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Women Voters: महिला मतदाताओं की बढ़ती भूमिका से बदली राजनीति?

Women Voters: आगामी लोकसभा चुनावों में भी राजनीतिक दलों की रणनीति से लेकर चुनाव आयोग की योजनाओं तक, महिला वोटर्स की रेखांकित करने योग्य भागीदारी को लेकर गहनता से सोचा जा रहा है। एक ओर राजनीतिक दल आधी आबादी को लुभाने वाली योजनाओं और नीतियों को सामने ला रहे हैं तो दूसरी ओर चुनाव आयोग मतदान में स्त्रियों की रिकार्ड हिस्सेदारी दर्ज़ करवाने की तैयारी में जुटा है।

भारतीय निर्वाचन आयोग की ओर से लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों की घोषणा करने के साथ ही महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर भी विशेष प्रयास करने की बात कही गई है। सुखद यह भी है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की अहमियत समझी जा रही है।

women voters

हमारे देश की जनसंख्या का करीब आधा हिस्सा महिलाएँ हैं। देश में महिलाओं की आबादी करीब 48.5 प्रतिशत है। बावजूद इसके स्त्रियों की सुरक्षा, सम्मान और श्रम से जुड़े मुद्दों को वह आवाज़ नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी। इसकी एक बड़ी वजह महिलाओं में मताधिकार को लेकर जागरूकता की कमी भी रही।

कहना गलत नहीं होगा कि हालिया बरसों में स्त्रियों से जुड़ी योजनाओं और नीतियों को प्राथमिकता दिए जाने का सबसे अहम कारण मतदान को लेकर आई सजगता ही है। अब स्त्रियाँ अपने मताधिकार के मायने गंभीरता से समझने लगी हैं। जबकि पहले घर के पुरुष सदस्य जिसे वोट करते उनका वोट भी उसी प्रत्याशी को जाया करता था।

इतना ही नहीं आज मतदान का रिकार्ड बनाने वाली महिलाएं एक समय वोट डालने भी घर से कम ही निकलती थीं। अब सामाजिक-पारिवारिक हालात भी बदले हैं और महिलाओं की व्यक्तिगत सोच भी। परिणामस्वरूप, ना केवल महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ा है बल्कि स्त्रियाँ अपने मत को लेकर स्वतंत्र रूप से निर्णय भी कर पा रही हैं। इतना ही नहीं महिलाएँ सामयिक बदलावों और जीवन से जुड़े विषयों को लेकर जागरूक भी हैं।

यह समाज और स्त्री जीवन दोनों के लिए सुखद है कि कभी कर्तव्य निर्वहन की सोच तक सिमटी आधी आबादी अब घर के आँगन से लेकर देश के परिवेश तक, अपने अधिकारों की भी समझ रखती है। गौरतलब है कि 2014 के आम चुनावों में भी आधी आबादी ने बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी दर्ज़ करवाई थी। वर्ष 2024 में होने जा रहे आम चुनावों के लिए चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार इस बार कुल 96.8 करोड़ वोटर होंगे। इनमें 49.7 करोड़ पुरुष और 47.1 करोड़ महिला मतदाता शामिल हैं। पिछले आम चुनावों में महिला मतदाताओं का आंकड़ा 43.1 करोड़ था।

आंकड़ों के मुताबिक नई महिला मतदाताओं की संख्या नए पुरुष मतदाताओं के मुकाबले 15 प्रतिशत अधिक है। लोकसभा की 50 सीटें तो ऐसी हैं जहां महिला वोटर्स की संख्या ज्यादा हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक मतदाता सूची में लिंगानुपात सकारात्मक रूप से बढ़ा है। यह बढ़ोतरी देश के जनतांत्रिक ढांचे को आकार देने में महिलाओं की बढ़ती भूमिका का संकेत भी देती है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के मुताबिक देश में लिंगानुपात 1000 पुरुषों पर 948 महिलाओं का है, जो चुनावी चक्र में महिलाओं की भागीदारी का एक बहुत स्वस्थ संकेत है।

ऐसे में रेखांकित करने योग्य बात यह भी है कि भारतीय समाज में महिलाओं के मतदान प्रतिशत का इज़ाफा लैंगिक भेदभाव के मोर्चे पर भी एक बड़ा बदलाव है। लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे देश में 18वीं लोकसभा के चुनाव में आधी आबादी की यह भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण साबित होने वाली है।

