Jharkhand Politics: क्या झारखण्ड में भाजपा को भारी पड़ेगी हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी?
Jharkhand Politics: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी से प्रदेश की राजनीति अशांत है। समर्थकों में सहानुभूति की लहर को बनाए रखने की जद्दोजहद जारी है। सत्तारूढ झारखंड मुक्ति मोर्चा की कोशिश लोकसभा चुनाव और इस साल के अंत में होने वाले प्रदेश विधानसभा चुनाव तक समर्थकों में विक्षोभ की आंच को बढ़ाए रखने की है।
अगर इसमें सफलता मिलती है तो विपक्षी भारतीय जनता पार्टी को खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। प्रदेश में झामुमो के नेतृत्व वाली इंडिया गठबंधन की सरकार है और यह लगातार सियासी हाशिए पर धकेली जा रही कांग्रेस पार्टी के संबल का आधार है।

आदिवासी बहुल झारखंड से लोकसभा की 14 सीटें हैं। इनमें से अमूमन बारह सीटें भाजपा जीतती रही है। मगर हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद से उपजी स्थिति अलग है। यहां की लोकसभा सीटें पड़ोसी बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगती हैं। यहां झामुमो और राष्ट्रीय जनता दल को साथ लेकर कांग्रेस पार्टी सियासी ऑक्सीजन पाना चाहती है।
स्थानीयता की राजनीति में प्रवीण झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन पड़ोसी राज्य बिहार के लालू प्रसाद यादव की तरह ही परिवारवाद के पोषक हैं और प्रदेश भर में व्यापक असर रखते हैं। उन्हें भाजपा और कांग्रेस के पास आने जाने से कभी कोई खास गुरेज नहीं रहा है। बुजुर्ग शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के प्रणेता रहे हैं। जेल आते जाते रहना उनके राजनीतिक सफर का प्रमुख हिस्सा रहा है। प्रेक्षक मानते हैं कि इस दबंग आदिवासी नेता का जेल जाने से समर्थन आधार घटने के बजाय बढ़ता ही रहा है।
ऐसे में उनके पुत्र, सियासी वारिस और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पहली बार भूमि घोटाले में सलाखों के पीछे गए हैं। इससे उनके जनाधार का क्या होता है, यह देखना बाकी है। जेल में बंद पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत झुकने के बजाय इसी तरह डटे रहे तो बड़े सियासी फायदे में रह सकते हैं। मगर इसके लिए उन्हें विरोधियों के अलावा निज परिवार में जारी अंदरूनी महाभारत से पार पाना होगा।
सियासत में गुरूजी के विशेषण से मशहूर शिबू सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन और दो पुत्र हेमंत और बसंत सोरेन प्रदेश की तीन सीटों से विधायक हैं। चौथी विधानसभा सीट गिरिडीह की गांडेय है। इससे तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गुरूजी की दूसरी बहु कल्पना सोरेन को विधायक बनाने की तैयारी मुकम्मल कर रखी है।
ईडी की गिरफ्तारी से उपजी रिक्तता को भरने की तैयारी में अल्पसंख्यक बहुल इस सीट के विधायक सरफराज अहमद का इस्तीफा करवाकर रखा गया है। अगर केंद्रीय चुनाव आयोग इस पर छह महीने के अंदर उपचुनाव कराने की अनिवार्यता में पड़ता है, तो परदे के पीछे से सत्ता की बागडोर सम्हाले कल्पना सोरेन विधायक बनने के रण में होगी।
आगामी लोकसभा चुनाव में बड़ी बहु सीता सोरेन अपनी बेटी यानी शिबू सोरेन की पौत्री जयश्री सोरेन को दुमका सीट से उतारने की तैयारी में है। दुमका से विधायक बसंत सोरेन भी भाई की गिरफ्तारी के दौरान सत्ता पर अपनी हनक को बढ़ाना चाहते हैं। यह परिवार में जारी अंदरूनी खींचतान की वजह है।
दुमका लोकसभा सीट फिलहाल भाजपा के पास है मगर खुद शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन यहां से लोकसभा जाते रहे हैं। गुरूजी के बड़े बेटे विधायक दुर्गा सोरेन के असामयिक निधन के बाद से हेमंत सोरेन परिवार के अन्य सदस्यों को पीछे छोड़ बीते पंद्रह सालों से बुजुर्ग गुरूजी के सियासी वारिस हैं। परिवार के अन्य सदस्य इसमें अपनी प्रत्यक्ष हिस्सेदारी बढ़ाने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। यही वजह है कि हेमंत सोरेन को आखिरी वक्त पर पत्नी कल्पना सोरेन को राजनीति में उतारने के इरादे को बदलना पड़ा।
