राजस्थान में इस बार भाजपा की 25 सीटों पर हैट्रिक मुश्किल

Rajasthan BJP: राजस्थान में भाजपा के लिए 2014 और 2019 की तरह सभी 25 सीटें जीतना इस बार आसान नहीं लग रहा है। बल्कि जमीनी रिपोर्ट संकेत दे रही हैं कि भाजपा कम से कम चार पांच सीटें हार सकती है। 19 अप्रेल को जिन 12 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुआ है, उनमें ही पांच सीटों चूरू, सीकर, झुंझुनूं, नागौर और दौसा सीटों पर भाजपा के पसीने छूट गए।

19 अप्रेल को श्रीगंगानगर, बीकानेर, चुरू, नागौर, झुंझुनू, सीकर, जयपुर, जयपुर ग्रामीण, अलवर, भरतपुर, दौसा और करौली धोलपुर में वोटिंग हो चुकी है। बाकी की 13 सीटों पर 26 अप्रेल को वोटिंग होगी।

Hat-trick difficult for BJP on 25 seats in Rajasthan this time

जिन पांच सीटों पर कांटेदार टक्कर हुई, उनमें नागौर की चर्चा सबसे ज्यादा रही। भाजपा ने लगातार तीन बार कांग्रेस टिकट पर हारी मिर्धा परिवार की ज्योति मिर्धा को दलबदल करवा कर उम्मीदवार बनाया। पिछली बार भाजपा ने यह सीट आरएलपी के हनुमान बेनीवाल के लिए छोडी थी, वह जीते भी।

बेनीवाल के कारण युवा जाट बड़ी तादाद में भाजपा से जुड़े, जिससे भाजपा को बाकी सीटों पर भी जाट वोटों का फायदा हुआ, लेकिन कृषि कानूनों के खिलाफ वे एनडीए छोड़ गए, और इस बार कांग्रेस के समर्थन से मैदान में हैं। ज्योति मिर्धा दो बार लोकसभा चुनाव बेनीवाल के कारण ही हारी थी, पिछला चुनाव तो खुद उनसे हार गई।

हालांकि 2009 में ज्योति कांग्रेस टिकट पर जीती भी थी, लेकिन अगले दो लोकसभा चुनाव हारने के बाद 2023 में वह भाजपा में शामिल हो गई। नवंबर 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ज्योति मिर्धा को नागौर शहर से चुनाव मैदान में उतारा। लेकिन भाजपा के टिकट पर उतरने के बाद भी ज्योति को कांग्रेस के हरेंद्र मिर्धा ने 13970 वोटों से हरा दिया।

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इस प्रकार ज्योति मिर्धा को लगातार तीसरी हार का सामना करना पड़ा। बार-बार चुनाव हारने के कारण बुजुर्ग मतदाताओं में उनके प्रति सहानुभूति तो है, लेकिन ज्योति मिर्धा के सामने हनुमान बेनीवाल हैं, जिन्होंने युवा जाट वोटरों में अपनी अलग पहचान बनाई है। इसलिए यह सीट भाजपा के लिए खतरे से खाली नहीं है।

दूसरे नंबर पर भाजपा के लिए खतरे वाली सीट चूरू है। चूरू जिले की तारानगर सीट से भाजपा के बड़े नेता राजेन्द्र राठौड़ विधानसभा चुनाव हार गए थे, जो खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते थे। राजेन्द्र राठौड़ ने अपनी हार का दोष स्थानीय सांसद राहुल कस्वां पर डाल कर उनका टिकट कटवा दिया।

राजेन्द्र राठौड़ का आरोप था कि राहुल कस्वां ने उन्हें हराने के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार नरेंद्र बुडानिया की मदद की। भीतरघात के आरोप में कस्वां का टिकट कटा, तो वह कांग्रेस में शामिल होकर कांग्रेस के उम्मीदवार बन गए। कस्वां उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के रिश्तेदार हैं। मोदी ने उन्हें जाट वोटों को रोकने के लिए ही उपराष्ट्रपति बनाया, लेकिन वह अपने रिश्तेदार को ही नहीं रोक सके।

