Hidden Camera: छिपे कैमरों का शिकार होती लड़कियां
Hidden Camera: हाल के समय में चोरी-छुपे लड़कियों के वीडियो बना लेने के कई मामले सामने आए हैं पर दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा मीडिया में रिपोर्ट की गई एक ऐसी ही घटना का स्वतः संज्ञान लिया जाना, इन घटनाओं की गंभीरता को सामने रखता है। गौरतलब है कि आईआईटी दिल्ली में हुई एक घटना के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस को आरोपियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई के संबंध में दो हफ्ते में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
बेटियों की सुरक्षा में सेंधमारी की इस घटना का स्वतः संज्ञान लेते हुए अदालत ने उत्पीड़न के ऐसे मामलों को लेकर चिंता भी जताई है। हाईकोर्ट का यह निर्देश आआईटी-दिल्ली में हुई उस घटना के बाद आया है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की कई छात्राओं ने आरोप लगाया था कि संस्थान में आयोजित उत्सव के दौरान एक फैशन शो के लिए आईआईटी-दिल्ली के वॉशरूम में कपड़े बदलते समय गुप्त रूप से उनका वीडियो बनाया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिकारियों को इस दिशा में कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

चिंतनीय है कि सामाजिक-पारिवारिक समारोह हो या अकादमिक संस्थान के परिसर में आयोजित उत्सव, यात्रा के सार्वजनिक साधन हों या अपना घर का आँगन, गुप्त रूप से महिलाओं और लड़कियों के वीडियो फिल्माने की कुत्सित प्रवृत्ति ने सुरक्षा के मोर्चे पर चिंतनीय स्थितियाँ खड़ी कर दी हैं। कुछ समय पहले लेडीज टॉयलेट में छिपाकर रखे गए मोबाइल फोन से मुरादाबाद के एक पीजी कॉलेज में महिला एसोसिएट प्रोफेसर का अश्लील वीडियो बनाए जाने का शर्मनाक मामला सामने आया था। पुलिस छानबीन में पता चला है कि कॉलेज के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने मोबाइल फोन को चालू करके महिलाओं के शौचालय में छुपा दिया था। बाद में इसी फोन में वीडियो रिकॉर्ड हुआ।
विकृत मानसिकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज के सात वर्ष पहले एक रेलवे कर्मचारी द्वारा ही ट्रेन के टॉयलेट में मोबाइल छिपाकर महिलाओं के अश्लील वीडियो बनाने का मामला भी सामने आ चुका है। रेलवे में एसी मैकेनिकल कर्मचारी के रूप में कार्यरत 31 वर्षीय आरोपी की इस हरकत का पता एक महिला की सतर्कता से चल पाया। जांच के बाद ट्रेन के टॉयलेट से मिले मोबाइल फोन से महिलाओं के कई वीडियो भी मिले थे।
दरअसल, चोरी छिपे महिलाओं के वीडियो बनाने का दुस्साहस ना केवल मानवीय व्यवहार के स्तर पर पीड़ादायी है बल्कि बेटियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंताजनक है। वॉशरूम या व्यक्तिगत जगह पर कपड़े बदलते या नहाते हुए फिल्मा लिए जाने वाले ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिये जाते हैं। ऐसी सामग्री के कारण कई लड़कियों के साथ ब्लैकमेलिंग का खेल भी खेला जाता है। वायरल करने की धमकियाँ देकर शारीरिक शोषण और पैसे ऐंठने का जाल भी बिछाया जाता है।
ऐसा लगता है कि बिना किसी गलती के ही घर से दूर रहकर पढ़ने या काम करने वाली बेटियों के लिए शोषण का कभी ना खत्म होने वाला अंतहीन सिलसिला भी चल पड़ता है। कई बच्चियाँ सामाजिक अपमान से भय से आत्महत्या तक कर लेती हैं। छिपकर वीडियो बनाने के बढ़ते दुस्साहस और धमकियों जैसे भयावह परिणामों ने समग्र समाज को चिंता में डाल दिया है। यही वजह है कि आईआईटी दिल्ली में हुई घटना को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए जाने की बात कही है, ताकि छात्र-छात्राएं सुरक्षा में सेंधमारी की ऐसी घटनाओं का सामना करने के डर के बिना ऐसे आयोजनों का हिस्सा बन सकें।
