Aditya L1: चंद्रयान के बाद अब इसरो का सूर्य नमस्कार
Aditya L1: चंद्रमा की सतह पर अंतरिक्ष यान उतारने के महज 9 दिन बाद अब भारत का आदित्य एल1 यान 2 सितंबर को सूर्य के अनुसंधान के लिए निकलने वाला है। वैसे तो आदित्य एल 1 मिशन की योजना 2008 में ही बनाई गई थी, लेकिन चंद्रयान2 की आंशिक और चंद्रयान1 एवं चंद्रयान 3 की पूर्ण सफलता से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के वैज्ञानिक आत्म-विश्वास से भरे हुए हैं।
इसलिए वैज्ञानिक दल व्यस्तताओं के बावजूद 2 सितंबर की निर्धारित तिथि को आदित्य एल1 के प्रक्षेपण के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 2 सितंबर को सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोट स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से आदित्य एल1 को सूर्य की ओर प्रक्षेपित किया जाएगा। प्रक्षेपण के लिए पोलर सैटेलाइट व्हीकल का इस्तेमाल किया जाएगा। बीते बुधवार को प्रक्षेपण से पूर्व का पूर्वाभ्यास सफलतापूर्वक पूरा किया गया और इसरो के अनुसार, करीब 400 करोड़ की लागत से बना यह यान प्रक्षेपण के लिए पूरी तरह तैयार है।

क्या है सौर मिशन आदित्य एल1
इसरो के मिशन दस्तावेज (आदित्य एल1 बुकलेट) के अनुसार, आदित्य एल1 सूरज की भौतिक क्रियाओं और सौर मंडल वातावरण में उन क्रियाओं के प्रभावों का अध्ययन, अन्वेषण करने वाला विभिन्न वैज्ञानिक उपकरणों से लैस एक अंतरिक्ष यान है। यह यान पृथ्वी और सूर्य के बीच एक खास बिंदु की हालो आर्बिट में स्थापित होकर अध्ययन डेटा एकत्र करेगा।
इस खास बिंदु का नाम एल1 है, जो पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर है। एल1, लैगरेंज1 का संक्षिप्त नाम है और हालो आर्बिट लैगरेंज बिंदु की एक विशेष गुण वाली कक्षा है। सुदूर अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले यानों को लैगरेंज बिंदु के हालो आर्बिट में इसलिए स्थापित किया जाता है क्योंकि यहां पृथ्वी और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल यान की सापेक्षता में उदासीन हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप यान बहुत कम ईंधन खपत के साथ स्थिर रहता है और बिना किसी बाधा के अपना कार्य संचालित करता है।
संक्षेप में और आम लोगों की भाषा में कहें तो आदित्य एल-1 एक अंतरिक्ष वेधशाला है, जिसमें बहुत कुछ 'दूरबीन' की तरह काम करने वाले उपकरण लगे हैं, जो चौबीसों घंटे सूर्य का अवलोकन और अध्ययन करते रहेगें।
आदित्य एल1 के लक्ष्य
ऐसे तो आदित्य एल1 के कई वैज्ञानिक लक्ष्य हैं, लेकिन इनके मुख्य लक्ष्य चार हैं। यान में लगे उपकरण (कुल सात) सूर्य की बाहरी परत यानी कोरोना के उष्मायन और सौर हवा की वेगमय वृद्धि के अध्ययन के लिए डेटा संग्रह करेगा। उल्लेखनीय है कि सूर्य की बाहरी परत का तापमान इसकी ऊपरी परत से अधिक होती है, जोकि विज्ञान के लिए एक पहेली है। आदित्य एल1 इस पहेली का हल खोजने का प्रयास करेगा।
दूसरा प्रमुख लक्ष्य कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमआई), ज्वाला और निकट पृथ्वी के मौसम को समझना है। सीएमआई वह प्रक्रिया जिसमें काफी तेज गति से सूर्य की ऊपरी परतों से आग का पिण्ड बाहर निकलता है, जिसमें कोरोना परत के कई पदार्थ बाहर निकलते हैं। इससे लम्बी-लम्बी अत्यधिक गर्म ज्वाला पानी की लहर की तरह निकलती है और यह दूर तक जाती है। यह घटना अन्य नजदीकी सोलर ग्रहों के अलावा पृथ्वी के अंतरिक्ष-मौसम को प्रभावित करती है।
