New Year Celebration: नशे और हुड़दंग से शुरु होता नयी पीढ़ी का नया साल
New Year Celebration: नशा, हुड़दंग ये नयी पीढ़ी के लिए नये साल का जश्न बन गया है। दिल्ली की ठिठुरती सर्दी में 31 दिसंबर की आधी रात नौजवान इकट्ठा होते हैं। खूब जमकर हुड़दंग करते हैं, ऊधम मचाते हैं और उन्हें लगता है कि उनके लिए नया साल आ गया। लेकिन बात सिर्फ ऊधम और हुड़दंग तक ही सीमित नहीं रहती। अब नशाखोरी भी नये साल के जश्न का एक अनिवार्य हिस्सा हो गया है।

मुंबई से सटे ठाणे के कुछ जंगली इलाकों में बहुत से रिसोर्ट हैं। इनमें से ही एक रिसोर्ट में 31 दिसंबर को पुलिस ने छापा मारकर 100 से अधिक नौजवानों को गिरफ्तार किया है। ये सभी नौजवान नये साल का जश्न मनाने के लिए रेव पार्टी कर रहे थे। रेव पार्टी उस जश्व को कहते हैं जिसमें मंहगा और प्रतिबंधित नशा परोसा जाता है।
इसमें एलएसडी, चरस, हेरोइन (डॉयमोर्फाइन) के साथ अन्य टेबलेट्स मुहैया करायी जाती हैं जिन्हें खाने के बाद कोई भी व्यक्ति अपनी सुध बुध खो देता है।
ठाणे की इस पार्टी में जितने भी नौजवान गिरफ्तार किये गये हैं वो मुंबई और नवी मुंबई की पॉश कॉलोनियों के रहने वाले हैं। पुलिस ने उनकी पहचान तो उजागर नहीं की है लेकिन इतना जरूर कहा है कि इन नशाखोर नौजवानों की काउंसलिंग की जाएगी, तथा इनके परिवार वालों को भी बुलाकर उन्हें सच्चाई से अवगत कराया जाएगा। लेकिन सवाल पुलिस की गिरफ्तारी का नहीं बल्कि नये साल के जश्न में की जानेवाली ऐसी नशाखोरी का है। आखिर कौन हैं वो नौजवान जो एलएसडी जैसे घातक नशीले पदार्थ का सेवन करके नये साल का जश्न मनाना चाहते हैं?
अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब अभिनेता शाहरुख खान का बेटा ड्रग्स रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वह भी 1 जनवरी की तरह ही एक महत्वपूर्ण तारीख थी 2 अक्टूबर 2022। उस दिन जब देश भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के अगुवा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को याद कर रहा था तब शाहरुख खान का बेटा दोस्तों संग एक क्रूज पर रेव पार्टी कर रहा था। उस क्रूज पर साधारण यात्री की तरह सफर कर रहे नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारियों ने सभी को ड्रग्स रखने और रेव पार्टी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था।
यानी जिस दिन छुट्टी होती है या फिर कोई महत्वपूर्ण दिन होता है उस दिन देश के इलिट क्लास के युवा रेव पार्टी करके या ड्रग्स लेकर उस दिन को विशेष यादगार बनाते हैं। फिर चाहे वो महात्मा गांधी का जन्मदिन हो या फिर नये साल का जश्न। इन नौजवानों के लिए वह दिन नशाखोरी का दिन होता है। उन्हें लगता है कि अगर उस दिन उन्होंने मंहगे से मंहगा नशा नहीं किया तो उस दिन को सेलिब्रेट नहीं कर पायेंगे। यह बिल्कुल वही मनोदशा है जैसे एक शराबी की होती है। वह हर महत्वपूर्ण दिन को अधिक से अधिक शराब पीकर यादगार बनाता है।
भारत की वह नयी पीढी जो इस देश की इलिट क्लास या अपर मिडिल क्लास में गिनी जाती है उसके सामने न तो अपने आपको साबित करने का संकट है और न ही रोजी रोटी कमाने का। ऐसे परिवारों में इतना पैसा पहले से है कि उनकी एक दो पीढी बैठकर खाये तो भी खत्म नहीं होनेवाला है। ऐसे ही परिवारों से आनेवाले नौजवान मंहगे नशे की लत लगाते हैं और अपने जीवन को 'सार्थक' बनाते हैं। इन नौजवानों के परिवारवालों की पहुंच 'ऊपर' तक रहती है इसलिए पकड़े भी जाते हैं तो कुछ खास होता नहीं। जैसे शाहरुख खान के बेटे के मामले में हुआ।
