दलों के दल बल के सामने गायब होते निर्दलीय सांसद
Independent Candidate: हमारे लोकतंत्र का संविधान सबको समान अवसर देने का भरोसा देता है। संसद में पहुंचने वाले निर्दलीय सांसद इस विचार को मजबूती प्रदान करते हैं। 1952 में निर्वाचित पहली लोकसभा से लेकर 2019 की सत्रहवीं लोकसभा तक एक भी लोकसभा ऐसी नहीं रही है, जिसमें निर्दलीय सांसदों की उपस्थिति न रही हो।
निर्दलीय सांसदों के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि ऐसे बहुत सारे देशों में जहां राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी मुकाबला मुख्यत: दो ही दलों के बीच होता है, वहॉं भी निर्दलीयों के लिए गुंजाइश बरकरार रखी गई है।

अगर हम सिर्फ बड़े लोकतांत्रिक देशों की ही बात करें तो बाकी देशों के मौजूदा हाल भी कुछ अच्छे नहीं हैं। कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स में पांच और आस्ट्रेलिया के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में छह निर्दलीय हैं तो अमेरिकी सीनेट में सिर्फ दो ही निर्दलीय हैं और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में एक भी नहीं।
न्यूजीलैंड के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में एक ही सीट निर्दलीय के पास है। वहीं जर्मनी की बुंडेस्टैग, स्वीडन की रिक्सडैग और ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में एक भी निर्दलीय जनप्रतिनिधि नहीं है। इस मामले में फ्रांस की नेशनल एसेंबली और जापान के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का स्कोर थोड़ा बेहतर है, जहां क्रमश: सत्रह और दस सीटें निर्दलीयों के पास हैं।
निर्दलीय उम्मीदवारों में मतदाताओं की इस घटती रुचि से भारत भी अछूता नहीं है। अगर, हम पहली से सत्रहवीं लोकसभा में जीतकर पहुंचे निर्दलीयों को देखें तो यह संख्या करीब दस फीसदी रह गई है। पहली चार लोकसभाओं के बाद से लगभग हर बार यह संख्या पहले से कम ही होती गई है। पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी लोकसभा में क्रमश: 37, 42, 20 और 35 निर्दलीय सांसद थे, लेकिन इसके बाद वे कभी पंद्रह का आंकड़ा नहीं छू पाए।
दिलचस्प बात यह है कि विजेताओं की संख्या में गिरावट जरूर आई, लेकिन चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या लगातार बढ़ती गई है। 1952 में 533 निर्दलीय उम्मीदवार लोकसभा चुनावों में उतरे थे और 2019 में 3,461 उम्मीदवार। चुनाव लड़ने वाले और जीतने वाले उम्मीदवारों के प्रतिशत में गिरावट को इस बात से समझा जा सकता है कि पहले लोकसभा चुनावों में अगर करीब सात फीसदी निर्दलीय विजयी रहे तो पिछली लोकसभा में यह 0.1% से थोड़ा ही अधिक है।
इनमें भी जमानत जब्त कराने वाले उम्मीदवारों की संख्या बहुत बड़ी है। 1996 में, सबसे ज्यादा, 10,635 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे थे, इनमें 10,604 की जमानत जब्त हुई। आंकड़े बताते हैं कि पिछली आठ लोकसभाओं के लिए हुए चुनावों में कुल 48,103 निर्दलीय उम्मीदवारों ने भाग्य आजमाया, लेकिन जीत मिली सिर्फ 234 को। यानी लगभग 99.5% ने अपनी जमानत गंवाई।
लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि उनकी ताकत और अहमियत को सिरे से ही खारिज कर दिया जाए। याद कीजिए, 1984 के लोकसभा चुनावों को। इनमें संसद में पहुँचे निर्दलीय निर्वाचितों की संख्या 13 थी। कॉन्ग्रेस, तेलुगु देशम, माकपा के बाद वे चौथे स्थान पर थे और भाजपा, भाकपा, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, जनता पार्टी और लोकदल जैसे बड़े दलों से आगे। लेकिन, इसके बाद से इनकी संख्या लगातार कम होती गई। इसकी सबसे बड़ी वजह है, मतदाताओं द्वारा निर्दलीयों को गंभीरता से न लिया जाना। अधिकतर मतदाता, निर्दलीय उम्मीदवारों को बहुत ज्यादा सम्मान की नजर से नहीं देखते।
