Prashant Kishor Yatra: बिहार के केजरीवाल बनेंगे प्रशांत किशोर?
प्रशांत किशोर इस समय बिहार में जनसुराज यात्रा पर हैं। 12-15 महीनों में बिहार के गांवों और शहरों में करीब 3500 किमी की यात्रा करने की उनकी योजना है। लेकिन उनकी इस यात्रा को बिहार के लोग किस तरह देख रहे हैं?

Prashant Kishor Yatra: प्रशांत किशोर अब तक पूरे देश में एक जाना पहचाना नाम बन चुके हैं। एक अंग्रेजी अखबार के ऑनलाइन साक्षात्कार में पत्रकार ने उन्हें बताया कि उनको सुनने और पढ़ने वालों में सिर्फ हिन्दी पट्टी के लोग ही नहीं हैं। उनके साक्षात्कारों को दक्षिण भारत में भी खूब पसंद किया जा रहा है। प्रशांत को लोग सुनना चाहते हैं। ऐसे में जब वे लोगों को विश्वास दिलाते हैं कि बिहार का विकास कोई सपना नहीं है। वह सच हो सकता है तो बिहार के लोग इस बात पर विश्वास करना चाहते हैं।
उन पर लोग विश्वास करें इसके लिए आवश्यक है कि उनके कहे में स्पष्टता हो। जब उनसे पूछा जाता है कि वे खुद को सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं, राजनेता, या फिर चुनावी विश्लेषक तो इस सवाल के जवाब में वे अक्सर उलझ जाते हैं। जवाब देते हुए ऐसा लगता है कि वे खुद भी अपने जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। पिछले दिनों जब एक पत्रकार ने प्रशांत से पूछा कि क्या है प्रशांत किशोर? बिहार में सत्ता की आहट टटोलने वाली महत्वाकांक्षी राजनीति के लिहाज से अभी युवा नेता? इस प्रश्न के जवाब में प्रशांत ने कहा - ''आप मुझे पॉलिटिकल एक्टिविस्ट कहें। नेता तो जनता बनाएगी। यदि बनाएगी तो।''
वे बिहार में एक नई राजनीतिक व्यवस्था लाने के सपने के साथ कुछ साल लगाने के लिए आए हैं। उनकी नई राजनीतिक व्यवस्था तीन मूलभूत बातों पर आधारित होगी। सही लोग, सही सोच और सामूहिक प्रयास।
जब विकास की प्रतिस्पर्धा में पूरा देश आगे की तरफ भाग रहा था। नीतीशजी के सुशासन के बावजूद बिहार सबसे पीछे क्यों रह गया? आज के दौर में जब यह सवाल नीतीश कुमार से किया जाए तो वे इसकी जिम्मेवारी राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद पर नहीं डाल सकते। बिहार के इस अंधकारमय वातावरण में यही सवाल है जो प्रशांत किशोर के लिए जगह बना रहा है।
इस समय बिहार में जितने भी सक्रिय राजनीतिक दल हैं, सभी कभी ना कभी सत्ता में रहे हैं। अब उनके द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर बिहार के लोग बहुत विश्वास नहीं करेंगे। पलट कर सवाल जरूर कर सकते हैं कि जब तुम सत्ता में थे तो क्या किया? प्रशांत जानते हैं कि महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख से लेकर अन्ना हजारे तक की परंपरा में एक बात समान थी। इन सबने सत्ता से खुद को दूर रखा। भारतीय समाज में त्याग करने वालों का मान बहुत है। इसका लाभ दिल्ली की राजनीति में केजरीवाल ने उठाया, जो भारतीय समाज के बीच झोला लेकर आंदोलनकर्मी बनकर आए।
गांधीवादी अन्ना हजारे के साथ केजरीवाल ने संकल्प लिया था कि सक्रिय राजनीति में कभी हिस्सा नहीं लेंगे। जब समाज का विश्वास हासिल कर लिया, उसके बाद अन्ना को हाशिए पर डालकर सक्रिय राजनीति में उतर गए। प्रशांत इस बात को समझते हैं लेकिन जब वे मंच से इस बात को स्वीकार नहीं पाते तो उनके अपने कार्यकर्ता भ्रमित होते हैं। इसलिए वे कई बार प्रशांत किशोर और उनके अभियान से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे पाते और एक-एक व्यक्ति तक प्रशांत का पहुंचना संभव नहीं है। इसलिए वे जिस भी उद्देश्य के साथ बिहार के मैदान में उतरे हैं और सड़कों की खाक छान रहे हैं। वह स्पष्ट होना चाहिए और उसमें किंतु-परंतु कम से कम होना चाहिए।
