Partition of India: भारत विभाजन की हड़बड़ी बन गयी एक विभीषिका
Partition of India: भारत की स्वतंत्रता भारत के विभाजन के रूप में आयी थी जिसकी योजना 3 जून 1947 को सार्वजनिक हुई। वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) पर इसकी घोषणा की और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने बीबीसी लंदन पर। जवाहरलाल नेहरू, अकाली नेता बलदेव सिंह और जिन्ना के बयान भी आकाशवाणी पर प्रसारित किए गए। विभाजन योजना को स्वीकृति देने के लिए कांग्रेस ने 14 जून को एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। उसमें गांधीजी की लाचारी, नेहरू-पटेल का स्पष्टीकरण, पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे नेताओं के विरोध के सुरों के अलावा किसी ने सबसे ज्यादा लोगों को अपने सम्बोधन से झकझोर कर रख दिया था तो वह थे तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जेपी कृपलानी।
आचार्य कृपलानी ने 9 घंटे की मीटिंग के बाद सबसे आखिर में अपनी बात रखी थी। वह पंजाब के दंगा प्रभावित क्षेत्रों से लौटकर आए थे। उनका सम्बोधन वाकई में भयानक था। उन्होंने कहा, "एक गांव में उन्होंने एक ऐसा कुआं देखा था, जिसमें 107 स्त्रियों ने अपनी इज्जत बचाने के लिए अपने बच्चों सहित छलांग लगा दी थी। 50 स्त्रियों को उनके पतियों ने इज्जत बचाने के लिए स्वंय मार डाला था। एक जगह 307 व्यक्तियों की अस्थियों का ढेर देखा, उन्हें एक घर में बंद करके जिंदा जला दिया गया था"।

हालांकि उससे पहले ही महात्मा गांधी विभाजन योजना को स्वीकृत कर चुके थे। अपनी लाश पर विभाजन की बात करने वाले गांधीजी ने इस मीटिंग में कहा था, "कई बार हमें कुछ ऐसे निर्णय भी लेने पड़ते हैं, चाहे वे कितने ही अरुचिकर क्यों न हों?" परन्तु जब गांधीजी ने लोगों से इसे स्वीकार करने को कहा तो लोगों ने उनका वो कथन याद दिलाया। गांधीजी का जवाब था, "जब मैंने वो बात कही थी तो मैं जनमत को मुखर कर रहा था किंतु जनमत मेरे विरुद्ध है तो क्या मैं उसे दबा दूं?" उन्होंने ये भी कहा कि, "आज मुझमें वैसी शक्ति नहीं रही है, अन्यथा तो मैं अकेला ही विद्रोह की घोषणा कर देता"। बावजूद इसके कांग्रेस की बैठक से कई नेता नदारद रहे और कई नेताओं ने प्रस्ताव के विरोध में मत दिया था।
जनगणना के आंकड़े कांग्रेस की वजह से भ्रामक
कांग्रेस ने 1931 में जनगणना के बहिष्कार का आव्हान किया था, क्योंकि उसके अनुसार साम्प्रदायिक आधार पर गणना की सम्भावना थी। कांग्रेस के आव्हान के चलते बहुत से हिंदुओं ने जनगणना में हिस्सा ही नहीं लिया, जबकि मुस्लिम लीग ने एक एक मुसलमान को घर घर जाकर जनगणना में हिस्सा लेने को कहा। यही कहानी 1941 में दोहराई गई। लेकिन जब बंगाल और पंजाब का विभाजन पाकिस्तान के लिए हुआ तो 1941 की जनगणना के आंकड़ों को ही प्रयोग में लाया गया। ऐसे में मुस्लिमों की जनसंख्या को कई जिलों में ज्यादा दिखाया गया, जो भ्रामक आंकड़ा था। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार ने कई जिलों में जनगणना ही नहीं की थी।
रेडक्लिफ ने सीमा आयोग के सदस्यों को ही झूठ बोला
रेडक्लिफ के बारे में उस वक्त के नेताओं, अधिकारियों को ज्यादा पता नहीं था। सब उसके वायदों पर भरोसा आसानी से कर लेते थे जबकि उसने अपने साथ काम कर रहे आयोग के सदस्यों तक को झूठे आश्वासन दिए थे। पंजाब सीमा आयोग के सदस्य मेहर चंद महाजन को भी भरोसा दिया था कि लाहौर भारत में ही रहेगा। इसलिए घर बेचना तो दूर उन्होंने अपने घर के सदस्यों तक को वहां से नहीं हटाया। बाद में काफी परेशानी हुई थी। जबकि दूसरे सदस्य जस्टिस तेजा सिंह ने भी लाहौर से अपना पुस्तकालय इसी आश्वासन के चलते नहीं हटाया था। लाहौर में केवल 25 प्रतिशत मुसलमान थे। सभी को यही लगा कि ये तो भारत में ही रहेगा। कोई भी इस तथ्य से हैरान हो सकता है कि रेडक्लिफ ने पंजाब सीमा आयोग की दस बैठकों में से एक में भी भाग नहीं लिया था।
गलती या धोखाधड़ी?