समाज का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि निर्दलीयों को चुनाव लड़ने से रोका जाए, क्योंकि इससे चुनाव प्रक्रिया में शिथिलता आती है। विधि आयोग भी सिफारिश कर चुका है कि उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति न दी जाए, सिर्फ चुनाव आयोग में पंजीकृत दलों को ही लोकसभा या विधानसभा चुनाव लड़ने की अनुमति हो। ऐसी मॉंगों या सिफारिशों के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि चुनावों में खड़ा होने या खड़ा किए जाने के पीछे जो निहित उद्देश्य होते हैं, उनके साथ निर्दलीय उम्मीदवार लोकतंत्र को मबबूती देने का नहीं, बल्कि उसे कमजोर बनाने का काम करते हैं।
निर्दलीय उम्मीदवारों को लेकर कुछ स्थापित मान्यताएं हैं, जो अमूमन उनकी सफलता और विश्वसनीयता के रास्ते में बाधा साबित होती हैं। जैसे पहली तो यही है कि अधिकतर निर्दलीय ऐसे रुष्ट नेता होते हैं, जिन्हें उनके दल ने टिकट नहीं दिया होता। निर्दलीय चुनाव लड़कर वे वोटकटवा बनकर अपनी ही पार्टी का समीकरण बिगाड़ना चाहते हैं।
दूसरी मान्यता यह है कि कई लोग इसलिए भी निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं कि उन्हें चुनावों में शांत बैठने के लिए बड़ी पार्टियॉं कुछ रकम या कोई पद उपहार में दे देती हैं। तीसरी यह कि अगर कोई निर्दलीय चुनाव जीत जाए तो लोकसभा में मतदान के दौरान उसकी पूछ बहुत बढ़ जाती है। चौथी है कि कई जगह पार्टियां खुद डमी कैंडिडेट के रूप में उन्हें खड़ा करती हैं, ताकि वे उनके मजबूत प्रतिद्वंद्वी के वोट बॉंट सकें या उनके जरिए मतदाताओं को भ्रमित किया जा सके।
एक और मान्यता यह भी है कि कुछ लोग सिर्फ रिकॉर्ड बनाने या प्रसिद्धि पाने के लिए चुनाव लड़ते हैं। लोकतंत्र और लोगों की भलाई से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। जैसे कि बरेली के काका जोगिंदर सिंह धरतीपकड़, जिन्होंने तीन सौ से ज्यादा चुनाव लड़े और सभी हारे, या ग्वालियर के धरतीपकड़ मदनलाल या कानपुर के भगवती प्रसाद दीक्षित घोड़े वाला तो मीडिया और जनता में किसी सेलिब्रिटी का दर्जा रखते थे।
1996 से पहले कोई भी उम्मीदवार एक साथ कितनी भी सीटों से चुनाव लड़ सकता था। लेकिन, फिर तत्कालीन सरकार की सिफारिश पर चुनाव आयोग ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 की धारा 33 में संशोधन किया। इसके बाद किसी भी उम्मीदवार के एक बार में दो से अधिक चुनाव क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई। इसका असर भी देखने को मिला। 1996 के लोकसभा चुनावों में जहॉं 10,635 निर्दलीयों ने चुनाव लड़ा था, इसके बाद 1998 में हुए आम चुनावों में सिर्फ 1,915 निर्दलीय ही मैदान में उतरे। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि चुनावों के मौजूदा फॉर्मेट में जीतने के लिए जितने संसाधनों की जरूरत पड़ती है, वह एक निर्दलीय उम्मीदवार के लिए जुटा पाना आसान नहीं होता। इसलिए उनका संसद में दखल कम होता जा रहा है।
भारतीय लोकतंत्र की बड़ी विशेषता इसकी विशालता तो है ही साथ ही इसकी विविधता भी है। लेकिन, जैसे-जैसे इसमें धन-बल का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि आने वाले दशकों में निर्दलियों की ही नहीं, बल्कि छोटी पार्टियों का नजर आना भी दुर्लभ होगा। निर्दलीय उस उम्मीद को जिंदा रखे हुए हैं, जो समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति की लोकतंत्र में भागीदारी सुनिश्चित करती है। साथ ही वे उन मतदाताओं को भी एक विकल्प मुहैया कराते हैं, जिनका मुख्यधारा के दलों से मोहभंग हो चुका है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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