High Seas Treaty: समुद्री जैव एवं प्राकृतिक संपदा बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि
पृथ्वी के 70 प्रतिशत क्षेत्र को घेरे रहने वाला समुद्र, इसकी विविधतापूर्ण जैव संपदा को नष्ट होने से बचाने के लिए सौ से अधिक देशों ने एक हाई सीज ट्रीटी पर सहमति दी है। इसे लेकर काफी उम्मीदें हैं लेकिन सवाल भी कम नहीं हैं।

High Seas Treaty: पृथ्वी, जीवन और समुद्र का आपस में गहरा नाता है। सच तो यह है कि पृथ्वी पर जीवन का आगमन ही समुद्र से हुआ था। समुद्र आज भी लाखों प्रजातियों का निवास है। लेकिन, मनुष्य के समुद्र समान अथाह लालच ने इसे और इसकी जैव विविधता को बहुत नुकसान पहुंचाया है। दिनों दिन बढ़ता समुद्री परिवहन, बेइंतहा शिकार और अंधाधुंध खनन ने समुद्र की स्वाभाविक पारिस्थितिकी को नष्ट होने के कगार पर पहुंचा दिया है।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) समय- समय पर आंकड़े जारी करता है कि कहां पर और कौन-कौन सी प्रजातियां खतरे में हैं। ऐसी प्रजातियों के लिए आईयूसीएन एक लाल सूची जारी करता है। इस सूची के अनुसार 5,652 समुद्री प्रजातियों का अस्तित्व गहरे संकट में है। ज्ञातव्य है कि समुद्र इतना विशाल और अगाध है कि अभी ऐसी लाखों समुद्री प्रजातियां हो सकती हैं जिनकी हमें जानकारी ही न हो।
ऐसे में मुमकिन है कि संकटग्रस्त प्रजातियों की वास्तविक संख्या हमारे अनुमान से कई गुना ज्यादा हो। विलुप्त या विलुप्त होने के कगार पर आ पहुंचे समुद्री जीवों की सूची में स्टेलर सी काऊ, ड्रोमेडरी कैमल, प्रेजवल्स्की हॉर्स, कोलैथैंक्स, साउदर्न ब्लू फिश टूना, हॉक्सबिल्स, लेदरबैक सी टर्टल, लॉगर हेड्स, ग्रीन और ऑलिव रिडले टर्टल, सॉ फिश, डगोंग्स, हंपहेड रेसेस, हंपबैक व्हेल, व्हेल शार्क, ग्रे नर्स शार्क, ग्रेट वाइट शार्क और ब्लू व्हेल की कई प्रजातियाँ शामिल हैं।
पिछले पचास सालों में हाई सीज में शार्क की आबादी घटकर तीस प्रतिशत रह गई है, जिसकी वजह सीमा से अधिक मछलियां पकड़ना है। खतरा सिर्फ इन प्राणियों को ही नहीं है, बल्कि पूरी महासागरीय पारिस्थितिकी को है। समुद्रों की गोद में करीब साढ़े तीन लाख वर्ग किलोमीटर में फैली ग्रेट बैरियर रीफ जैसी अनेक प्राकृतिक संपदाओं को लेकर भी ऐसी ही चेतावनियां बरसों से दी जा रही हैं। इसके बावजूद हाई सीज में बहुमूल्य समुद्री खनिजों के खनन की नई-नई योजनाओं का बनना और इन पर अमल जारी है।
सागर को बचाने की संधि
महासागरों और उनकी तमाम ज्ञात-अज्ञात विरासतों पर मंडराता यह संकट आज का नहीं है। संयुक्त राष्ट्र वर्षों से कोशिश कर रहा था कि वह सदस्य देशों को एक साथ मिलकर इस दिशा में काम करने के लिए राजी कर सके। अब कहीं जाकर उसे अपने प्रयासों में सफलता मिली है।
समुद्री जीवन को बचाने के लिए बीस साल से जारी यह लंबी बातचीत पिछले सप्ताह अपने ऐतिहासिक अंजाम तक पहुंची, जब सौ से ज्यादा सदस्य देशों ने इससे संबंधित संधि को लेकर सहमति जताई। न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में 38 घंटों चले विचार-विमर्श के बाद ये देश 'हाई सीज ट्रीटी' के लिए राजी हुए।
इस संधि के तहत वर्ष 2030 तक विश्व के तीस प्रतिशत महासागरों को संरक्षित किया जाएगा। साथ ही, संधि के अंतर्गत महासागरों में मौजूद समुद्री जीवजंतुओं, वनस्पतियों, खनिजों की सुरक्षा व उन्हें नया जीवन देने के प्रयास भी किए जाएंगे। इसके लिए संधि में शामिल देश अपनी राष्ट्रीय सीमाओं से इतर एक-दूसरे को अपना सहयोग देंगे।
इस संधि के महत्व को समझने के लिए पहले हमें यह जानना होगा कि 'हाई सीज' आखिर क्या है और इस संधि को ऐतिहासिक क्यों कहा जा रहा है।
सिर्फ 1.44% समुद्र ही संरक्षित
