Operation Dost: मानवता और कूटनीति की विजय
तुर्की में ऑपरेशन दोस्त का संचालन कर भारतीय राहत एवं बचाव दल वापस लौट आया है। भारत की ओर से भेजे गये राहत और बचाव दल ने भूकंप पीड़ित तुर्की की जो मदद की है, उसका मानवीय और कूटनीतिक प्रभाव होगा।

Operation Dost: तुर्की में ऑपरेशन दोस्त चला रही एनडीआरएफ की टीम शुक्रवार को स्वदेश लौट आयी। एनडीआरएफ जवानों का पहला सी-17 ग्लोबमास्टर विमान सुबह 9:00 बजे हिंडन एयरपोर्ट पहुंचा। इस टीम ने दस दिनों तक 6 फरवरी को तुर्की में आये भीषण भूकंप के बाद लोगों की मदद की थी।
भारत और तुर्की के कूटनीतिक संबंधों को सामान्य या अच्छा नहीं कहा जा सकता किंतु 6 फरवरी को आये भूकंप के बाद भारत ने "वसुधैव कुटुंबकम्" के सनातन मूल्यों के अनुरूप बचाव और सहायता कार्य के लिए तत्काल प्रस्ताव कर दिया। भारतीय सेना और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अपनी तैयारी तत्काल शुरू कर दी। भारत उन पहले देशों में था जिसने तुर्की को न सिर्फ सहायता का प्रस्ताव किया बल्कि सबसे पहले बचाव और राहत दल भेजा।
दुनिया के सबसे बड़े मालवाहक जहाजों में से एक सी-17 ग्लोबमास्टर में हर प्रकार की दवाएं, राहत सामग्री, भोजन सामग्री; यहां तक की जेसीबी, चिकित्सा वाहन तथा सेना और एनडीआरएफ का 90 विशेषज्ञों का दल गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस से "आपरेशन दोस्त" के लिए रवाना हुआ । सबसे दुर्भाग्य का विषय यह था कि इस दुख की घड़ी में तुर्की का सबसे अच्छा "दोस्त" समझे जाने वाले पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के इस जहाज को, जो कि राहत और बचाव सामग्री लेकर जा रहा था, अपने वायु मार्ग से जाने की अनुमति नहीं दी। इससे राहत सामग्री और बचाव दल के पहुंचने में थोड़ा विलंब हुआ लेकिन ईरान के रास्ते होते हुए इस विमान को तुर्की पहुंचाया गया।
भारत की त्वरित प्रतिक्रिया ने कुछ असंतुष्ट स्वरों को जन्म दिया है। एक राय यह है कि भारत के प्रति तुर्की के "कोल्ड" (ठंडे) दृष्टिकोण के कारण तुर्की इस तरह की उदारता और सदाशयता का पात्र नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे पाकिस्तान किसी भी परिस्थिति में भारत के परोपकार के योग्य नहीं है। एक ही सांस में तुर्की और पाकिस्तान का उल्लेख करना, भारत के प्रति एक कूटनीतिक भ्रम होगा। भू-राजनीति में, देशों को एक स्पेक्ट्रम पर व्यवस्थित किया जाता है और मित्रता और निकटता की डिग्री को वर्गीकृत किया जाता है।
पाकिस्तान और तुर्की बिल्कुल अलग हैं और इन देशों में मानवीय संकट के प्रति भारत की प्रतिक्रिया के मानदंड अलग होने चाहिए। वैसे भी संपूर्ण विश्व को एक ही परमपिता की संतान मानने वाले भारत ने कभी धर्म, भाषा, रंग या विचारधारा के कारण भेदभाव नहीं किया। हांलांकि तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयब एर्दोगान की छवि एक कट्टरपंथी "इस्लामिस्ट" की है। उन्होंने भारत का कश्मीर ही नहीं सीएए के मामले में भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर विरोध किया। किन्तु भारत ने सदाशयता का परिचय देते हुए राजनीति पर कूटनीति और धर्म पर मानवता को वरीयता दी। यही हमारे देश और संस्कृति का बड़प्पन है।
भारत ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की अध्यक्षता और अत्यधिक प्रभावशाली जी-20 की अध्यक्षता ग्रहण की है। तुर्की को भारत की अंतरराष्ट्रीय हैसियत का अनुमान है। आर्थिक पक्ष देखें तो भी बैलेंस आफ पेमेंट भारत के पक्ष में है। भारत और तुर्की के मध्य लगभग 7.975 बिलियन डॉलर का व्यापार है। इसमें से लगभग 30% आयात और 70% निर्यात है। तुर्की की मुद्रास्फीति उच्च स्तर पर पहुंच गई है और तुर्की भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है। भारत विरोध इन परिस्थितियों में अंकारा की मदद नहीं करेगा, एर्दोगन यह जानते हैं। कूटनीतिक पैंतरेबाज़ी के बावजूद, दुनिया के किसी भी हिस्से में मानवीय संकट के प्रति भारत की प्रतिक्रिया एक ठोस नैतिक संहिता द्वारा निर्देशित रही है। संकट के समय मानवीय सहायता प्रदान करना और सताए गए लोगों को शरण देना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो हमारे सहिष्णुता और उदारता के इतिहास के अनुकूल है।