दरअसल, जीवन से जुड़ी बुनियादी हालातों से महिलाएं ही सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, महंगाई, सम्मान, पोषण और समानता के मोर्चे पर कई छोटी-छोटी लगने वाली बातें उनका जीवन बदल देती हैं। हालांकि इनके लिए कोई बड़ी रणनीति की दरकार नहीं होती पर इन बदलावों का आधार बनने वाली योजनाओं की पहुंच सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। आमतौर पर महिलाएं योजनाओं का लाभ उठाने में भी आगे रहती हैं।

पारम्परिक सोच वाले हमारे सामाजिक ढांचे में अब चुनावों से जुड़े अध्ययन और आंकड़े यह भी बताने लगे हैं कि घर की महिलाएं स्वतंत्र रूप से अपने मतदान का निर्णय करने लगी हैं। अब प्रत्याशियों के चुनाव और अपनी बेहतरी से जुड़ी योजनाओं को समर्थन देने के मामले में आधी आबादी की सोच अपने परिवार के दूसरे सदस्यों से अलग दिखती है। इसके पीछे महिलाओं में शिक्षा और आत्मनिर्भरता के बढ़ते आंकड़े तो हैं ही, आधी आबादी की बदलती सोच एवं सजगता भी अहम है।

गौर करने वाली बात है कि अमेरिका में भी महिलाओं को समान मताधिकार मिलने में 144 साल लग गए, जबकि भारत में आजादी के समय से ही महिलाओं को वोट देने का हक हासिल था। शुरुआत में महिलाओं का वोट डालने का निर्णय घर-परिवार की सोच से प्रभावित हुआ करता था पर देश में 1971 के बाद महिला वोटरों में तेज़ी से वृद्धि हुई है।

स्पष्ट है कि बदलाव और बेहतरी के इस मोड़ से स्त्री शिक्षा के आँकड़े भी बढ़ने शुरू हुए। हाल के बरसों में तो उनकी पहुंच हर क्षेत्र तक हो गई है। उच्च शिक्षा में बेटियों का दखल खूब बढ़ा है और बढ़ रहा है। बदलता परिदृश्य बताता है कि आज की शिक्षित-सजग युवतियाँ सुरक्षा और सम्मानजनक परिवेश चाहती हैं। ऐसे में उनकी राजनीतिक राय के मायने भी बढ़ गए हैं।

कहना गलत नहीं होगा महिलाओं की यह सियासी लामबंदी और खुद से जुड़ी प्राथमिकताओं को लेकर आई जागरूकता पूरा चुनावी परिदृश्य बदलने में सक्षम है, जिसका सीधा सा अर्थ है कि हमारी लोकताँत्रिक व्यवस्था में आज उम्मीदवारों की राजनीतिक पारी आधी आबादी के समर्थन पर भी करती है। महिला मतदाताओं की जागरुकता राजनीतिक पार्टियों को उनके हितों और उनसे जुड़े मुद्दों की बात प्रमुखता से रखने का दबाव बना रही हैं। चाहे क्षेत्रीय दल हों या राष्ट्रीय पार्टियाँ। महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और लैंगिक समानता जैसे मामलों को लेकर अनगिनत बुनियादी पहलुओं पर अब सोचा जाने लगा है।

कुछ साल पहले तक राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो में जिन वरीयताओं के साथ जनता से वोट मांगे जाते थे, उनमें महिलाओं से जुड़े बुनियादी मुद्दे नदारद रहते थे। लेकिन अब कमोबेश हर चुनाव में ही महिलाओं से जुड़े मुद्दे चुनावी घोषणापत्रों में प्रमुखता से शामिल किये जाते हैं। यूं तो अपने मत के बल पर स्त्रियाँ सार्थक परिवर्तनों की नींव डाल रही हैं लेकिन अब एक नागरिक के रूप में मिले सबसे बड़े अधिकार के दम पर भावी बदलावों से जुड़ी उम्मीदों की इमारत खड़ी कर रही हैं। शासन व्यवस्था के चुनाव में स्त्रियों की ऐसी भागीदारी वैश्विक स्तर पर अपने आप में एक अनुकरणीय उदाहरण है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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