Jharkhand Politics: परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई बिहार से झारखंड पहुंची

Jharkhand Politics: बिहार के बाद परिवारवाद की राजनीति का दूसरा गढ़ झारखंड है| नीतीश कुमार ने 24 जनवरी को कर्पूरी ठाकुर की जन्मशती पर परिवारवाद की राजनीति पर चोट करके संकेत दे दिया था कि वह लालू यादव की आरजेडी से गठबंधन तोड़ रहे हैं|

नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं तब से परिवारवाद और भ्रष्टाचार उनके निशाने पर है| उनका कहना है कि परिवारवाद की राजनीति ही भ्रष्टाचार को जन्म देती है| जो कुछ बिहार ने 1997 में देखा था, बिलकुल वही अब झारखंड में होता दिखाई दे रहा है|

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उस समय लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे, चारा घोटाले में उनकी गिरफ्तारी तय हो गई थी| खुद उनकी पार्टी जनता दल के राष्ट्रीय नेता उन पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का दबाव बना रहे थे| लालू यादव खुद ही जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, उन्होंने अध्यक्ष रहते हुए अपनी पार्टी तोड़ी| अपनी खुद की नई पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बना ली, मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया|

अब झारखंड में वही दोहराया जा रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चे के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अवैध खनन और भारतीय सेना की जमीन को अवैध तरीके से बेचने के आरोपों से घिरे हैं| मुख्यमंत्री रहते हुए खनन विभाग भी उनके पास था, और उन्होंने एक खदान खुद अपने नाम पर ही अलॉट करवा ली थी| जब शोर मचा तो उन्होंने लीज सरकार को वापस कर दी थी|

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क़ानून के मुताबिक़ कोई निर्वाचित प्रतिनिधि सरकार से कोई कांट्रेक्ट नहीं ले सकता| ईडी उनसे पूछताछ करना चाहती थी, पिछले साल अगस्त से अब तक उन्हें दस बार सम्मन भेजा गया, लेकिन वह ईडी के सामने पेश नहीं हुए| 31 जनवरी को पहली बार पूछताछ के लिए तैयार हुए, तो ईडी से कहा कि वह उनके घर आकर पूछताछ करे| लेकिन उससे दो दिन पहले ईडी ने हेमंत सोरेन के दिल्ली आवास पर छापा मार कर भ्रष्टाचार के तीन सबूत जुटा लिए, जिनमें एक व्यापारी की ओर से भेंट की गई दो बीएमडब्लू कारें, कुछ दस्तावेज और 36 लाख रूपए नगद थे|

दिल्ली में छापे के बाद 24 घंटे तक उनके लापता होने की अफवाह उड़ती रही, लेकिन 24 घंटे बाद वह रांची में अपने घर से निकलते हुए दिखाई दिए| जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि वह 24 घंटे तक कहाँ थे, तो उन्होंने कहा कि वह तो उनके दिलों में रहते हैं|

20 साल पहले 2004 में ठीक ऐसा ही उनके पिता शिबू सोरेन के साथ हुआ था, जब वह मनमोहन सरकार में मंत्री थे और एक अदालत ने एक नरसंहार के मामले में उनकी गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिए थे| केन्द्रीय मंत्री रहते हुए वह दस दिन तक लापता थे| इसी दौरान उन्हें केन्द्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था| दस दिन बाद जब वह रांची में प्रकट हुए थे, तो उन्होंने कहा कि वह तो गाँवों में लोगों से मिल रहे थे|

अब बीस साल बाद शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी है, तो वह दिल्ली से गायब हो कर रांची में प्रकट हुए| हालांकि किसी मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी इतनी आसान प्रक्रिया नहीं है| ईडी को कई कानूनी रास्तों से गुजरना पड़ेगा, अदालत उसे गिरफ्तारी का वारंट दे भी दे, तब भी पहले राज्यपाल की मंजूरी लेनी होगी| लेकिन हेमंत सोरेन पर गिरफ्तारी की तलवार तो लटकी ही है|

स्वाभाविक है कि किसी भी राजनीतिक दल को वैकल्पिक तैयारी करके रखनी चाहिए| इसलिए हेमंत सोरेन तो पिछले साल सवा साल से वैकल्पिक तैयारी में जुटे हैं| एक साल पहले जब उनकी विधायकी पर संकट गहराया था, तब भी वैकल्पिक तैयारी कर ली गई थी| अब ईडी के दसवें समन के बाद भी लगातार वैकल्पिक तैयारी की बैठकों का दौर जारी है|

विधायकी पर गहराए संकट से लेकर अब ईडी के समन तक वैकल्पिक तैयारी के तौर पर दोनों ही बार हेमंत सोरेन ने अपनी पत्नी कल्पना सोरेन का नाम आगे किया है| हेमंत के पिता शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चे का गठन किया था| झारखंड मुक्ति मोर्चा भी लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल की तरह एक पारिवारिक पार्टी बन चुकी है| हेमंत सोरेन के पिता शीबू सोरेन ने कल्पना सोरेन के नाम पर सहमति दे दी है|