भाजपा ने कस्वां के सामने जाट समाज के ही पैरा एथलीट देवेंद्र झाझड़ियां को मैदान में उतारा। कस्वां का टिकट कटने के बाद से जाट समाज का एक वर्ग भाजपा से नाराज है, जिसका नतीजा झाझड़िया को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए यह सीट भी खतरे से खाली नहीं है। वैसे भी जाट परंपरागत रूप से कांग्रेस समर्थक रहा है। कड़े मुकाबले में भाजपा खुन्नस में काटी गई टिकट की वजह से अपनी यह सीट गंवा सकती है।

तीसरे नंबर पर भाजपा के लिए खतरे वाली सीट सीकर है। सीकर हालांकि जाट बहुल सीट है, जाटों में कांग्रेस का प्रभाव भी है, लेकिन यह सीट कांग्रेस सात बार जीती और दस बार हारी है। इसलिए कांग्रेस ने यह सीट गठबंधन में सीपीएम को दे दी, जिसने किसान नेता अमरा राम को अपना उम्मीदवार बनाया।

भाजपा ने दो बार के सांसद सुमेधानन्द सरस्वती को ही तीसरी बार भी टिकट दिया है, जिन्हें खुद की एंटी इनकम्बेंसी का सामना करना पड़ा। तीन चुनावों में पहली बार कांटे की टक्कर दिखाई दी। सत्रह बार के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस इस सीट को सिर्फ सात बार जीती है, जबकि सात बार जनसंघ या भाजपा के उम्मीदवार जीते, तीन बार गैर भाजपा-गैर कांग्रेस, एक बार जनता दल की टिकट पर चौधरी देवी लाल, एक बार जनता पार्टी सेक्यूलर की टिकट पर कुंभा राम आर्य और 1952 में पहला चुनाव राम राज्य परिषद की टिकट पर नन्द लाल शर्मा जीते थे।

भाजपा के लिए खतरे वाली चौथी सीट झुंझुनूं है, जो राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की सीट है, जनता दल की टिकट पर वह झुंझनू से 1989 में जीते थे, हालांकि इसके बाद वह कभी भी नहीं जीत सके। इसके बाद 2009 तक यह सीट कांग्रेस के पास रही, जिनमें 1996 से 2009 तक पांच बार लगातार कांग्रेस के मौजूदा उम्मीदवार बृजेंद्र ओला के पिता शीशराम ओला सांसद थे।

बृजेंद्र ओला अभी कांग्रेस विधायक हैं, भाजपा पिछले दो चुनाव जीती जरुर, लेकिन हर बार उम्मीदवार बदल कर। 2014 में संतोष अहलावत जीती थी, 2019 में नरेंद्र कुमार जीते थे, और इस बार भाजपा ने शुभकरण चौधरी को टिकट दिया है। शीश राम ओला के बेटे को अपना उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने झूंझनू सीट में कांटेदार टक्कर बना दी है। ओला और चौधरी के जरिए दोनों पार्टियों ने जाट मतदाताओं को साधने का प्रयास किया है।

भाजपा की पांचवीं खतरे वाली सीट दौसा है। जहां कांग्रेस ने दौसा से विधायक मुरारीलाल मीणा को टिकट दिया है, उनके सचिन पायलट खेमे के नेता होने के कारण गुर्जर वोट बैंक का भी उन्हें लाभ मिला है। सचिन पायलट के लिए इस सीट को जिताना अपने राजनीतिक भविष्य के लिए भी जरूरी था, इसलिए उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। भाजपा ने बस्सी से पूर्व विधायक कन्हैया लाल मीणा को मैदान में उतारा था। गुर्जर, मीणा, दलित और मुस्लिम वोटर्स के समीकरणों की वजह से कांग्रेस का पक्ष मजबूत दिखाई देता है। अगर कांग्रेस में भीतरघात न हुआ, तो दौसा भाजपा के लिए अत्यंत मुश्किल सीट है।

