Nuclear Energy: परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
Nuclear Energy: गुजरात में काकरापार परमाणु ऊर्जा परियोजना ने व्यावसायिक परिचालन सफलतापूर्वक शुरू कर दिया है। प्रोजेक्ट के माध्यम से, भारत ने इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण छलांग लगाई है। केएपीपी-3 हमारा पहला बड़ा स्वदेशी परमाणु रिएक्टर है। पिछले स्वदेशी रिएक्टरों की 220 मेगावाट और 540 मेगावाट के मुकाबले यह 700 मेगावाट परमाणु बिजली उत्पन्न कर सकता है। केएपीपी-3 को देश की परमाणु ऊर्जा की यात्रा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। यह न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के उस महत्वाकांक्षी लक्ष्य की पूर्ति की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है, जिसके अंतर्गत एनपीसीआईएल को देश भर में 700 मेगावाट के सोलह स्वदेशी रिएक्टर स्थापित करने हैं। इनमें दस को सरकार ने मंजूरी भी दे दी है।

इनमें, इसी साइट पर एक और स्वदेशी रिएक्टर केएपीपी-4 को शुरू करने की तैयारियॉं जोर-शोर से चल रही हैं। 700 मेगावाट क्षमता वाला केएपीपी-4 प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर है, जो मई तक 96.92 प्रतिशत तक की प्रगति दर हासिल कर चुका था। जिन अन्य साइटों पर वर्तमान में काम चल रहा है, वे राजस्थान के रावतभाटा (आरएपीएस 7 और 8) और हरियाणा के गोरखपुर (जीएचएवीपी 1 और 2) हैं। इनके अलावा, परियोजना में मध्य प्रदेश के चुटका, राजस्थान में बांसवाड़ा और कर्नाटक में कैगा साइटें भी शामिल हैं।
जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना जरूरी
इस पूरी कवायद का मकसद है, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना को गति देते हुए भारत की ऊर्जा क्षमता को बढ़ाना। यह इसलिए जरूरी है कि धरती पर तेजी से जीवाश्म ईंधनों की उपलब्धता कम हो रही है। भारत में भी इसका भीषण संकट निकट नजर रहा है। माना जाता है कि जीवाश्म ईंधनों की हमारे यहॉं जितनी खपत है, उसे देखते हुए वर्ष 2060 तक हमारे यहॉं जीवाश्म ईंधन पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। इसीलिए भारत अपनी विद्युत उत्पादन क्षमता की जीवाश्म स्रोतों पर निर्भरता लगातार कम करने का प्रयास कर रहा है और इसमें उसे खासी सफलता भी मिली है। देश में इसे वर्ष 2030 तक घटाकर 60% करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन हमने इसे 2021 में ही हासिल कर लिया है।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, हम जितनी बिजली अपने यहॉं उत्पादन व उपभोग करते हैं, उसमें लगभग 61% हिस्सेदारी जीवाश्म ईंधन अर्थात् कोयला, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम और अन्य गैसों से बनाई जाने वाली बिजली की है, बाकी 33% जल, वायु, सूरज, बायोमास आदि जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से और शेष 6% परमाणु ऊर्जा से मिलती है। वर्तमान में भारत के कुल उर्जा उत्पादन 4 लाख 16 हजार मेगावाट में परमाणु उर्जा की हिस्सेदारी 7,380 मेगावाट है। दूसरे देशों की तुलना करें तो हम इस मामले में फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका से काफी पीछे खड़े नजर आते हैं, जहॉं बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी क्रमश: 65, 23 व 10 प्रतिशत है।
सात दशकों से जारी है परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम
भारत में परमाणु ऊर्जा को लेकर क्रेज कोई नया नहीं है। इस क्षेत्र में हमने 67 साल पहले ही प्रवेश कर लिया था, जब 4 अगस्त, 1956 को देश के पहले परमाणु रिएक्टर 'अप्सरा' का शुभारंभ किया गया। वैसे तो इसकी संकल्पना और निर्माण हमारा ही था, लेकिन एक विशेष अनुबंध के तहत इसके लिए परमाणु ईंधन की आपूर्ति ब्रिटेन द्वारा की गई थी। इसके बाद 1960 में शुरू होने वाला, हमारा दूसरा रिएक्टर साइरस, कनाडा के सहयोग से विकसित किया गया था। हमारे यहॉं परमाणु ऊर्जा से विद्युत उत्पादन 1969 में तारापुर स्थित दो रिएक्टरों के द्वारा शुरू हुआ। यह आज भी देश में सबसे कम लागत वाली नॉन हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई के लिए जाना जाता है।