उन्होंने होशियारी से पत्नी के बजाय मुख्यमंत्री की कुर्सी परिवार के पुराने विश्वस्त चंपाई सोरेन के हाथों सौंपकर पारिवारिक बिखराव को फिलहाल रोक लिया है। यह उनकी बड़ी सियासी सफलता है क्योंकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार कराने में निरंतर लगे रहे प्रतिपक्षी नेताओं का निजी आकलन था कि ईडी की गिरफ्तारी के साथ ही सोरेन परिवार में कलह जोर पकड़ेगी। बुजुर्ग शिबू सोरेन के जीते जी परिवार बिखर जायेगा। विधायक बेटे बसंत सोरेन मुख्यमंत्री होने की चाहत व्यक्त करेंगे। बड़ी बहू सीता सोरेन अपनी देवरानी कल्पना सोरेन के हाथ सदा के लिए जा रही सत्ता को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी। सोरेन परिवार अलग अलग कोने से उठने वाले उत्तराधिकार की मांग की व्यूहरचना में फंसकर भरभराकर गिर जायेगा। मगर ऐसा नहीं हो पाने से विपक्षी भाजपा परेशान है।
जिस तरह से विधायक बसंत सोरेन सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं पाने से नाराज कांग्रेस विधायकों को समझाने बुझाने और सरकार बचाने में सक्रिय हैं, उससे प्रतीत होता है कि सोरेन परिवार ने बड़ी बुद्धिमत्ता से भावी बवंडर को टाल दिया है और सहयोगी कांग्रेस पार्टी के विधायकों के टूट पाने का खतरा भी फिलहाल टल गया है।
घर को सम्हालने के साथ ही शिबू सोरेन परिवार और पार्टी जेल में बंद हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के सहारे कायदे से विस्तार पाने में लगी है। रांची समेत समूचे राज्य की प्रमुख दीवारें केंद्र सरकार विरोधी नरेटिव वाले स्लोगन "झारखंड झुकेगा नहीं "से अटी पड़ी हैं। अगर अगले दो महीने तक स्थिति यथावत बनी रही तो 14 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी को नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही पड़ोसी राज्यों के आदिवासी मतदाताओं पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
इस सहानुभूति को भाजपा विरोधी दल पड़ोसी राज्य ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और बिहार तक फैलाने की फिराक में हैं। ममता बनर्जी ने बंगाल में जिस तरह से कांग्रेस पार्टी को अलग थलग कर रखा है उससे उबरने के लिए कांग्रेस पार्टी ने आदिवासियों पर खास असर रखने वाले झामुमो के तालमेल से बंगाल और ओडिशा की झारखंड से लगने वाले लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को शहीद बताने की तर्ज पर ही पड़ोसी बिहार में विपक्ष के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी खुद के सिर लगे शहादत के टीके को रंगकर जनविश्वास यात्रा पर निकल पड़े हैं। वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी से बनी नई सरकार के खिलाफ हमलावर हैं और बिहार में भाजपा के खिलाफ इंडिया गठबंधन की मजबूत मोर्चाबंदी में लगे हैं। उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल इंडिया गठबंधन की झारखंड सरकार में शामिल है।
बिहार से 40 और झारखंड से 14 लोकसभा सीटें हैं। जेल में बंद हेमंत सोरेन के मौजूदा मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन पर खास असर का नज़ारा है कि वह हर भेंट मुलाकात में अपने साथ हेमंत सोरेन की अप्रत्यक्ष मौजूदगी का अहसास कराते रहे हैं। पिछले दिनों बीस मिनट के एक भाषण में बुजुर्ग मुख्यमंत्री ने युवा नेता हेमंत सोरेन का 27 बार नाम लिया।
दिल्ली के पहले दौरे में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से हुई मुलाकात में भी साफ जता दिया गया कि गठबंधन में सीट बंटवारे संबंधी झामुमो का कोई भी निर्णय सिर्फ और सिर्फ जेल में बंद हेमंत सोरेन की सहमति से ही होना है। मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पहले दिल्ली दौरे में हेमंत सोरेन के भाई और मंत्री बसंत सोरेन तक को शामिल नहीं किया गया। यह इस बात का संकेत है कि जेल के बाहर हेमंत जितने ताकतवर नहीं थे, जेल जाने के बाद पार्टी और प्रदेश में हेमंत सोरेन का नाम प्रभावी हो गया है। यही भाजपा के लिए प्रदेश में मुश्किल का संकेत है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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