न्यायालय ने यह भी कहा कि 'दुर्भाग्य से इस अदालत के सामने ऐसे आयोजनों के दौरान छात्राओं के उत्पीड़न के कई और मामले भी आ रहे हैं। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति सुरक्षा व्यवस्था लागू करने के मामले में ऐसे उत्सवों का आयोजन करने वाले अधिकारियों के उदासीन रवैये को दर्शाती है, जिसका उद्देश्य कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले या शामिल होने वाले छात्र-छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसीलिए उपरोक्त मामले के मद्देनजर यह अदालत दिल्ली-एनसीआर में कॉलेज-विश्वविद्यालयों की ओर से आयोजित उत्सवों में, विशेष रूप से छात्राओं के संबंध में सुरक्षा में सेंधमारी के मुद्दे का स्वतः संज्ञान लेना उचित समझती है। व्यावहारिक धरातल पर देखा जाए तो न्यायालय की चिंता समाज की साझी चिंता है। वहीं अदालत की स्पष्ट-सधी टिप्पणी सराहनीय भी है और विचारणीय भी।
निस्संदेह, ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाना आवश्यक भी है। आपराधिक मानसिकता के लोगों का यह दुस्साहस कानूनी रूप से भी अपराध है और इंसानी मोर्चे पर भी। आईआईटी दिल्ली के मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि घटना के संबंध में आईपीसी की धारा- 354 सी के तहत मामला दर्ज किया गया है। इस धारा के अंतर्गत किसी महिला को उसकी मर्जी के बगैर गुप्त रूप से देखना या तस्वीर/वीडियो लेना गैर-जमानती, संज्ञेय आपराधिक कृत्य ही है। इसमें पहली बार दोषी पाये जाने पर 1 से 3 वर्ष कारावास और दूसरी बार दोषी पाये जाने पर 7 वर्ष कारावास के साथ जुर्माने का प्रावधान है।
इसका सीधा सा अर्थ है कि कोई पुरुष, जो निजी कार्य में संलग्न स्त्री को उन परिस्थितियों में देखता है या उसका चित्र खींचता है, जहां उसे सामान्यतः या तो अपराधी द्वारा या अपराधी की पहल पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा देखे न जाने की प्रत्याशा होगी, या ऐसे चित्र को प्रसारित करता है तो उस पर धारा 354-सी के तहत मुकदमा दर्ज किया जाता है। जरूरी है कुत्सित मानसिकता के लोग अपनी हरकतों से बाज आएं। अपनी रुग्ण मानसिकता में सुधार करने की सोचें। सुविधा के रूप में तकनीकी सौगातों का इस्तेमाल किसी का जीवन दुश्वार करने के लिए ना हो।
तकनीक का उपयोग इसके लाभ या हानि तय करता है। स्मार्ट गैजेट्स इस्तेमाल करने वालों के आंकड़ों में नित नए रिकॉर्ड बना रहे हमारे देश में आज भी इन तकनीकी साधनों के सही इस्तेमाल की समझ नहीं दिखती है। पीड़ादायी तो यह है कि ये गैजेट्स आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने का जरिया बन गए हैं। विडम्बना ही है कि हमारे सामाजिक परिवेश में लोगों की इस आपराधिक मानसिकता और दिशाहीनता का खामियाजा बेटियों को ही उठाना पड़ता है। कितने ही मामले इस बात की पुष्टि करते हैं कि हर हाथ आए स्मार्ट फोन ने बेटियों की सुरक्षा के मोर्चे पर नई तरह की चिंताएँ पैदा कर दी हैं।
राह चलते तो लड़कियां असुरक्षित हैं ही, शौचालय जैसी जगहों पर भी उनकी निजता का हनन हो रहा है। ऐसे में असुरक्षित होते परिवेश में सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि अपनी लाज बचाने के लिए बेटियां जाएं तो आखिर कहाँ जाएँ?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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