India China Border: सीमा पर चीन का इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण चिंताजनक
भारत चीन सीमा पर चीन की ओर से इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण लगातार जारी है जो दोनों देशों के संबंधों को देखते हुए चिंताजनक है। इससे न सिर्फ दोनों देशों में सैन्य तनाव बढ़ेगा बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी असर होगा।

India China Border: चीन का भारतीय सीमा के निकट ढांचागत विकास बहुत तेजी से हो रहा है। वैसे तो चीन भारत की सीमा पर 50 के दशक से ही ढांचागत निर्माण कर रहा है, परन्तु इस बीच इस कार्य में अभूतपूर्व तेजी आयी है। अरूणाचल से लेकर पश्चिम लद्दाख तक जो ढांचागत विकास चीन कर रहा है वह चिंताजनक है। कुछ ढांचागत निर्माण जो विवादास्पद हैं वे हैं - लद्दाख में पैंगाग त्सो झील पर एक नये पुल का निर्माण, तिब्बत में नई हवाई पट्टियों का निर्माण, अरूणाचल में "सील्ड" सड़कों का निर्माण, वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट नये गांवों का बसाया जाना, नियंत्रण रेखा के समानांतर सड़कों का निर्माण इत्यादि।
पैंगाग झील पर पुल चीन की सीमा से भारत में प्रवेश को अत्यंत सुगम बना देगा, और यही भारत की चिंता है। इस पुल के निर्माण का भारत ने कठोर विरोध किया है। किन्तु, जैसा कि चीन की आदत है, चीन इन सबसे प्रभावित नहीं हुआ है और निर्माण कार्य बहुत तेजी से कर रहा है।
भारत-चीन के मध्य संसार की सबसे लम्बी "विवादित" सीमा का प्रबंधन भारत और चीन दोनों के लिए अस्मिता के प्रश्न से जुड़ा है। भारत चीन (तिब्बत) के साथ 3,488 किलोमीटर की सीमा साझा करता है, जो जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों के साथ चलती है। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भारत सैद्धांतिक रूप से मानता है कि यह सीमा तिब्बत के साथ है जिस पर चीन ने अतिक्रमण कर रखा है। भारत इस क्षेत्र को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR or Tibet Autonomous Region) से अधिक कुछ नहीं मानता।
भारत और चीन के बीच 3,488 किमी सीमा की राज्य-वार लंबाई निम्नानुसार है: जम्मू और कश्मीर 1597 किमी, हिमाचल प्रदेश 200 किमी, उत्तराखंड 345, सिक्किम 220 और अरुणाचल प्रदेश 1126 किमी। सीमा पूरी तरह से सीमांकित नहीं है और वास्तविक नियंत्रण रेखा को स्पष्ट करने और पुष्टि करने की प्रक्रिया अभी भी चल रही है। इस क्षेत्र में बहुत ऊंचाई वाले दुरूह पहाड़ हैं और जनसंख्या कम है, जिसके परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास कठिन काम है। भारत की पूर्ववर्ती सरकारों ने जानबूझकर भारतीय क्षेत्र में ढांचागत विकास नहीं किया। वो चीन से इस तरह खौफ खाते थे कि उन्हें लगता था कि अगर सीमा पर सड़कें, पुल और टनल बन गयी तो चीन हमारे भीतर तक घुस आयेगा। इस फोबिया की भरपाई वर्तमान सरकार कर रही है।
मोदी सरकार के नेतृत्व में भारत ने भारत-चीन सीमा पर रणनीतिक महत्व की 73 सड़कों के निर्माण का निर्णय लेकर किया है। इन 73 सड़कों में से, 804.93 किमी लंबाई वाली 27 सड़कों का निर्माण गृह मंत्रालय (सीमा प्रबंधन विभाग) द्वारा जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों में 1937 करोड़ रुपये की लागत से किया जायेगा। इन 27 सड़कों के निर्माण का कार्य बीआरओ (15 सड़कें), सीपीडब्ल्यूडी (8 सड़कें), एनपीसीसी (2 सड़कें) और हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग (2 सड़कें) को सौंपा गया है। 27 सड़कों में से 08 सड़कों का काम पूरा हो चुका है। 02 सड़क को रक्षा मंत्रालय द्वारा जीएस रोड में परिवर्तित किया गया। अन्य सड़कों का निर्माण कार्य प्रगति पर है।
इस क्षेत्र की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (ITBP) की है। आईटीबीपी ने इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अग्रिम सीमा चौकियों (बीओपी) की स्थापना की है। इस सीमा पर आईटीबीपी द्वारा कुल 173 बीओपी स्थापित किए गए हैं, जिसमें पश्चिमी क्षेत्र (जम्मू और कश्मीर) में 35, मध्य क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) में 71, पूर्वी क्षेत्र (सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश) में 67 हैं।
