Indo-Pacific: पापुआ न्यू गिनी क्यों गये प्रधानमंत्री मोदी?
प्रशांत महासागर स्थित द्वीप समूहों में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पापुआ न्यू गिनी की यात्रा करके क्षेत्र में भारत के महत्त्व को पुनर्स्थापित किया है।

Indo-Pacific: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब प्रशांत महासागर के छोटे से द्वीप पापुआ न्यू गिनी पहुंचे तो उनका भव्य स्वागत हुआ। आमतौर पर पापुआ न्यू गिनी में सूरज ढलने के बाद आने वाले किसी भी नेता का औपचारिक स्वागत नहीं किया जाता किन्तु भारत के प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार किसी का यहां आना सभी अपवादों से परे रहा। यही नहीं, नरेन्द्र मोदी के समकक्ष प्रधानमंत्री जेम्स मारापे हवाई अड्डे पर उनके सम्मान में पैर छूते हुए नजर आये।
भारत में इस तस्वीर की खूब चर्चा हुई, लेकिन इस बात पर कोई खास चर्चा नहीं हुई कि प्रधानमंत्री मोदी ने पापुआ न्यू गिनी की यात्रा क्यों की? पापुआ न्यू गिनी न केवल प्राकृतिक संसाधन के रूप में बल्कि सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण एक देश है। पापुआ न्यू गिनी मुख्य रूप से वनवासी लोगों का देश है और विविधताओं से भरा हुआ है। लेकिन उसके प्राकृतिक संसाधन और प्रशांत महासागर में उसकी भौगोलिक स्थिति उसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण देश बना देते हैं।
2014 में नरेन्द्र मोदी की फिजी यात्रा के दौरान 'भारत और प्रशांत द्वीप समूह सहयोग' का गठन किया गया था। यह 1971 में स्थापित 'प्रशांत द्वीप समूह फोरम' की तर्ज पर गठित किया गया ताकि अपने संसाधन संपन्न विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के साथ भारत और ये द्वीप समूह तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) तथा हाइड्रोकार्बन जैसे प्राकृतिक संसाधनों को साझा कर नए बाजार का विकल्प तैयार कर सके। इस संगठन के गठन का एक उद्देश्य प्रशांत महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों को सामरिक रूप से काउण्टर करना भी था। भारत की इस कूटनीति को अमेरिका का भी साथ मिल रहा है क्योंकि चीन का प्रशांत महासागर क्षेत्र में बढ़ता प्रभाव उसके परमाणु तथा सामरिक हितों को कमजोर करेगा।
द्वितीय विश्व युद्ध से प्रशांत द्वीप क्षेत्र बना अखाड़ा
हम इतिहास की पुस्तकों में पढ़ते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के कई प्रमुख कारणों में प्रथम विश्व युद्ध के बाद होने वाली वर्साय संधि की कठोर शर्तें, आर्थिक मंदी, जर्मनी-जापान में सैन्यवाद का उदय, राष्ट्र संघ की विफलता थे। किन्तु वृहद् नजरिये से देखें तो प्रशांत महासागर में स्थित ये द्वीप समूह भी शाही जापान और इंग्लैंड के बीच युद्ध का प्रबल कारण बना। चूंकि उस कालखंड में जापान का इन द्वीप समूहों पर बड़ा प्रभाव था और इंग्लैंड अपने उपनिवेश का इस क्षेत्र में विस्तार करने में जुटा था, जिस कारण दोनों देशों में तल्खी बढ़ी। विश्व युद्ध के अंतिम चरण में मित्र राष्ट्र अमेरिका के पर्ल हार्बर नौसैन्य अड्डे पर जापानी आक्रमण के बाद सारे समीकरण बदल गए।
अमेरिका ने परमाणु हमला कर जापान को झुका दिया और इंग्लैंड भी बदलती वैश्विक परिस्थिति के कारण उसकी ताकत के समक्ष नतमस्तक हो गया। कमजोर होता इंग्लैंड अमेरिका के लिए प्रशांत महासागर क्षेत्र को खाली छोड़ गया। अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने अनेक सैन्य अड्डे स्थापित किए और एक मजबूत ब्लू वाटर नेवी का गठन किया जिसका तात्पर्य है अपनी समुद्री सीमाओं की तुलना में बहुत बड़े समुद्री क्षेत्र में खुद को स्थापित करने की क्षमता रखना।