दुनिया के मात्र दो देश हैं जिन्होंने खुलकर पाकिस्तान का कश्मीर मुद्दे पर समर्थन किया; वे हैं तुर्की और मलेशिया। जब से रिसेप तैयब एर्दोगान तुर्की के राष्ट्रपति बने हैं उन्होंने खुलेआम प्रो-पाकिस्तान और एंटी-इंडिया पॉलिसी लागू की है। वस्तुतः उनके नेतृत्व में तुर्की एक कट्टरपंथी देश बनता जा रहा है। पुष्ट समाचार यह भी है कि तुर्की आतंकवादी गतिविधियों में सम्मिलित संगठनों को आर्थिक सहायता भी प्रदान कर रहा है। तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की कठोर भर्त्सना भी की है और यह आरोप भी लगाया कि भारत में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है।
किंतु भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की प्राचीनतम परंपरा "वसुधैव कुटुंबकम" के मंत्र का अनुगमन करते हुए शत्रु और मित्र देश का भाव मिटाकर मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए तुर्की को तत्काल राहत और बचाव कार्य के लिए प्रस्ताव किया। भारत की बचाव राहत टीम, जिसमें भारतीय सेना और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) सम्मिलित है, ने जो कार्य तुर्की में किया उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा पूरी दुनिया के अनेक देशों ने ही नहीं बल्कि तुर्की के नागरिकों ने भी की। तुर्की जैसे देश को संकट की घड़ी में सहायता देकर प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ एक कूटनीतिक विजय पाई है वरन भारतीय मानव मूल्यों को पुनर्स्थापित करते हुए संसार को यह बताया है कि हमारी संस्कृति देश, रंग, भौगोलिक भेदभाव को नहीं मानती और मानवीय मूल्यों में विश्वास करती है।
भारत के कार्यों ने तुर्की की सरकार और वहां के नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भारत के विषय में वह अपना दृष्टिकोण बदले। जिन्हें वे अपना मित्र देश समझते थे उसने तुर्की की कठिनाइयों में फंसी जनता के लिए राहत सामग्री भी अपने वायु मार्ग से जाने की अनुमति नहीं दी। स्वयं पाकिस्तान कोई भी सहायता करने की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तान की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वहां एक लीटर पेट्रोल ₹300 में बिक रहा है। लोगों के पास खाने के लिए चावल और आटा नहीं है।
सबसे अधिक अपमानजनक बात यह है कि पाकिस्तान ने जो थोड़ी बहुत राहत सामग्री तुर्की को भेजी थी वह वही राहत सामग्री थी जो तुर्की ने पाकिस्तान को उसके यहां सिंध में आई बाढ़ के समय भेजी थी। तुर्की की सरकार ने इसे स्वयं मीडिया के समक्ष प्रस्तुत किया। पाकिस्तान में भी इसकी बहुत अधिक चर्चा है और जो लोग स्वतंत्र विचारक हैं उन्होंने पाकिस्तान के ऐसे कुकृत्य की बहुत आलोचना की है।
एक तरफ भारत की सदाशयता और दूसरी तरफ पाकिस्तान का यह धोखा तुर्की के लोगों और तुर्की की सरकार में अवश्य विचार पैदा करेगा कि असल में मित्र और शत्रु कौन है। कहा जाता है कि कठिन वक्त में जो आपके साथ खड़ा हो आपका वही असली मित्र होता है। इस परिभाषा पर भारत बिल्कुल खरा उतरा है।
दूसरी तरफ भारत ने नाटो देशों से भी अधिक जल्दी और अधिक सहायता प्रदान करके यह प्रमाणित कर दिया है कि वह आवश्यकता पड़ने पर कितनी तेजी से काम कर सकता है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण इस विपत्ति के समय तुर्की की आर्थिक सहायता करके अपनी आर्थिक शक्ति का भी परिचय दे रहा है।
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कुल मिलाकर मोदी सरकार ने तुर्की की सहायता करके एक कूटनीतिक विजय, राजनैतिक दूरदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की शक्ति को मानवता के मापदण्डों के साथ स्थापित कर दिया है। इससे भारत और तुर्की के संबंधों में सकारात्मक बदलाव होना सुनिश्चित है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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