने कहा- मोशन पर चड्ढा ने 5 सांसदों के फर्जी दस्तखत लगाए हैं, दो मेंबर्स कह रहे हैं कि दस्तखत उन्होंने नहीं किए, इसलिए मामले की जांच होनी चाहिए| डिप्टी स्पीकर हरिवंश ने कहा कि उन्हें भी 4 सदस्यों की शिकायत मिली है|

जिस पर मामला विशेषाधिकार समिति को भेज दिया गया, लेकिन राघव चड्ढा ने प्रेस कांफ्रेंस करके आरोपों को निराधार बताया| राघव चड्ढा ने कहा कि भाजपा लगातार दुष्प्रचार कर रही है, झूठ बोल रही है| राज्यसभा के बुलेटिन में कहीं भी दस्तखत, फर्जीवाड़ा, फोर्जरी, जालसाजी जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है| अगर भाजपा के पास प्रूफ है, तो वह इसे दिखाए|
राघव चड्ढा का यह बयान चोरी और सीनाजोरी का मामला था| जो मामला विशेषाधिकार समिति को सौप दिया गया था, उस पर सदन के बाहर चर्चा नहीं की जानी चाहिए थी| इसलिए सदन के नेता पीयूष गोयल ने 11 अगस्त को तब तक उनकी सदस्यता निलंबन का प्रस्ताव रखा, जब तक विशेषाधिकार समिति फैसला नहीं करती| यह एक सामान्य सी प्रक्रिया है, सदन के भीतर की घटना और सदन के नियमों का मामला है| राघव चड्ढा ने 10 अक्टूबर को सदन से अपने निलंबन को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी है| 31 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट ने जिस तरह की टिप्पणियां की हैं, वे संसद के अधिकारों को चुनौती देने वाली हैं|
इस मामले में सुप्रीमकोर्ट का एक फैसला याद आता है| जुलाई 1993 में विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने नरसिंह राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा था| प्रस्ताव पास होना तय था, क्योंकि सरकार अल्पमत में थी| नरसिंह राव सरकार ने 50- 50 लाख रूपए में पांच सांसद खरीदे और अपनी सरकार बचा ली|1995 में अटल बिहारी वाजपेयी ने इस घूसकांड का संसद के भीतर सनसनीखेज खुलासा किया| वाजपेयी झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसद शैलेंद्र महतो को लेकर सामने आए|
शैलेंद्र महतो ने संसद के सामने स्वीकार किया कि शिबू सोरेन समेत उनकी पार्टी के तीन सांसदों ने नरसिम्हा राव की सरकार बचाने के लिए 50-50 लाख रुपए की घूस ली थी| इसके बाद इस मामले की लंबी सीबीआई जांच और सुनवाई चली| घूस का पैसा बाकायदा बैंक खातों में जमा था, जिस पर आयकर विभाग ने आयकर का दावा भी किया था| हालांकि लंबी सुनवाई के बाद उसे चंदा बता कर रफा दफा कर दिया गया था|
इस घूसकांड के बारे में सीबीआई की चार्जशीट में कुछ सनसनीखेज खुलासे हुए थे| लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीमकोर्ट ने यह कहते हुए उन सभी सांसदों को बरी कर दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों को संसद के भीतर भाषण या वोट देने के मामले में सुप्रीमकोर्ट कुछ नहीं कर सकती| इसलिए संसद से बाहर दी गई रिश्वत और संसद के भीतर हुई वोटिंग को वह जोड़ कर नहीं देख सकती|
सुप्रीमकोर्ट के इसी फैसले के अधिकार पर राघव चड्ढा की अपील अस्वीकार होनी चाहिए थी| लेकिन राघव चड्ढा के वकील की बहुत ही लचर दलील पर उनकी याचिका स्वीकार कर ली गई कि सभापति किसी भी सांसद का निलंबन अनिश्चितकालीन नहीं कर सकते| जबकि निलंबन तो क्या 2005 में लोकसभा के दस और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता भी खत्म हो चुकी है|
अटॉर्नी जनरल वेंकटरमनी ने कोर्ट में कहा कि निलंबन सभापति ने नहीं किया, संसद में प्रस्ताव पास करके हुआ है| इसलिए यह सदन की कार्यवाही का सवाल है| कोर्ट का इस मसले पर सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं बनता, कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन चीफ जस्टिस चन्द्रचूड ने उनकी एक नहीं सुनी| ठीक इसी तरह सुप्रीमकोर्ट महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर को भी धमकी दे चुका है| कोर्ट ने इतना जरुर कहा कि वह विशेषाधिकार हनन के विस्तृत विषय या विशेषाधिकार कमेटी के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं देगी|
कोर्ट ने कहा कि उसके सामने जो विचार का मसला है- वह अनिश्चित काल तक निलम्बन का है| इस पर राघव चड्ढा के वकील की एक और लचर दलील यह थी कि राघव चड्ढा अगर 60 दिन तक हाऊस में नहीं गए तो सीट खाली घोषित हो सकती है, ऐसे में कैसे अनिश्चित काल तक सस्पेंड किया जा सकता है| यह लचर दलील इसलिए है कि सदन ने खुद प्रस्ताव पास करके उन्हें सस्पेंड किया है, वह अपनी मर्जी से गैरहाजिर नहीं हैं, इसलिए यह नियम उन पर लागू ही नहीं होता|
राघव चड्ढा के वकील की दलील है कि नियम 255 और 256 उस सत्र से परे निलंबन का अधिकार नहीं देते हैं| हालांकि नियम में ऐसा कोई उल्लेख नहीं| अदालत ने कहा कि वह "कानून को स्पष्ट करेगा" कि क्या विशेषाधिकार समिति के अंतिम निर्णय तक किसी सांसद को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित किया जा सकता है| अब यह भी संसद के अधिकारों और नियमों में दखल है|
सुप्रीमकोर्ट के जज की टिप्पणी बहुत ही हास्यस्पद भी थी, जिसमें उन्होंने कहा कि क्योंकि विशेषाधिकार समिति के निर्णय लेने की कोई समय सीमा नहीं है, अगर समिति वर्तमान सदन के कार्यकाल तक निर्णय नहीं लेती है तो क्या होगा? क्या इसका मतलब यह है कि निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का उनका अधिकार अनिश्चित काल के लिए निलंबित कर दिया जाएगा? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज को इतना भी नहीं पता कि राज्यसभा का कार्यकाल खत्म नहीं होता, लोकसभा की तरह राज्यसभा भंग भी नहीं होती| सांसद का कार्यकाल खत्म होता है| और राज्यसभा के सांसद का निर्वाचन क्षेत्र भी नहीं होता|
राघव चड्ढा की दलील है कि उन्होंने कोई गलती नहीं की, लेकिन जब कोर्ट ने कहा कि क्या वह कोर्ट के सामने और सभापति के सामने अपनी गलती के लिए माफी मांगने को तैयार हैं, तो राघव चड्ढा के वकील तुरंत तैयार हो गए| क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं है कि जब गलती नहीं की, तो माफी मांगने पर सहमति क्यों| हालांकि अटार्नी जनरल ने कोर्ट को बताया कि निलंबन के आदेश को रद्द करना स्पीकर या चेयरपर्सन के अधिकार क्षेत्र में नहीं हो सकता है, क्योंकि आदेश सदन के एक प्रस्ताव के बाद आया था|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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