INDI Alliance: राहुल गांधी की पीएम बनने की लालसा के कारण बिखरा इंडी एलायंस
INDI Alliance: जून 2023 में जब इंडी एलायंस बना था, तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता था कि लोकसभा चुनावों से पहले ही बिखर जाएगा|
एलायंस पूर्ववर्ती यूपीए से बेहतर था, क्योंकि उसमें छह नए दल जेडीयू, समाजवादी पार्टी, आरएलडी, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और पीडीपी जुड़े थे|

इनमें से पहली तीन पार्टियां 1977 में बनी जनता पार्टी का हिस्सा थीं| इंडी एलायंस की अहमियत इसलिए थी, क्योंकि आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी को छोड़ कर बाकी सभी चार पार्टियां कभी न कभी भारतीय जनता पार्टी की रहनुमाई वाले एनडीए का हिस्सा रही थीं| इन सभी छह पार्टियों का अपने अपने क्षेत्र में ठीक ठाक वोट बैंक है|
2004 में एनडीए की हार का एक बड़ा कारण चुनाव से पहले कुछ दलों का गठबंधन छोड़कर बाहर निकल जाना भी माना गया था| ठीक उसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले नया विपक्षी गठबंधन काफी मजबूत लग रहा था| कई चुनावी पंडितों ने तो एनडीए के चुनाव हारने की भविष्यवाणियां करना भी शुरू कर दी थीं|

गठबंधन की मजबूती इसलिए भी दिख रही थी कि ये सभी पार्टियां तीसरे मोर्चे की मानसिकता वाली पार्टियां है, जिन्होंने वामपंथियों के साथ मिलकर 1996 में सरकार बनाई थी| इनके फिर से तीसरा मोर्चा बनाने की सुगबुगाहट के बीच इंडी एलायंस बना था| तीसरे मोर्चे की मानसिकता वाली पार्टियों के अलावा यूपीए में शामिल न होकर भी कांग्रेस का साथ देने वाले छह वामपंथी दलों का मोर्चा भी इंडी एलायंस में शामिल हुआ था|
इससे पहले यूपीए में 20 दल थे, लेकिन दस दलों का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं था| इंडी एलायंस की नई सूची में उनमें से कईयों के नाम नदारद थे, क्योंकि वे नाम मात्र की पार्टियां थीं| लेकिन कुल मिलाकर एनडीए को चुनौती वाली स्थिति बन गई थी| लेकिन छह महीनों के भीतर ही तृणमूल कांग्रेस, जेडीयू, आरएलडी और आम आदमी पार्टी इंडी एलायंस से बाहर हो गई हैं|
नीतीश कुमार की जेडीयू और जयंत चौधरी की आरएलडी तो एनडीए में शामिल हो गई हैं, ये दोनों दल पहले भी एनडीए का हिस्सा रहे थे| एनडीए का हिस्सा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी रही थीं, लेकिन इंडी एलायंस से सीट शेयरिंग से इनकार करने वाली ममता बनर्जी के एनडीए में जाने की कोई संभावना ही नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी अब उसकी मुख्य प्रतिद्वन्द्वी पार्टी है|
ममता बनर्जी ने बंगाल में और केजरीवाल ने पंजाब और दिल्ली में कांग्रेस से सीट शेयरिंग से इनकार कर दिया है| हालांकि इन दोनों की स्थिति साफ़ नहीं है कि वे इंडी एलायंस में हैं या नहीं, लेकिन भाजपा और उसके घटक दलों के उम्मीदवारों के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने का सपना लगभग टूट गया है| भविष्य के लिए अपने रास्ते खुले छोड़ने की गरज से इन दोनों दलों ने खुद के इंडी एलायंस से अलग होने का एलान नहीं किया है, लेकिन यह सच है कि इन दोनों के एनडीए में शामिल होने की कोई संभावना नहीं|
केजरीवाल ने शनिवार को पंजाब में जाकर एलान किया कि आम आदमी पार्टी पंजाब की सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, वह कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग नहीं करेगी| इसके साथ ही केजरीवाल ने यह भी एलान किया कि आम आदमी पार्टी चंडीगढ़ की सीट पर भी चुनाव लड़ेगी| कुछ दिन पहले खुद अरविन्द केजरीवाल चंडीगढ़ के मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव में गठबंधन करने के लिए राहुल गांधी से मिले थे| गठबंधन हो भी गया था, लेकिन अब केजरीवाल ने चंडीगढ़ के लिए एकतरफा एलान कर दिया है|
केजरीवाल ने अगले दिन इतवार को पंजाब के तरनतारन में ही यह एलान भी कर दिया कि आम आदमी पार्टी दिल्ली की भी सातों सीटें चुनाव लड़ेगी, इसका मतलब है कि वह दिल्ली में भी कांग्रेस से कोई गठबंधन नहीं करेगी| वैसे यह उनकी दबाव की रणनीति भी हो सकती है, क्योंकि उन्होंने पंजाब और दिल्ली में गठबंधन के बदले हरियाणा, गुजरात और गोवा में सीटें मांग ली थी, जिसे देने से कांग्रेस ने इनकार कर दिया था|
