Gyanvapi: झूठ के तहखाने में ज्ञानवापी के सच को दबाने का प्रयास
Gyanvapi: 31 जनवरी को जिस दिन से वाराणसी जिला अदालत ने ज्ञानवापी तहखाने में व्यास परिवार को पूजा का अधिकार सौंप दिया है, उस दिन से एक समुदाय के लोगों द्वारा निरंतर झूठ और भ्रम फैलाने का प्रयास किया जा रहा है।
वाराणसी की जिला अदालत ने कुछ नया नहीं किया है। दिसंबर 1993 तक ज्ञानवापी स्थित मंदिर के तहखाने में व्यास परिवार पूजा करता आ रहा था। औरंगजेब के आदेश पर मंदिर तोड़ने से भी करीब सवा सौ साल पहले से व्यास परिवार उसी तहखाने में पूजा करता आ रहा है। जिन लोगों को इसमें कोई आश्चर्य दिखता हो वो एक बार जाकर मंदिरों की व्यवस्था को समझ लें।

मंदिर में अर्चक और पुजारियों का क्षेत्र और दिन बंटा रहता है। मंदिर के एक हिस्से या किसी खास दिन पर अगर एक अर्चक पूजा करता है तो किसी दूसरे हिस्से या दूसरे दिन दूसरा अर्चक या पुजारी पूजा करता है। मंदिर का वह क्षेत्र या वह दिन उस अर्चक के नाम रहता है। इसके लिए लिखित में कोई आदेश जारी नहीं होता। लेकिन वंशानुगत रूप से पीढी दर पीढी यह क्रम चलता रहता है। व्यास परिवार का उस तहखाने पर अधिकार भी 1551 से है।
औरंगजेब के आदेश पर 1669 में अप्रैल से जुलाई के बीच जब ज्ञानवापी मंदिर को ध्वस्त किया गया उसके बाद भी व्यास परिवार ने उसके तहखाने में पूजा के अधिकार की लड़ाई जारी रखी। उनको यह अधिकार फिर से मिला ब्रिटिश काल में, जब 1891 में बनारस में हिन्दू मुस्लिम विवाद चरम पर था। उस समय ब्रिटिश शासकों ने विवाद को शांत करने के लिए तहखाने में और पश्चिमी दीवार पर हिन्दुओं को पूजा का अधिकार दे दिया और जमीन पर मुसलमानों को नमाज पढने का। इसके बाद फिर कभी कोई विवाद नहीं हुआ।
विवाद दोबारा से पैदा हुआ दिसंबर 1993 में जब मुलायम सिंह यादव ने एकतरफा बिना किसी लिखित आदेश के व्यासजी के तहखाने को बंद करवाकर वहां रखी मूर्तियां हटवा दीं। इसके बाद से ही व्यास परिवार अदालत में अपने लिए आरक्षित तहखाने की कानूनी लड़ाई लड़ता आ रहा है, जिस पर 31 जनवरी को जिला अदालत ने मोहर लगा दी। लेकिन इसके बावजूद जवाबदेह और जिम्मेदार मुस्लिम उलेमाओं द्वारा जानबूझकर झूठ फैलाया जा रहा है कि "अदालत के आदेश पर वहां जबर्दस्ती मूर्तियां रख दी गयीं।"
स्वाभाविक है उनके इस सफेद झूठ से न केवल हिन्दू पक्ष में उन्माद पैदा होगा बल्कि मुस्लिम पक्ष में भी यह संदेश जाएगा कि उनकी मस्जिद पर हिन्दू जबर्दस्ती कब्जा कर रहे हैं। इससे दोनों समुदायों को बीच नफरत पैदा होगी जो समाज की शांति के लिए घातक होगा। ये मुस्लिम उलेमा जिसमें न केवल मस्जिद की इंतजामिया कमेटी के लोग शामिल हैं बल्कि बरेलवी ओर देओबंदी फिरके के मौलना और मुफ्ती भी शामिल हैं, जानबूझकर मनगढंत झूठ का प्रचार कर रहे हैं। कभी वो कहते हैं कि वहां कोई मंदिर था ही नहीं तो कभी कहते हैं कि औरंगजेब नै मंदिर तोड़ा था लेकिन ऐसा उसने हिन्दू महिलाओं के कहने पर किया था।
कभी वो कुतर्क करते हैं कि वहां मंदिर नहीं बल्कि बौद्ध मठ था तो कभी कहते हैं कि हिन्दू जब मुसलमान बन गये तो उन्होंने खुद ही मंदिर तोड़कर उसे मस्जिद बना दिया था। बरेलवी फिरके के बड़े मौलाना तौकीर रजा ने नया झूठ गढते हुए कहा है कि हिन्दुओं ने खुद ही मंदिर तोड़कर वहां मस्जिद बना दी क्योंकि उन लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया था। तौकीर रजा कहते हैं कि अगर मुसलमान मंदिर तोड़ते तो हिन्दू मंदिर की निशानियां क्यों छोड़ देते?