हेमंत सोरेन सरकार को समर्थन देने वाली सोनिया गांधी की कांग्रेस और लालू यादव की आरजेडी को भी कोई एतराज नहीं है| 81 के सदन में झारखंड मुक्ति मोर्चे के इस समय 29 विधायक है, कांग्रेस के 17, आरजेडी और सीपीआई एमएल का एक एक विधायक भी सरकार को समर्थन दे रहा है|

सबकी सहमति के बाद पिछले एक साल से कल्पना सोरेन अपने पति की राजनीतिक उत्तराधिकारी की तरह काम कर रही है| संकट की इस घड़ी में वह गठबंधन विधायक दल की बैठकों में भी हिस्सा ले रही है, जिस पर कांग्रेस के किसी विधायक ने कभी एतराज नहीं किया| 27 जनवरी और 30 जनवरी को हुई विधायक दल की बैठकों में कल्पना सोरेन मौजूद थी| जिससे साफ़ है कि गठबंधन ने प्लान बी के तौर पर कल्पना के नाम पर सहमति दे दी है|

हालांकि कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाए जाने का हेमंत सोरेन के बड़े भाई दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता सोरेन, और छोटे भाई बसंत सोरेन ने विरोध किया है| ये दोनों भी झारखंड मुक्ति मोर्चे के विधायक हैं| 2009 में अपने देहांत से पहले दुर्गा सोरेन अपने पिता शिबू सोरेन के राजनीतिक वारिस थे|

बड़े बेटे के देहांत के बाद शिबू सोरेन ने अपने दो नंबर के बेटे हेमंत सोरेन को अपना राजनीतिक वारिस बना लिया, जबकि दुर्गा सोरेन की पत्नी कल्पना खुद को वारिस बनाए जाने की उम्मीद पाले हुई थी| वह लगातार तीसरी बार विधायक है और आदिवासियों के मुद्दे पर बहुत ही सक्रिय हैं| वह समय समय पर अपने ही देवर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलती रही हैं|

सीता सोरेन की दो बेटियाँ भी राजनीति में सक्रिय हो चुकी हैं| उनकी बेटियों जयश्री और राजश्री ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के लिए अपने पिता के नाम पर पिछले साल दुर्गा सोरेन सेना का गठन किया है| 2022 में एक बार तो अफवाह ही उड़ गई थी कि सीता सोरेन भाजपा की मदद से अपने देवर हेमंत सोरेन की सरकार गिराने की तैयारी कर रही हैं|

उस समय ऐसा कोई ऑपरेशन झारखंड में नहीं हो सका, लेकिन 30 जनवरी की विधायक दल की बैठक से सीता सोरेन और बसंत सोरेन दोनों गायब थे, उनके अलावा कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चे के छह अन्य विधायक भी नदारद थे| जिससे बिहार के बाद झारखंड में ऑपरेशन लोटस की अफवाहें गर्म हुई| झारखंड विधान सभा चुनाव में सिर्फ दस महीने बचे हैं| अक्टूबर में आचार संहिता लागू हो जाएगी और नवंबर-दिसंबर में चुनाव होना है|

जिस तरह छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को जीत हासिल हुई है, उसी तरह झारखंड में भी भाजपा ने बाबू लाल मरांडी को पार्टी में वापस लाकर तगड़ी मोर्चेबंदी कर ली है| भारतीय जनता पार्टी भले ही पिछला विधानसभा चुनाव हार गई थी, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई थी।

झारखंड मुक्ति मोर्चे की भले ही सीटें बढ़ गईं थी, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में गिरावट हुई थी| 2019 में कांग्रेस की सीटें और वोट दोनों ही बढ़े थे, लेकिन पिछले पांच सालों में कांग्रेस की स्थिति देश भर में बेहतर होने के बजाए कमजोर हुई है| खासकर जहां जहां कांग्रेस सत्ता में थी, वहां वहां कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है|

छत्तीसगढ़ और राजस्थान इसका ताजा उदाहरण है, जहां भाजपा ने बिना मुख्यमंत्री का चेहरा सामने रखे कांग्रेस को बुरी तरह हराया, जबकि इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और भूपेश पटेल मजबूत चेहरे थे| इसलिए बिहार और झारखंड के कांग्रेसी विधायकों में भारी बेचैनी है|

28 जनवरी को जब बिहार की कांग्रेस के समर्थन वाली महागठबंधन की सरकार गिर रही थी, तब कांग्रेस के 13 विधायक पहुंच से बाहर हो गए थे| अभी भी यह आशंका बनी हुई है कि नीतीश कुमार की एनडीए सरकार जब विधानसभा में बहुमत साबित करेगी, तब कांग्रेस के कई विधायक उसी तरह वोटिंग से गायब होंगे, जैसे महाराष्ट्र की एनडीए सरकार के बहुमत साबित करते वक्त कांग्रेस के कई विधायक नदारद थे|

इसी तरह झारखंड में अगर ऐसी स्थिति पैदा होती है कि हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो उनके सदन में बहुमत साबित करते वक्त महाराष्ट्र जैसी ही स्थिति पैदा हो सकती और सरकार गिर सकती है| लेकिन झारखंड में भाजपा सीता सोरेन या किसी अन्य की वैकल्पिक सरकार बनवाने के बजाए लोकसभा के साथ ही मध्यवधि चुनाव को प्राथमिकता देगी|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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