राहुल गांधी ने जब भारत जोड़ो यात्रा शुरू की थी, तो इंडी एलायंस में 29 पार्टियां थी, कुछ ही दिनों में 29 से घटकर अब 24 रह गई हैं| इनमें से छह पार्टियां तो लेफ्ट विंग की हैं, जिनका प्रभाव सिर्फ केरल में बचा है| इन लेफ्ट पार्टियों ने पहले ही क्लीयर कर दिया है कि वह केरल में कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग नहीं करेगी| तो इन छह को भी निकाल दीजिए| बाकी बची 18 पार्टियां, इनमें से 8 पार्टियों की लोकसभा में एक सीट भी नहीं है, और एक सीट जीतने की हैसियत भी नहीं है|
अब वे दस पार्टियां भी सुन लीजिए, कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी| लोकसभा में शून्य सीट वाली पार्टियों में बिहार की बड़ी पार्टी आरजेडी भी है, क्योंकि पिछली बार वह एक भी सीट नहीं जीती थी| पिछली बार भी बिहार में कांग्रेस, वामपंथियों और कांग्रेस का चुनावी गठबंधन था, इनमें से सिर्फ कांग्रेस एक सीट जीती थी, बाकी 39 सीटें एनडीए जीता था|
अब आप इसी से अंदाज लगा लीजिए कि इंडी एलायंस के पल्ले क्या बचा है| जो यूपीए पहले था, वही बचा है, उसमें सिर्फ अखिलेश यादव नए जुड़े हैं, जिनकी समाजवादी पार्टी पिछली बार मायावती से गठबंधन के कारण पांच सीटें जीती थी| खुद अखिलेश यादव और आजम खान जब विधायक चुने गए, तो उनकी सीटों पर हुए लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ये दो सीटें भी हार गई थीं| उप चुनाव में समाजवादी पार्टी सिर्फ मुलायम सिंह के देहांत से खाली हुई सीट ही बचा पाई|
एलायंस करीब करीब धराशाही है, क्योंकि एलायंस की नींव ही गलत मुद्दे पर पड़ी थी| नींव यह थी कि मोदी अपने विरोधियों के खिलाफ ईडी, सीबीआई का इस्तेमाल करके सब को बेनकाब कर रहे हैं| सबके भ्रष्टाचार को उजागर करके सबको जेल में डालने की साजिश रच रहे हैं| इसलिए सबको एकजुट हो कर मोदी को हटाना चाहिए| तो उद्देश्य क्या था, उद्देश्य यह था कि मोदी रहे तो उनकी लूट खसोट हमेशा के लिए बंद हो जाएगी|
दूसरे शब्दों में कहें, तो इंडी एलायंस भ्रष्टाचार के ठोस आधार पर खड़ा था| सब को लगता था कि मोदी विरोधी वोटों का विभाजन रोक कर वे मोदी को हरा सकते हैं| एलायंस बनने का दूसरा ठोस आधार यह था कि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद का दावा छोड़ दिया था| लेकिन जैसे ही एलायंस बना राहुल गांधी फिर से यात्रा पर निकल पड़े|
संकेत साफ़ था कि कांग्रेस बाकी दलों का इस्तेमाल करके सत्ता हासिल करना चाहती है| इनमें से ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का वोट कांग्रेस विरोधी वोट है| जैसे नीतीश कुमार और जयंत चौधरी, या फिर ममता बनर्जी और केजरीवाल| तो ये सभी नेता अपने वोट से कांग्रेस को क्यों मजबूत होने दें|
सिर्फ मोदी विरोधी वोटों का विभाजन रोकना भी उद्देश्य होता, तो बुरी बात नहीं थी| देश में ऐसा पहले भी हो चुका है, जब कांग्रेस विरोध के नाम पर परस्पर विरोधी विचारधारा वाले नेता एकत्र हुए थे| 1967 से लेकर 1977 तक ऐसे कई प्रयोग हुए| फिर 1996 से लेकर 2014 तक कई प्रयोग हुए| लेकिन वे सभी प्रयोग किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं थे|
पहली बार यह गठबंधन किसी व्यक्ति से नफरत पर आधारित था| इसलिए वैसे नतीजे भी नहीं दिखाई दे रहे थे, जैसे 1977 या 1996 और 1998 में बने कांग्रेस विरोधी गठबन्धनों से निकल कर आए थे| इसलिए सब को लगा कि कांग्रेस ने उनका इस्तेमाल करके राहुल गांधी को रीलांच कर दिया है| जबकि नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल खुद विपक्ष का प्रधानमंत्री बनने के सपने ले रहे थे|
नीतीश कुमार के बारे में तो साफ़ ही था कि कि वह प्रधानमंत्री का सपना लेकर ही 2022 में एनडीए छोड़ गए थे| यह भी किसी से छिपा नहीं कि ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल ने मिल कर नीतीश कुमार और राहुल गांधी का रास्ता रोकने के लिए ही मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए प्रस्तावित कर दिया था| तो कुल मिलाकर हुआ यह कि राहुल गांधी के रीलांच ने इंडी एलायंस के चीथड़े चीथड़े उड़ा दिए|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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