नब्बे के दशक में जब बिहार में लालूजी का शासन आया। वह बूथ लुटेरों का दौर था, जो नेताओं के लिए बूथ लूटते थे। बाद में इन बूथ लूटने वाले 'डकैतों' को लगा कि जब हम बूथ लूटकर नेता को विधायक, सांसद, मंत्री बना सकते हैं तो खुद अपने लिए बूथ क्यों ना लूटे? यह भारतीय राजनीति के अपराधीकरण और बिहार की राजनीति के लालूकरण का दौर था। तब राजनीति में आने के लिए साफ सुथरी छवि की अनिवार्यता खत्म होने लगी। जिस पर जितने अधिक मुकदमे। वह उतना ही योग्य उम्मीदवार।
बहरहाल, बूथ लुटेरों के बाद अब चुनावी रणनीतिकारों और विश्लेषकों के राजनीति में उतरने का समय है। उन्हें भी लगता है कि वे चुनाव जिता सकते हैं तो जीत क्यों नहीं सकते? मैदान में उतरने वालों के सामने योगेन्द्र यादव जैसा उदाहरण भी है, जो अपनी पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरे और एक एक सीट पर अपनी जमानत जब्त कराई। तब शिगूफ़ा खूब चला कि दूसरों की चुनावी जीत हार का खूब विश्लेषण करते थे और अपनी पार्टी का भविष्य नहीं देख पाए।
प्रशांत किशोर सावधान हैं। वे राजनीति में उतरने से पहले बिहार के लोगों को बता रहे हैं कि बिहार का पिछड़ापन तब तक खत्म नहीं होगा, जब तक बिहार के सच्चे और अच्छे लोग सामूहिक प्रयास ना करें। उनके इस प्रयास से ही बिहार के आगे का रास्ता बेहतर हो सकता है। अगला एक साल वे ऐसे लोगों की तलाश करने, उनसे मिलने और उन्हें एकजुट करने में लगाने वाले हैं, जिनकी रूचि बिहार के विकास में है।
यह राजनीति में उतरने का केजरीवाल मॉडल है, जिसमें उतरने वाला पहले सामाजिक अभियान लेकर समाज के बीच में जाता है। राजनीति में सीधे उतरने से पहले वह बहाव के तापमान और धार का सही सही अनुमान लगा लेना चाहता है। वह चाहे एक तरफ कह रहे हैं कि उन्हें राजनीति में नहीं उतरना। वे सिर्फ लोगों को एकत्रित कर रहे हैं। नेतृत्व लोग तय करेंगे लेकिन साथ ही साथ वे ये भी कह जाते हैं कि वे पॉलिटिकल एक्टिविस्ट हैं और नेता उन्हें जनता बनाएगी।
प्रशांत कहते हैं कि एक बार उनकी सोच से सहमत होने वालों का एक बड़ा समूह इकट्ठा हो गया फिर वे सभी तय करेंगे कि कोई राजनीतिक दल खड़ा करना है तो वह दल बनेगा। जिसका वे सिर्फ एक हिस्सा होंगे। यह बात हुई कहने वाली लेकिन प्रशांत को जानने वाले ही बताते हैं कि वह सुनते सबकी हैं लेकिन अपने सामने चलने किसी की नहीं देते। अपने इसी स्वभाव के कारण वे कांग्रेस के साथ काम नहीं कर पाए और इसी स्वभाव की वजह से भाजपा और जदयू से उनके रिश्ते खराब हुए।
प्रशांत किशोर के आधा दर्जन साक्षात्कारों को सुनते हुए यह कई बार लगा कि अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत किशोर की राजनीतिक यात्रा की पटकथा किसी एक ही व्यक्ति ने लिखी है। फिर भी प्रशांत किशोर की राजनीतिक यात्रा पर किसी तरह की भविष्यवाणी करना इस समय जल्दबाजी होगी हालांकि इस यात्रा को प्रारंभ करने के लिए उनके पास समय बहुत कम है। शेष बिहार वालों के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि वे अपने सारे पत्ते 2024 में खोलते हैं या फिर 2025 में, वे बिहार में कोई बड़ा परिवर्तन लेकर आते हैं।
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पटना के एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं ''पिछले तीस सालों में कुछ भी तो नहीं बदला। पहले 'जंगलराज' था। बाद में जंगलराज का नाम 'सुशासन' रख दिया गया। सुशासन में रिश्वत कम नहीं हुई बल्कि थाना, अंचल और प्रखंड में सुशासन का टैक्स जनता को अलग से चुकाना पड़ा। यह राजनीतिक तौर पर सबसे जागरूक प्रदेश माने जाने वाले बिहार की राजनीतिक सच्चाई है।'' इसी के साथ उन्होंने प्रशांत किशोर की राजनीति की गुंजाइश का रास्ता भी दिखा दिया। बिहार के लोगों ने जिस पर विश्वास किया, ठगे गए। उन्हें अब एक ऐसा विकल्प चाहिए, जिस पर वे विश्वास कर सकें और ठगे ना जाएं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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