पूर्वी पंजाब के हिस्से में 38 प्रतिशत क्षेत्रफल और 45 प्रतिशत जनसंख्या आई, जबकि पश्चिमी पंजाब के हिस्से में 62 प्रतिशत क्षेत्रफल और 55 प्रतिशत जनसंख्या आई। बंगाल में भी केवल 3 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या वाला क्षेत्र चटगांव पहाड़ी क्षेत्र पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) को दे दिया गया। भारत के हिस्से में पश्चिम बंगाल के रूप में केवल 36 प्रतिशत क्षेत्रफल और 35 प्रतिशत जनसंख्या मिली। हिंदू बाहुल्य खुलना जिला भी पाकिस्तान को सौंप दिया गया।
इसके साथ ही 'कलकत्ता' अखबार में आयोग द्वारा प्रयोग में लाए गए मानचित्रों पर भी तब सवाल उठाए गए थे। ये बड़ा खुलासा हुआ था कि आय़ोग के अलग अलग सदस्यों को सर्वेक्षण विभाग ने अलग अलग मानचित्र दिए और रेडक्लिफ को कोई अलग ही मानचित्र दिया गया था।
विभाजन की योजना में 'प्लान पाकिस्तान'
माउंटबेटन योजना में 'प्लान पाकिस्तान' को कुछ प्रमुख बिंदुओं से समझा जा सकता है। पहला, पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिंध और चीफ कमिश्नर का प्रांत बलूचिस्तान सम्मिलित होंगे। दूसरा उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत (अब खैबर पख्तूनवा) के भाग्य का निर्णय जनमत संग्रह से होगा। तीसरा, आसाम के सिलहट जिले का भी फैसला जनमत संग्रह से होगा। चौथा, पंजाब और बंगाल को विभाजित कर दो-दो प्रांत बनाएं जाएंगे। पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान के हिस्से में जाएगा और पश्चिम बंगाल व पूर्वी पंजाब भारत के हिस्से में जाएगा।
बंगाल और पंजाब का विभाजन
रिफॉर्म कमिश्नर वीपी मेनन (बाद में सरदार पटेल के सचिव) और उनके सहयोगी सर बीएन राव (बाद में संविधान समिति के सलाहकार) ने एक रिपोर्ट तैयार की, 'Demarcation of Pakistan Areas'. जिसमें उन्होंने दिल्ली और जालंधर, इन दो डिवीजन्स को भारत में रखा और तीन डिवीजन्स रावलपिंडी, लाहौर और मुल्तान को पाकिस्तान में रखा। हालांकि उन्होंने ये भी बताया कि इस विभाजन के चलते 22 लाख सिख पाकिस्तान में और 15 लाख भारत में होंगे। ये भी कहा कि अगर लाहौर डिवीजन से अमृतसर (46.5 प्रतिशत मुस्लिम) और गुरुदासपुर (51.1 प्रतिशत मुस्लिम) को भारत में लिया जाता है तो सिख भारत में ज्यादा हो जाएंगे। इन दोनों को भारत में लाने के बदले उन्होंने बंगाल के मुस्लिम बाहुल्य जिले दीनाजपुर को पाकिस्तान को देने का सुझाव भी दिया।
3 जून की योजना में पंजाब के 17 जिले पाकिस्तान को मिले थे और भारत को 12। गुरुदासपुर को लेकर विवाद था। वहां 51.1 प्रतिशत जनसंख्या मुस्लिम थी, लेकिन चूंकि उनका राजस्व में हिस्सा केवल 35 प्रतिशत ही था, ऐसे कई आधार बनाकर गुरुदासपुर भारत को दे दिया गया। भारत को अम्बाला और जालंधर डिवीजन्स पूरी मिल गईं। अमृतसर जिला मिल गया। गुरुदासपुर की तीन तहसीलें पठानकोट, गुरुदासपुर और बटाला मिल गईं। एक हिस्सा कसूर तहसील का मिल गया। दरअसल जितना फिरोजपुर भारत को मिला भी था, तो वो भी माउंटबेटन के दखल के बाद मिला था।