हालांकि 1960 के बाद मजबूत होते चीन ने धीरे-धीरे अमेरिका की इस क्षेत्र में बादशाहत को चुनौती दी और चीन सैन्य अभ्यास के लिए इस क्षेत्र का प्रयोग करने लगा। यही बात अमेरिका को कचोटती है और यही कारण है कि उसने ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान, इंडोनेशिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, फिजी, वियतनाम और ब्रूनेई के साथ 'इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी' का गठन किया। इसका उद्देश्य था व्यापार के माध्यम से इन देशों को एक छत के नीचे लाकर इस क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को चुनौती देना।
चूँकि चीन इस क्षेत्र को अपने बेल्ट एंड रोड परियोजना का हिस्सा मानता है और बड़े पैमाने पर आर्थिक निवेश करता है अतः इसकी काट के रूप में जी-7 समूह ने इन द्वीप समूह के देशों में विकास परियोजनाओं को निधि देने के लिये 600 बिलियन डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा है। ऐसा करके अमेरिका और उसके सहयोगी देश प्रशांत महासागर में स्थित देशों का चीन के प्रति झुकाव कम करना चाहते हैं।
यदि अमेरिका महाशक्ति बने रहना चाहता है तो उसे प्रशांत महासागर क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत रखनी होगी। इसके लिए वह भारत को अपने साथी के रूप में देख रहा है। उधर चीन की विस्तारवादी नीति और भारत विरोध को कमजोर करने के लिए ऐसा करना भारत के लिए भी आवश्यक है। यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इन देशों में भारत की आर्थिक, सामरिक व वाणिज्यिक गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी से भारत बना रहा मजबूत गठबंधन
2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने 1991 की लुक ईस्ट पॉलिसी को बदलकर एक्ट ईस्ट पॉलिसी कर दिया और 'भारत और प्रशांत द्वीप समूह सहयोग' का गठन कर इस क्षेत्र में मजबूती से अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए। फिजी और पापुआ न्यू गिनी में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी है अतः इन देशों से व्यापार संबंध पहले के मुकाबले और सुदृढ़ हुए हैं। साथ ही कुक आइलैंड्स, किरिबाती, मार्शल आइलैंड्स, स्टेट्स ऑफ माइक्रोनेशिया, नौरू, नीयू, पलाऊ, समोआ, सोलोमन आइलैंड्स, टोंगा, तुवालू और वानुआतु के साथ भी अब संबंधों को नए आयाम दिए जा रहे हैं।
इन देशों के साथ डिजिटल स्वास्थ्य, नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु, भू-सामरिक परिपेक्ष्य और आपदा के जोखिम को कम करने जैसे मुद्दों पर साझेदारी की जा रही है। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर भी दोनों पक्ष आम राय बना रहे हैं। भारत ने दुनिया की भविष्यगत स्थिति को भांपते हुए इन देशों को अनुदान के तौर पर 2,00,000 अमेरिकी डॉलर सालाना सहायता करने का वादा किया है।
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इसके अलावा इस क्षेत्र के अधिकांश देशों में लोकतंत्र अभी मजबूत नहीं है। ऐसे में चीन का हस्तक्षेप इनके आतंरिक व राजनीतिक मामलों में होता है। भारत का इन देशों के निकट आना लोकतान्त्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के साथ ही चीन की विस्तारवादी नीति को भी कुंद करेगा। इन देशों का भारत के साथ आना इनके लिए भी विकास के द्वार खोलेगा क्योंकि चीन ने अपने कर्ज के जाल में इनकी अर्थव्यवस्था को चौपट करते हुए इनके संसाधनों का दोहन किया है।
मोदी की पापुआ न्यू गिनी यात्रा से निश्चय ही प्रशांत महासागर पॉलिसी को नया बल मिला है। जिस तरह से वहां के राष्ट्रपति ने पैर छूकर प्रधानमंत्री मोदी को सम्मान दिया है उससे इस बात का संकेत भी मिलता है प्रशांत महासागर के द्वीप समूह चीन की अपेक्षा भारत के साथ अधिक सहज और आत्मीय हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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