उम्मीदवार बदलने और उम्मीदवार के बाहरी होने के कारण अलवर भी भाजपा के लिए आसान सीट नहीं रही। भाजपा ने केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव को टिकट दिया, वह मूल रूप से हरियाणा से हैं। जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार ललित यादव स्थानीय राठ क्षेत्र से हैं, इसलिए कांग्रेस ने भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ बाहरी होने का मुद्दा बनाया। मुंडावर, बहरोड़ विधानसभा क्षेत्रों में उनकी पकड़ भी काफी मजबूत है।

भूपेन्द्र यादव को अलवर से उतारने के बाद भाजपा नेतृत्व को बहुत पापड़ बेलने पड़े। खुद नरेंद्र मोदी और अमित शाह उनके इलाके में रैली करने गए। इसके बावजूद खतरे से बचने के लिए भूपेन्द्र यादव ने राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और 'मोदी की गारंटी' को अपने प्रचार का मुद्दा बनाकर ही प्रचार किया।

इसके अलावा जाट बहुल लेकिन अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट भरतपुर में भी भाजपा को जाट आंदोलन का सामना करना पड़ा। भरतपुर सीट पर जाट आरक्षण आंदोलन की हवा बह रही थी। क्षेत्र में करीब 5 लाख जाट वोटर्स हैं। वहीं करीब 3.50 लाख जाटव वोटर्स हैं, जो एक बड़ा वर्ग है। कांग्रेस कैंडिडेट संजना इसी समाज से हैं। भाजपा प्रत्याशी रामस्वरूप कोली पहले बयाना (अब भरतपुर) सीट से लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं।

वैसे तो राज्य की सभी सीटों पर भाजपा ने राम मन्दिर, अनुच्छेद 370 और मोदी सरकार की योजनाओं और मोदी की गारंटियों को ही मुद्दा बना कर चुनाव लड़ा। जिससे जयपुर शहर, जयपुर ग्रामीण, करौली-धोलपुर, बीकानेर, श्रीगंगानगर में हिंदू वोटों की लामबंदी हुई।

जयपुर शहर की सीट पर बीजेपी ने दिग्गज नेता रहे भंवरलाल शर्मा की बेटी मंजू शर्मा को उम्मीदवार बनाया, समीकरणों के हिसाब से भी यहां भाजपा को मजबूत माना जाता रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रोड शो के लिए भी जयपुर का ऐसा ही इलाका चुना।

जयपुर ग्रामीण सीट पर भाजपा ने पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष राव राजेंद्र सिंह को टिकट दिया, जबकि ।कांग्रेस ने सचिन पायलट खेमे के अनिल चोपड़ा को उम्मीदवार बनाया है। राव राजेंद्र सिंह को भाजपा के मजबूत कैडर का समर्थन और राम मंदिर के मुद्दे की वजह से शहर-कस्बों में फायदा हो रहा है।

करौली सीट पर भी भाजपा ने अपने सांसद मनोज राजोरिया का टिकट काटकर इंदु देवी को मैदान में उतारा है। जहां जहा भाजपा ने उम्मीदवार बदला, वहां वहां उसे मुश्किल का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के उम्मीदवार भजनलाल जाटव भी दो बार विधायक और एक बार मंत्री रह चुके थे, जिस कारण उनकी लोकप्रियता बनी हुई है। फिर भी यह सीट भाजपा के लिए मजबूत मानी जाती है।

बीकानेर में फिर से भाजपा ने कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को ही अपना उम्मीदवार बनाया, जिन्हें मोदी के नजदीक माना जाता है। श्रीगंगानगर सीट भी भाजपा के लिए सुरक्षित कही जा सकती है, हालांकि इस सीट पर भी पार्टी ने अपना उम्मीदवार बदल दिया। भाजपा से प्रियंका बैलान उम्मीदवार है, जबकि कांग्रेस ने कुलदीप इंदौरा को उम्मीदवार बनाया है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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