जहॉं तक परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के निर्माण और विकास में आत्मनिर्भरता का प्रश्न है, हमने इसकी शुरुआत चार दशक पहले ही कर दी थी, जब जुलाई 1983 में चेन्नई के निकट कलपक्कम में देश के तीसरे और पहले पूर्ण स्वदेशी परमाणु बिजलीघर की स्थापना की और उन देशों की श्रेणी में आ खड़े हुए, जो अपने बूते पर परमाणु बिजली इकाइयों की डिज़ाइनिंग और निर्माण में सक्षम थे। बाद के दो दशकों में हमने स्वदेशी प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए देश में ग्यारह 220 मेगावाट यूनिटों तथा दो 540 मेगावाट यूनिटों की स्थापना की, जिन्हें 'प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर' कहा जाता है। 700 मेगावाट का केएपीपी-3 और इसके जैसे दूसरे आगामी रिएक्टर इन्हीं इरादों का विस्तार हैं, जिनके माध्यम से हम इस क्षेत्र में अपनी गति को तेज करने का इरादा रखते हैं।
विद्युत उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधनों पर हमारी निर्भरता कार्बन उत्सर्जन के लिए काफी जिम्मेदार है। परमाणु ऊर्जा इसे कम करने में बड़ा योगदान कर सकती है। इस लिहाज से भी भारत अपनी हिस्सेदारी को उत्तरोत्तर बढ़ाते रहना चाहता है। ताकि आने वाली चुनौतियों का मुकाबला करने के साथ-साथ नेट जीरो लक्ष्यों को भी हासिल कर सके।
डराती है हादसों की यादें
यह राह इतनी आसान नहीं है। भले ही सरकार परमाणु ऊर्जा के लाख फायदे गिनाए, लेकिन लोगों में इसे लेकर बहुत सारे भय और आशंकाएं हैं। उन्हें लगता है कि परमाणु बिजलीघर भी पर्यावरण, खासकर जलीय जैव विविधता के लिए बहुत हानिकारक हैं। साथ ही इनसे उत्पन्न होने वाला विकिरण कैंसर का कारण बनता है। इसलिए, जहॉं भी परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के निर्माण की बात चलती है, स्थानीय लोगों में उसके खिलाफ सुगबुगाहट शुरू हो जाती है।
26 अप्रैल 1986 को यूक्रेन के चेर्नोबिल शहर में विश्व की अब तक की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटना हुई, जिसने पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को परमाणु ऊर्जा के फायदों के साथ-साथ इसके खतरों के बारे में सोचने के लिए भी मजबूर कर दिया। इस हादसे में आधिकारिक तौर पर सिर्फ 50 लोगों के मरने की पुष्टि की गई थी, लेकिन इसकी वजह से होने वाला विकिरण इतना ज्यादा था कि इस संयंत्र की साइट के तीस किलोमीटर क्षेत्र, लगभग 2800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल, को खाली कराकर वहॉं रहने वाले 3.5 लाख लोगों को दूसरे स्थानों पर भेजा गया। बाद में इस निर्जन क्षेत्र को संशोधित कर 4300 वर्ग किमी बढ़ा दिया गया। बताया जाता है कि पचास लाख लोग इससे उत्पन्न विकिरण की चपेट में आए थे, जिनमें करीब चार हजार की मौत कैंसर से हुई।
इस तरह की घटनाओं में किस दर्जे तक की असंवेदनशीलता दिखाई जाती है, इसका अंदाजा तत्कालीन सोवियत संघ के रवैये से लगाया जा सकता है। शेष दुनिया को इस दुर्घटना का पता तब लगा, जब स्वीडन के परमाणु ऊर्जा रिएक्टर फोर्समार्क में रेडिएशन अलार्म बजने शुरू हुआ। जब इसके स्रोत तलाशे गए तो सोवियत संघ को मानना पड़ा कि उनके देश में यह दुर्घटना हुई थी।
लोग इस हादसे को धीरे-धीरे भूलने लगे थे। लेकिन, 11 मार्च 2011 को जापान के फुकुशिमा दाई-ईची परमाणु संयंत्र में हुए एक और हादसे ने उन्हें फिर से दहशत में डाल दिया। यहॉं कहर तोहोकु भूकंप और सुनामी ने बरपाया था। इसकी वजह से बिजली आपूर्ति फेल हो गई, जिससे संयंत्र के तीन रिएक्टरों में शीतलन प्रणाली ने काम करना बंद कर दिया। परमाणु सामग्री में हुए विस्फोटों ने वहॉं तापमान को बहुत बढ़ा दिया। इसकी वजह से भी करीब तीस किलोमीटर क्षेत्र में विकिरण फैलने की आशंका जताई गई थी। करीब 47 हजार लोगों को विस्थापित होना पड़ा। रिएक्टरों को ठंडा करने के लिए जो जल इस्तेमाल किया गया, उसे विकिरण की आशंकाओं के मद्देनजर पानी में नहीं छोड़ा जा सकता था, तो उसे वहीं टैंकों में इकट्ठा किया जाता रहा।
अब इस 13 लाख टन रेडियोएक्टिव पानी का निस्तारण जापानी सरकार के गले की हड्डी बन गया है। पिछले हफ्ते, जब जापान यूरोपीय संघ द्वारा फुकुशिमा हादसे की वजह से लगाए गए खाद्य आयात प्रतिबंध हटाए जाने की घोषणा का जश्न मना रहा था, चीन और हांगकांग जैसे उसके पड़ोसी और स्थानीय नागरिक इस पानी को समुद्र में बहाने की उसकी योजना का विरोध कर रहे थे।
ये तो बड़े हादसे थे। उपलब्ध जानकारियॉं बताती हैं कि चेर्नोबिल हादसे के बाद भी, वर्ष 2014 तक दुनिया भर में सौ से ज्यादा परमाणु ऊर्जा से संबंधित दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इस लिहाज से लोगों का विश्वास जीतना, सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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