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हरियाणा के रण में घिरा भाजपा का दिग्विजयी रथ

Haryana Lok Sabha Chunav: इस बार भाजपा के लिए दिल्ली, हरियाणा और हिमाचल तीन ऐसे राज्य हैं, जहां भारतीय जनता पार्टी को 2019 का प्रदर्शन दुहराने की कठिन चुनौती दिखाई दे रही है। इन तीन राज्यों से लोकसभा की कुल 21 सीटें आती हैं। पिछले आम चुनाव में भाजपा ने यह सभी 21 सीटें जीती थी।

इनमें हरियाणा एक ऐसा राज्य है जहां भाजपा को महाराष्ट्र की तरह सीटें कम होने की आशंका है। यही कारण था कि बीजेपी केन्द्रीय नेतृत्व ने हरियाणा के दस सांसदों में से छह का टिकट काट दिया था। भाजपा को जिन सीटों पर सबसे कड़ी चुनौती मिल रही है उसमें सबसे प्रमुख सीट रोहतक है। 1991 में रोहतक से भूपेन्द्र हुड्डा कांग्रेस से सांसद बने थे। तभी से यह भूपेन्द्र हुड्डा का गढ़ रहा है। 2004 में सीएम बनने पर भूपेन्द्र हुड्डा ने इस सीट से अपने बेटे दीपेन्द्र को लड़वाया और जिताया।

Haryana Lok Sabha Chunav

2014 में मोदी लहर में भी दीपेन्द्र हुड्डा ने इस सीट को जीतकर कांग्रेस की लाज बचाई थी। 2019 में भाजपा के अरविंद शर्मा ने कांग्रेस के दीपेन्द्र हुड्डा को मात्र 7503 वोटों से हराया था। रोहतक में आने वाली आठ विधानसभा सीटों में से सात कांग्रेस के पास और सिर्फ एक भाजपा के पास है। इसलिए यहां से दीपेन्द्र हुड्डा जीत सकते हैं। रोहतक से सटी हिसार लोकसभा सीट भी भाजपा के लिए आसान नहीं है। चौटाला परिवार मूल रूप से सिरसा का है लेकिन चौटाला परिवार की राजनीति का केन्द्र हिसार रहा है। 2019 में पहली बार भाजपा तब जीती जब भाजपा ने यहां से कांग्रेस के दिग्गज वीरेन्द्र सिंह के बेटे बृजेन्द्र सिंह को टिकट दिया था।

इस बार चुनाव से पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस मेंं वापसी के बाद भी वीरेन्द्र सिंह और उनके बेटे बृजेन्द्र सिंह को इस सीट से टिकट नहीं मिला है। कांग्रेस ने यहां से 2004 में जीतने वाले पुराने नेता जयप्रकाश पर भरोसा जताया है। देवीलाल परिवार से ही तीन उम्मीदवार हैं जिसमें देवरानी जेठानी की रोचक लड़ाई दिख रही है। दुष्यंत चौटाला ने जजपा से अपनी मां नैना चौटाला को उतारा है तो देवीलाल के दिवंगत पुत्र प्रताप सिंह चौटाला की पुत्रवधु सुनैना को इनेलो ने उम्मीदवार बनाया है। भाजपा ने नैना और सुनैना के चचिया ससुर रंजीत सिंह चौटाला को उम्मीदवार बनाया है। हिसार जाट बाहुल्य सीट है। इसलिए रोहतक के बाद इस सीट से कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीद है।

सिरसा सुरक्षित सीट पर कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा को उतारा है। शैलजा सिरसा सीट से 1991 और 1996 में सांसद रह चुकी हैं। भाजपा ने यहां से कांग्रेस के बड़े नेता रहे और आम आदमी पार्टी से होते हुए भाजपा में आने वाले अशोेक तंवर को टिकट दिया है। सिरसा भाजपा की परंपरागत सीट नहीं रही है। 2019 में पहली बार भाजपा की सुनीता दुग्गल यहां से सांसद बनी थी। सिरसा किसान आंदोलन का केन्द्र रहा है। ऐसे में भाजपा के लिए यह सीट बचाना आसान नहीं है। सिरसा में भाजपा काफी हद तक गोपाल कांडा के भरोसे है।

हरियाणा में रोहतक, हिसार, सिरसा के अलावा कुरूक्षेत्र में भी दिलचस्प लड़ाई देखने को मिल सकती है। कुरूक्षेत्र सीट से 2014 और 2019 में नायब सिंह सैनी भाजपा से जीते थे। वो अब प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। इसलिए इस बार यहां से कांग्रेस के दो बार सांसद रहे नवीन जिंदल भाजपा के उम्मीदवार हैं। कांग्रेस ने गठबंधन में यह सीट आम आदमी पार्टी को दी है जिसने यहां से सुशील कुमार गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है।