'हाई सीज' का अर्थ है वह खुला समुद्री क्षेत्र जो किसी देश की समुद्री सीमाएं (उस देश के तट से 200 नॉटिकल मील तक का समुद्री क्षेत्र) समाप्त होने के बाद प्रारम्भ होता है। धरती का लगभग आधा भाग 'हाई सीज' के अंतर्गत आता है। अभी इसका मात्र 1.44 प्रतिशत हिस्सा ही संरक्षित हैं। इस क्षेत्र के बारे में माना जाता है कि यह अनेक जलीय प्राणियों का प्राकृतिक आवास है। यह इतना रहस्यमय है कि अभी मनुष्य को इसके बारे में काफी कम जानकारी है। गैरकानूनी तरीके से फिशिंग, माइनिंग, तेल और गैस उत्खनन, जमीन से आया प्रदूषण, हैबिटेट लॉस आदि की वजह से हाई सीज के लिए खतरा बढ़ता ही गया है।
अभी तक इस संधि के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि सदस्य देशों में फंडिग की जिम्मेदारी और फिशिंग के अधिकारों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। इसलिए जब दो दशक के बाद पहली बार ये देश 'हाई सीज' में जैवविविधता के संरक्षण के लिए इतनी बड़ी संधि पर सहमत हुए तो संयुक्त राष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर था ।
संरक्षण के लिए निकाय का गठन
पांच दौर की सघन वार्ता के बाद संभव हो पाई इस संधि के अंतर्गत हाई सीज और इसमें आने वाले जलीय जीवन को संरक्षित करने के लिए एक निकाय का गठन किया जाएगा। इसके अलावा इसके नियमित आकलन की व्यवस्था भी की जाएगी ताकि पता चल सके कि व्यावसायिक गतिविधियों से समुद्र को क्या-क्या नुकसान हो रहा है और इसे कैसे कम किया जा सकता है। संधि समुद्री जैविक स्रोतों, जैसे प्लांट मैटेरियल, जीव-जंतु, औषधियां, माइक्रोब्स आदि से होने वाली आय का समान व न्यायोचित बंटवारा भी सुनिश्चित करेगी।
पर्यावरण प्रेमी इस संधि को लेकर बहुत उत्साहित हैं। और उन्होंने एकदम से इससे काफी आशाएं भी लगा ली हैं कि यह समुद्र की जैव विविधता को संरक्षित- संवर्द्धित करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगी। लेकिन, विशेषज्ञों को इसमें संदेह है। इसकी सबसे बड़ी वजह संधि के अंतर्गत आने वाले खुले समुद्री क्षेत्र का विशाल आकार है। संधि में शामिल देशों को मोटे तौर पर दस मिलियन वर्ग किलोमीटर 'संरक्षित समुद्री क्षेत्र (एमपीए)' का ख्याल रखना होगा। दूसरी समस्या यह है कि एमपीए में संरक्षण के लिए, संधि कुछ महासागरीय क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को सीमित करने की बात करती है।
लेकिन, यह महासागरों को आवश्यकता से अधिक मछली पकड़ने, शिकार, शिपिंग और गहरे समुद्री खनन से बचाने में कितना सक्षम होगी, कहा नहीं जा सकता। गहन समुद्र में कोबाल्ट, मैगनीज, जिंक और अन्य कई कीमती पदार्थों के अथाह भंडार है। हालांकि अभी इनके खनन की अनुमति नहीं है, लेकिन बहुत सारे देशों की लोभी नजरें इन पर हैं और वे इन्हें हासिल करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
व्यावहारिक अड़चनें
इसके अलावा संधि को अमल में लाने के लिए कुछ व्यावहारिक अड़चनें भी हैं। जैसे कि इस संधि को लागू करने के लिए सभी देशों को इसके मसौदे को औपचारिक रूप से अपनाना होगा और अपने-अपने देश की पार्लियामेंट से भी मंजूरी लेनी होगी। इसे लागू करने के लिए कम से कम साठ देशों को इसे अपनाना जरूरी होगा, जिसमें एक लंबा समय लग सकता है।
इसके अलावा खुले समुद्र में कौन से इलाके संरक्षित हैं, इसका निर्धारण भी आसान नहीं होगा। और न ही यह आकलन करना कि खनन से पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है या खनन से प्राप्त खनिजों पर किसका अधिकार होगा।
जाहिर है कि अभी बहुत सारे ऐसे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर मिलने के बाद ही संधि के भावी परिणामों के बारे में कुछ कहा जा सकता है। लेकिन, यह संधि निस्संदेह स्वागत योग्य है और उम्मीद की जानी चाहिए कि इसे प्रभावी बनाने के रास्ते भी जल्द ही खोज लिए जाएंगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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