सीमा आयोग की उलटबांसियां
बंटवारे की जिम्मेदारी एक ऐसे व्यक्ति को सौंपी गई, जो कभी भारत नहीं आया था। इसे यह कहकर उसकी खूबी बताया गया कि वो निष्पक्ष रहेगा। लेकिन पांच हफ्तों में केवल चार सहयोगियों के दम पर इतने बड़े अनजान देश का बंटवारा असम्भव सा काम था और ये सही तरीके से होना तो मुमकिन ही नहीं था। ऐसा ही हुआ भी। सिरिल जॉन रेडक्लिफ जुलाई 1947 के पहले हफ्ते में भारत आया था। वह एक ब्रिटिश वकील था। पंजाब में उसके चार सहयोगियों में जस्टिस मेहर चंद महाजन, जस्टिस तेजा सिंह, जस्टिस दीन मोहम्मद और मोहम्मद मुनीर शामिल थे। चारों पंजाब सीमा आयोग के सदस्य थे, जबकि बंगाल सीमा आयोग में जस्टिस सीसी विश्वास, जस्टिस बीके मुखर्जी, जस्टिस अबू सलेह अकरम और जस्टिस एस ए रहमान शामिल थे। दोनों आयोगों में आधे यानी दो सदस्य कांग्रेस ने मनोनीत किए थे और दो मुस्लिम लीग ने।
ये तय था कि इतने कम समय में इन सदस्यों और इनके अध्यक्ष में सहमति कम और असहमतियां ज्यादा होनी थीं, वो हुई भीं। पंजाब सीमा आयोग में मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि जस्टिस दीन मोहम्मद और जस्टिस मोहम्मद मुनीर थे। कांग्रेस की तरफ से जस्टिस मेहर चंद महाजन और जस्टिर तेजा सिंह थे। पंजाब आयोग की पहली बैठक ही रेडक्लिफ की अध्यक्षता में 14 जुलाई को हुई थी और इसमें सभी पार्टियों को आमंत्रित किया गया कि वो अपने अपने ज्ञापन 18 जुलाई तक आयोग को दे दें। लाहौर में 21 से 28 जुलाई तक सबसे वरिष्ठ सदस्य जस्टिस दीन मोहम्मद की अगुवाई में आयोग के सार्वजनिक सत्र रखे गए। इधर रेडक्लिफ ने बंगाल सीमा आयोग की बैठकों में पहले भाग लिया। 31 जुलाई के बाद रेडक्लिफ शिमला में आयोग सदस्यों से मिले। आयोग के सभी सदस्य, जैसी कि आशंका थी एक दूसरे के साथ सहमति नहीं बना पाए।
नतीजा आनन फानन में विभाजन की रेखा खींच दी गयी। इस विभाजन के चलते अकेले बंगाल में ही 33 लाख लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़नी पड़ी थी। 26 लाख हिंदुओं को पूर्वी बंगाल (पूर्वी पाकिस्तान) को छोड़कर भारत आना पड़ा था तो 7 लाख मुस्लिमों को पश्चिम बंगाल से पूर्वी बंगाल यानी पाकिस्तान जाना पड़ा था।
ऐसे में ये विभाजन अपने आप में पीढ़ियों के लिए केस स्टडी की तरह है, कि कैसे एक तात्कालिक समस्या सुलझाने के लिए कैलेंडर के पीछे भागती ब्रिटेन जैसी महाशक्ति ने कुछ हताश, कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं की वजह से भारतीय उपमहाद्वीप को इतने अवैज्ञानिक और अंसंवेदनशील तरीके से विभाजित किया। जितनी मौतें अंग्रेजी राज में फांसी और फायरिंग की वजह से नहीं हुईं होंगी, उससे कई गुना ज्यादा इस फैसले से हो गईं। इस विभाजन ने भारतीय उपमहाद्वीप के लाखों परिवारों को जो असहनीय दर्द दिया उसकी पीड़ा से वो आज 76 साल बाद भी नहीं उबर पाये हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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