तौकीर रजा जैसे मौलाना जब ऐसे झूठ गढते हैं तो भूल जाते हैं कि एक झूठ कई सच्चे सवाल भी पैदा कर देता है। मसलन, तौकीर रजा के झूठ को ही सही मान लें तो इसका मतलब ये हुआ कि नंदी के सामने जिस शिवलिंग को वो लोग फव्वारा बता रहे थे वह शिवलिंग ही है। इसी तरह मस्जिद की पश्चिमी दीवार चीख चीखकर कह रही है कि वह मंदिर की दीवार है और इसके लिए किसी सर्वे की भी जरूरत नहीं है। फिर भी मुस्लिम उलेमाओं द्वारा न केवल एएसआई के सर्वे को गलत बताया जा रहा है बल्कि कोर्ट को भी सरकार के दबाव में काम करनेवाला कहा जा रहा है।
इसका अर्थ तो यही हुआ कि जो इन मुफ्तियों और मौलानाओं के झूठे दुष्प्रचार को सही नहीं मानता इनकी नजर में वो सब गलत हैं। देओबंदी मौलाना अब्दुल कासिम नोमानी हों या जूनागढ का मुफ्ती सलमान अजहरी। सुन्नी इस्लाम में हर फिरके का मौलाना ज्ञानवापी को लेकर सिर्फ झूठ फैला रहा है और अपनी ही कौम को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का रहा है। उसे यह मैसेज दे रहा है कि मुसलमानों के साथ बहुत अन्याय हो रहा है ताकि वो 'लड़ने' के लिए तैयार रहें।
ऐसा करते हुए मुफ्ती हों या मौलाना हर प्रकार का सफेद झूठ बोल रहे हैं। इस कौम का संकट यह है कि मुस्लिम अपने उलेमा, मुफ्ती या मौलानाओं पर आंख मूंदकर भरोसा करता है। वो जो बोलते हैं मुस्लिम समुदाय उसे कान बंदकर न सिर्फ सुनता है बल्कि बिना किसी सवाल के उसे सच मानकर स्वीकार भी कर लेता है। इसीलिए कोर्ट के आदेश के बाद शुक्रवार को ज्ञानवापी परिसर में उमड़ी भीड़ हो या मुंबई में जूनागढ के मौलाना की गिरफ्तारी के बाद उमड़ी भीड़ हो। ये समुदाय अपने मौलानाओं की ही बात को सही मानता है और मौलाना होते हैं कि नफरत और झूठ फैलाने से बाज नहीं आते।
ऐसा करने के लिए वो न सिर्फ इतिहास को झुठलाते हैं बल्कि कई दफा इस्लामिक सिद्धांतों को भी तोड़ मरोड़कर पेश करते हैं। इसीलिए मंदिर तोड़ने या मूर्तियों को नष्ट करने वाले काम को इस्लाम में तो सही बताया जाता है लेकिन सार्वजनिक रूप से मौलाना झूठ बोलते हैं कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायी ही नहीं जा सकती। अगर ऐसा है तो औरंगजेब ने गद्दी संभालते ही 1668 में यह आदेश क्यों जारी किया था कि काशी, मुल्तान और थत्ता में मंदिरों को ध्वस्त कर दिया जाए क्योंकि इन मंदिरों में ब्राह्मण "कुफ्र की तालीम" दे रहे हैं।
औरंगजेब के दरबारी इतिहासकार शाकी मुस्तइद खान ने 'मासिर-ए-आलमगीरी' में साफ लिखा है कि औरंगजेब आलमगीर ने इन तीनों ही जगहों पर खासकर काशी में मंदिर तोड़ने का आदेश दिया था। ऐसा करने के कारण ही औरंगजेब ने मुस्लिमों में आलमगीर की हैसियत पाई थी क्योंकि वो सच्चे इस्लाम को स्थापित करने के लिए काम कर रहा था जिसमें मंदिर और मूर्ति रूपी कुफ्र और शिर्क के लिए जगह नहीं थी।
औरंगजेब ने न सिर्फ ज्ञानवापी मंदिर को ध्वस्त करवा दिया था बल्कि गंगा किनारे बिन्दू माधव मंदिर को भी ध्वस्त करवाकर वहां मस्जिद बनवा दी, जो आज भी मंदिर के अवशेष पर ही खड़ी है। इसे मुसलमान धरहरा मस्जिद कहते हैं। जहां तक मंदिर के अवशेष बाकी बचे रहने का सवाल है तो इसके पीछे कारण दूसरा था। बीएचयू में इतिहास के प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि "1669 में ज्ञानवापी मंदिर तोड़ने के लिए औरंगजेब ने स्थानीय सूबेदार अबुल हसन को आदेश दिया था कि बनारस में नये मंदिर बनने न पायें और बड़े महत्व के मंदिरों को तोड़ दिया जाए।"
प्रोफेसर श्रीवास्तव आगे बताते हैं कि "सूबेदार अबुल हसन ने ज्ञानवापी स्थित आदि विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ने के लिए 50 हाथी और सैकड़ों मजदूरों को लगाया था। फिर भी वो पूरे मंदिर को तोड़ नहीं पाये। अबुल हसन को यह काम जल्दी से जल्दी करके औरंगजेब तक सूचना भेजनी थी इसलिए उसने 45 दिन में जितना मंदिर टूटा उसे तोड़कर उस पर मस्जिद का गुंबद बनवा दिया। यही कारण है कि ज्ञानवापी में जो मस्जिद बनी है वह मंदिर की दीवार और खंभों पर ही खड़ी है।"
देशभर के मुस्लिम मौलानाओं की जिम्मेवारी है कि वो अपनी कौम को इतिहास और इस्लाम की सही जानकारी दें। उनके झूठे बयानों से कोर्ट की कार्रवाई पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा और न ही ज्ञानवापी के सच को झूठ के तहखाने में बंद किया जा सकेगा। ऐसा करके वो सिर्फ मुस्लिमों को ही गुमराह करेंगे और और हिन्दू मुस्लिम के बीच नफरत फैलाऐंगे। वो अगर अमन चैन की बात करते हैं तो क्या वह अमन चैन झूठ की बुनियाद पर आयेगा या सच्चाई के सामने आने पर, इस पर जिम्मेदार मौलानाओं को स्वयं विचार करना चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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