गुरूग्राम, करनाल और फरीदाबाद में भाजपा की जीत लगभग तय है। गुरूग्राम से कांग्रेस ने राजबब्बर को टिकट देकर भारतीय जनता पार्टी के राव इंद्रजीत सिंह की जीत लगभग सुनिश्चित कर दी है। इसी तरह भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर करनाल से लोकसभा उम्मीदवार हैं।

हरियाणा के दो क्षेत्रीय दल जननायक जनता पार्टी और इंडियन नेशनल लोकदल मुख्य मुकाबले में नहीं है लेकिन हिसार, भिवानी, कुरूक्षेत्र और सिरसा जैसी सीटों पर असर डालने में सक्षम है। शहरों की तुलना में भाजपा को गांवों में समर्थन जुटाने में संघर्ष करना पड़ रहा है। जातियों की जमावट भी पार्टियां अपने अपने हिसाब से कर रही हैं। कांग्रेस जाट वोट के आसरे कुछ सीटें हथियाने की उम्मीद कर रही है, वहीं भाजपा गैर जाट वोटों को लामबंद करने में जुटी है। भाजपा ने दस में से सिर्फ दो जाट प्रत्याशी दिए हैं। जातिगत समीकरणों के कारण ही जाट बेल्ट वाली रोहतक, हिसार, सोनीपत और भिवानी जैसी सीटों पर कांग्रेस भाजपा को कड़ी चुनौती दे रही है।

हरियाणा की राजनीति में यह पहली बार हो रहा है कि हरियाणा की राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाले तीन दिग्गज सियासी परिवारों को न भाजपा ने और न ही कांग्रेस ने इस चुनाव में भाव दिया है। ये परिवार पूर्व सीएम भजनलाल, बंसीलाल और किसान नेता सर छोटू राम के हैं। भजनलाल और छोटूराम के परिवार को भाजपा के साथ जाना भारी पड़ गया। वहीं बंसीलाल के परिवार को कांग्रेस ने किनारे कर दिया है।

भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई इस बार हिसार सीट से टिकट चाहते थे, लेकिन भाजपा ने पूर्व प्रधानमंत्री देवीलाल के बेटे और निर्दलीय विधायक रहे रणजीत चौटाला को भाजपा में शामिल करके टिकट दे दिया। बंसीलाल चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे। उनकी राजनीतिक विरासत उनकी बहू किरण चौधरी कांग्रेस में संभाल रही है। इस बार भिवानी महेन्द्रगढ़ लोकसभा सीट से किरण चौधरी की बेटी श्रृति चौधरी टिकट की दावेदार थी लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। वहीं हरियाणा के तीसरे ताकतवर परिवार सर छोटूराम की राजनीतिक विरासत उनके नाती पूर्व केन्द्रीय मंत्री वीरेन्द्र सिंह संभाल रहे हैं। चुनाव से पहले वे अपने सांसद बेटे बृजेन्द्र सिंह के साथ भाजपा छोड़कर कांगेस में शामिल हो गये थे लेकिन कांग्रेस ने उनको कहीं से टिकट नहीं दिया।

भाजपा हरियाणा में मोदी और राम के भरोसे है, वहीं कांग्रेस किसान, जाट और स्थानीय मुद्दों को हवा देकर माहौल अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। भाजपा इस बात का भी जवाब नहीं दे पा रही है कि ठीक चुनाव से पहले मनोहर लाल खट्टर को सीएम पद से क्यों हटाया गया? हरियाणा में यह चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। लोकसभा चुनाव के छह महीेने भीतर हरियाणा में विधानसभा चुनाव होना हैै। ऐसे में भाजपा, कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के साथ ही इंडियन नेशनल लोकदल और दुष्यत चौटाला की जनहित जनता पार्टी अपनी पूरी ताकत लगा रही है।

इस बार भाजपा के लिए हरियाणा में सभी दस सीटें जीतना संभव नहीं लग रहा है फिर भी हरियाणा की सभी सीटें जीतने के लिए मोदी और शाह पूरी ताकत जरूर लगा रहे हैं। हरियाणा की सभी 10 सीटों के लिए 25 मई को मतदान होगा। भाजपा को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। किसान आंदोलन का असर भाजपा के उम्मीदवार प्रचार अभियान के दौरान महसूस भी कर रहे हैं। मतदान पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह 4 जून को ही पता चलेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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