इस अध्ययन यान का तीसरा प्रमुख लक्ष्य सूर्य के वातावरण का युग्मन और गतिकी को समझना है, जिससे भविष्य के अंतरिक्ष अनुसंधान समेत कृत्रिम उपग्रहों के प्रक्षेपण और सुरक्षा में मदद मिलेगी। चौथा प्रमुख लक्ष्य सौर हवा के वितरण और तापमान प्रेरित बलों के गूढ़ समीकरणों को समझना है। गौरतलब है कि सौर अध्ययन के लिए एकल योजना के तहत सिर्फ अमेरिका, रूस और यूरोपीय एजेंसी ही कोई यान स्थापित कर पाया है। अगर आदित्य एल1 सफल रहता है तो भारत चौथा देश होगा जो यह कीर्तिमान स्थापित करेगा।
क्यों महत्वपूर्ण है आदित्य एल1
यह भारत का प्रथम सौर अध्ययन यान है। इसकी महत्ता इस बात का परीक्षण करना है कि भारत तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल अंतरिक्ष अनुसंधानों में कितनी दक्षता हासिल कर पाया है। गौरतलब है कि लैगरेंज बिंदुओं पर यान को स्थापित करने के लिए अति उन्नत तकनीकी दक्षता की आवश्यकता होती है। अगर भारत आदित्य एल1 को इसके निर्धारित बिंदु पर भेजने में सफल होता है, यह बात अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि होगी।
कई अन्य अप्रत्यक्ष कारणों से भी आदित्य एल1 काफी महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि सीएमआई या सूर्य के आवेशित कणों के बाहर निकलने के कारण कृत्रिम उपग्रहों, संचार प्रणाली और बिजली के ग्रिडों को नुकसान पहुंचाते हैं। अभी अगस्त में ही एक ऐसी ही सौर लहर के कारण उत्तर अमेरिका की रेडियो संचार प्रणाली ठप हो गयी थी। सारी दुनिया इस खतरे को समझती है और विकसित देश इससे रक्षा के लिए प्रणाली विकसित करने के लिए प्रयासरत है।आदित्य ए
ल-1 सूर्य से आने वाले विकिरण की किसी भी बड़ी लपट के विरुद्ध एक प्रकार की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली उपलब्ध कराएगा। भारत के पास आज लगभग 50,000 करोड़ रुपए की अंतरिक्ष संपत्ति है, जिसकी रक्षा और बचाव के लिए सूर्य की गतिविधियों की जानकारी आवश्यक है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह अंतरिक्ष के क्षेत्र में किए जा रहे विकास के बचाव के लिए ऐसे मिशन अब बस वैज्ञानिक शौक भर नहीं है, बल्कि आवश्यकता हैं।
एक सफलता दूसरी सफतलाओं का रास्ता तैयार करती है। भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम पर यह बात पूरी तरह लागू होती है। चंद्रयान-1 से चंद्रयान-3 तक के मात्र 15 साल के सफर में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान ने जो उन्नति की है, वहां तक पहुंचने में रूस और अमेरिका जैसे देशों को कई दशक लग गए थे। लेकिन इसमें और विस्तार की जरूरत है। इसरो अध्यक्ष एस सोमनाथ के अनुसार, 'हम चंद्रमा के आगे मंगल या शुक्र और इससे आगे की यात्रा करने में सक्षम है। इसके लिए हमें अपने आत्म-विश्वास को लगातार आगे बढ़ाते रहना होगा।'
कोई संदेह नहीं कि आदित्य एल1 की सफलता विस्तार की एक अहम कड़ी होगी। 15 लाख किलोमीटर की लम्बी यात्रा करने के बाद जब दिसंबर के आखिरी सप्ताह में यह यान अपने लक्ष्य पर पहुंचेगा, वह दिन अंतरिक्ष में भारतीय श्रेष्ठता का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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