पैंगोंग झील लगभग 135 किमी लम्बी है। इसका दो तिहाई हिस्सा चीन और लगभग एक तिहाई भारत के पास है। परन्तु चीन द्वारा अपने तरफ पूर्व निर्मित पुल के साथ एक और पुल के निर्माण की रिपोर्ट आ रही है। पुराना पुल 1960 के दशक से चीन के अवैध कब्जे वाले क्षेत्रों में हैं।
यहां यह बात स्मरणीय है कि चीन ने भारत का लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र, जिसे "अक्साई चिन" कहते हैं, पहले ही अवैध रूप से कब्जा कर रखा है। इसके अतिरिक्त लगभग 5300 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र, जिसे "ट्रांस कराकोरम ट्रैक्ट" कहते हैं और जो पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर का हिस्सा है, पाकिस्तान ने चीन को एक समझौते के तहत हस्तांतरित कर दिया है। यह असल में भारत का वैधानिक क्षेत्र है। चीन ने इस हिस्से को अपने खोतन राज्य में सम्मिलित कर दिया है। इसी क्षेत्र से होकर काशगर के लिए तिब्बत और खोतन को जोड़ने वाला राजमार्ग जाता है।
चीन द्वारा अनियंत्रित इंफ्रा निर्माण पर हालांकि भारत कह रहा है कि "हमने अपने क्षेत्र पर इस तरह के अवैध कब्जे को कभी स्वीकार नहीं किया है और न ही हमने अनुचित चीनी दावे या ऐसी निर्माण गतिविधियों को स्वीकार किया है।" लेकिन भारत की ओर से किये जाने वाले ऐसे विरोध प्रतीकात्मक ही होते हैं जिसका चीन की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।
पैगोंग लेक पर नया पुल (जो झील के दक्षिणी और उत्तरी किनारों के बीच 130 किलोमीटर की दूरी को कम करता है) क्षेत्र में भारत के सामरिक लाभ को नकारने के प्रयास का हिस्सा है। हालांकि भारत ने, खासतौर पर मोदी सरकार के आने के बाद, बेहतर सामरिक, संचालनात्मक तैनाती में सहायता के लिए बहुत सारे बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है।
अभी कुछ दिन पूर्व ही संपन्न क्वाड बैठक में समग्र सुरक्षा चर्चा के हिस्से के रूप में पैगोंग लेक पर पुल के विवाद पर चर्चा की गई थी। ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका से बने चार देशों के क्वाड के नेताओं की बैठक मंगलवार को टोक्यो में हुई थी। समूह का लक्ष्य क्षेत्र में चीन की बढ़ती मुखरता का मुकाबला करना है। लेकिन क्वाड के मंच से इस पर कोई तत्काल प्रतिक्रिया नहीं की गई। क्वाड में शामिल चार देशों में से भारत एकमात्र ऐसा देश है जो चीन के साथ सीमा साझा करता है।
भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी अचिह्नित सीमा दुनिया की सबसे लंबी सीमा है जिसे चीन निरंतर सीमा विवाद में परिवर्तित करता जा रहा है। 2020 में हिंसक टकराव में दोनों ओर के सैनिक मारे गये थे। उसके बाद सैन्य तनाव को कम करने के लिए दोनों देशों के बीच 15 दौर की बातचीत के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष नहीं निकला है। अभी भी सीमा पर हजारों सैनिक तैनात हैं। दुनिया के दो बड़े परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के बीच यह तनाव गंभीर चिंता का विषय है।
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चूंकि चीन अपने किसी भी दावे से पीछे हटने को तैयार नहीं है, ऐसे में भारत के पास विकल्प बहुत सीमित है। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि भारत इस क्षेत्र को एक रणनीति के तहत विकसित नहीं कर रहा है ताकि युद्ध की स्थिति में चीन का एडवांस आसान न हो। यानी मोदी के पहले की रणनीति न सिर्फ रक्षात्मक थी बल्कि चीन से भय भी था। जबकि मोदी सरकार के आने के बाद स्थिति बदल गई है। मोदी सरकार इस क्षेत्र में इतनी तेजी से ढांचागत निर्माण कर रही है जो अकल्पनीय है। 27 नयी सड़कों का निर्माण, अरुणाचल से लदाख तक अनेक रणनीतिक पुलों का निर्माण, ज़ोजिला दर्रे की सिर्फ 5-6 महीने की मोटरेबिलिटी पर विजय पाने के लिए ज़ोजिला टनल का निर्माण इत्यादि भारत की सुरक्षा पंक्ति को शक्तिशाली करने के अनेक स्तर है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है लेह में सेना की एक डिविजन (Army Division) के बजाय एक नई कोर (corps) की स्थापना। इससे चीन सीमा पर सेना की उपस्थिति लगभग तीन गुना बढ़ा दी गई है। इस प्रकार सीमा पर न सिर्फ ढांचागत बराबरी वरन सैन्य शक्ति भी लगभग चीन के बराबर मैच कर दी गई है। चूंकि भौगोलिक स्थितियां जहां चीन के खिलाफ हैं वहीं भारत के अधिक अनुकूल है, ऐसे में कोई भी एडवेन्चर करने से पहले चीन चालीस बार सोचेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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