देश के वो नौजवान जिन्हें अपने आप को साबित करना है, अपने जीवन को सुधारना है या पैसा कमाकर परिवार की जरूरतों को पूरा करना है, उनके पास ऐसी बातों के लिए फुर्सत नहीं रहती। लेकिन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ट्रिकल डाउन थ्योरी आर्थिक लिहाज से भले न काम करती हो परंतु पूंजीवाद के प्रभाव में बननेवाले समाज में ये थ्योरी बराबर काम करती है। जो आर्थिक पायदान पर नीचे खड़ा है उसे लगता है कि वह भी पैसा कमाकर उसी तरह का जीवन जियेगा जैसा कि इलिट क्लास या अपर मिडिल क्लास जीता है। लेकिन ऐसा जीवन खुद जीवन के लिए कितना व्यर्थ और महत्वहीन होता है, वह इसका आंकलन नहीं कर पाता है।
आज की दुनिया में क्रिश्चियन कैलेण्डर ही लगभग पूरे विश्व में मानक कैलेण्डर हो गया है। इसलिए दुनिया के अलग अलग देशों में उनकी परंपरा में नया साल कब शुरु होता है इसके बारे में लोग कम ही जानते हैं। हमारा पूरा जीवन 1 जनवरी से 31 दिसंबर वाले क्रिश्चियन कैलेण्डर से चलता है इसलिए हम 31 दिसंबर की आधी रात साल की विदाई करते हैं और 1 जनवरी को उसका स्वागत। भारत की ही अलग अलग संस्कृतियों में अलग अलग नववर्ष हैं लेकिन हमारा इलिट तो छोड़िए, हमारा मिडिल क्लास तक उसे नहीं जानता। जब जानता ही नहीं तो सेलिब्रेट भला कैसे करेगा?
मसलन, चैत्र नवरात्र प्रतिपदा भारतीय सभ्यता की अनेक संस्कृतियों के लिए नववर्ष है। सिन्धी, मराठी, तेलुगु सहित लगभग सभी हिन्दीभाषी उस दिन अलग अलग नामों से नववर्ष मनाते हैं। कोई चेतिचंड, कोई गुढीपड़वा तो कोई उगादि कहता है। इसी तरह बंगाली पहिला बैसाख को नये वर्ष के रूप में मनाते हैं जो मार्च के महीने में पड़ता है। तमिल पुथांडु के रूप में नववर्ष मनाते हैं जो अप्रैल के महीने में पड़ता है। मलयाली लोग विशु के रूप में नया वर्ष मनाते हैं जो अप्रैल के महीने में आता है।
सांस्कृतिक रूप से ईसाईयों के लिए 1 जनवरी नया साल इसलिए बन गया क्योंकि इस कैलेण्डर को पोप ग्रेगोरी XIII ने तैयार किया था। इसीलिए इसी ग्रेगोरियन कैलेण्डर भी कहा जाता है। लेकिन दुनिया की दूसरी सभ्यताओं के लिए अब यही सामान्य नववर्ष हो गया है। इसमें कुछ बुराई भी नहीं है। अब तो सनातन धार्मिक संस्थान भी एक जनवरी को विशेष धार्मिक आयोजन करके इसे ही नया साल मानने लगे हैं। लेकिन इसके साथ जुड़ा नशाखोरी और हुड़दंग बताता है कि यह यह भारतीय लोगों के मन मुताबिक कोई उत्सव नहीं बल्कि कैलेण्डर की मजबूरी है जो 1 जनवरी से ही शुरु होता है। जो लोग इसी कैलेण्डर को अपना मान चुके हैं वो भला इस दिन उत्सव न मनायें तो किस दिन मनाएं?
और जब कोई उत्सव आपकी संस्कृति और परिवेश से नहीं पैदा होता तो उसका कोई निश्चित अनुशासन या आनंद भी नहीं होता। अंग्रेजी नये साल पर हमें क्या करना चाहिए ये हम न जानते हैं न कभी जान पायेंगे। इसलिए नयी पीढी नशाखोरी और हुड़दंग करके थोड़ी देर के लिए अपने मन को दिलासा दे देती है कि ये नये साल का जश्न था। लेकिन जब नया साल ही आपकी सभ्यता से जुड़ा हुआ नहीं है तो इसका जश्न आपका अपना कैसे हो जाएगा?
वैसे भी यह समय संस्कृतियों का संक्रमणकाल है। तेजी से बढ़ता बाजार और उससे भी तेजी से बहती सूचनाएं सीधे हमारी समझ पर ही प्रहार कर रही है। इस प्रहार से अपनी समझ को बचाये बिना न तो नया साल समझ में आयेगा और न ही उससे जुड़ा उत्सव। हर त्यौहार को हैप्पी बताकर खुद हैप्पी होने के लिए भटकते नौजवानों में जीवन के वास्तविक मूल्यों की परख करने की क्षमता जब तक उत्पन्न नहीं होगी वह नशाखोरी और हुड़दंग में ही जीवन की खुशियां खोजता रहेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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