Ghulam Nabi Azad: कांग्रेस के वफादार 'गुलाम' की 'आजाद' कहानियां
कांग्रेसी अंत:पुर की कहानियों से भरी गुलाम नबी आजाद की आत्मकथा "आजाद" का 5 अप्रैल को लोकार्पण हो गया। इसको लेकर कांग्रेस में लहरें उठनी स्वाभाविक हैं। वे कितना बड़ा ज्वार बन पाती हैं, यह देखना बाकी है।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि राजनीति की दुनिया के दो चेहरे होते हैं। पहला चेहरा ऑन द रिकॉर्ड यानी सामने होता है, जिसका हर तथ्य, हर एक कथन और कदम पोलिटिकली करेक्ट होता है। यह बिडंबना ही कही जाएगी कि राजनीति का यह ऑन द रिकॉर्ड चेहरा अधिकतर सत्य से दूर होता है। राजनीति का दूसरा चेहरा ऑफ द रिकॉर्ड होता है। जिसमें दांवपेच होते हैं, पर्दे के पीछे की सच्चाइयां होती हैं और अधिकतर यही तथ्यात्मक और असल होते हैं।
राजतंत्र में ऐसी कहानियों को अंत:पुर की कहानियां के तौर पर जाना-पहचाना जाता था। भारतीय लोकतांत्रिक समाज में देश और दुनिया की दिशा बदलने और प्रभावित करने वाली अंत:पुर की कहानियां अतीत में राजनीति के प्रभावी चरित्रों के साथ ही या तो पंचतत्व में विलीन हो जाती थीं या कब्र में समा जाती थीं। अगर वह सच कहीं जिंदा रह पाता था तो इतिहास रचने और राजनीति की गाथा लिखने वाली हस्तियों के इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों तक ही सीमित रह पाता था। लेकिन अब भारतीय लोकतांत्रिक अंत:पुर के शांत दिखते तालाब में पत्थर उछलने लगे हैं।
कांग्रेस के हालिया इतिहास में गुलाम नबी आजाद की आत्मकथा 'आजाद' का प्रकाशित होना ऐसी दूसरी घटना है, जिसने कांग्रेस की अंदरूनी कहानियों को जनता के सामने लाने की कोशिश की है। इसके पहले कांग्रेस के अंदरूनी इतिहास की दुनिया में झांकते हुए उसके अंदरूनी दांवपेचों पर प्रणब मुखर्जी की आत्मकथ्यात्मक पुस्तक 'द कोलिशन इयर्स' प्रकाश डाल चुकी है।
कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे गुलाम नबी आजाद को कांग्रेस छोड़े अभी साल भी नहीं बीता है। उन्होंने 26 अगस्त 2022 को कांग्रेस छोड़ दी। इसके बाद चार सितंबर को उन्होंने पहले डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी बनाई और बीते दिसंबर में उसका नाम बदलकर डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी कर ली। पचपन साल तक कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहे आजाद की आत्मकथा से जाहिर होने वाले अंदरूनी तथ्यों से राजनीतिक रूप से हिचकोले खा रही कांग्रेस को झटका लगना स्वाभाविक है।
आजाद कांग्रेस के गांधी-नेहरू परिवार के करीबी माने जाते रहे हैं। लेकिन अपनी आत्मकथा में उन्होंने एक ऐसे तथ्य की ओर इशारा किया है, जो सीधे-सीधे गांधी-नेहरू परिवार से जुड़ा है। कांग्रेस के इतिहास में 1963 में आयी कामराज योजना को मील का पत्थर और संगठन को मजबूत करने वाला माना जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि संगठन को मजबूत करने के नाम पर कांग्रेस ने अपने तमाम कद्दावर मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय कैबिनेट के ताकतवर मंत्रियों का इस्तीफा ले लिया था। आजाद लिखते हैं कि इस फैसले के बाद खुद कामराज को भी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
लेकिन उसके बाद क्या हुआ? आजाद लिखते हैं कि इसी घटना के बाद तमिलनाडु में भारत की पहली क्षेत्रीय पार्टी का गठन सीके अन्नादुरै की अगुआई में हुआ। 1967 के चुनावों में तमिलनाडु की सत्ता से कांग्रेस जो बाहर हुई तो फिर कभी वहां की सत्ता में नहीं लौट पाई। गुलाम नबी आजाद लिखते हैं कि "कामराज प्लान के बाद उड़ीसा में बीजू पटनायक, पंजाब से प्रताप सिंह कैरो, महाराष्ट्र से एसके पाटिल, जम्मू-कश्मीर से बख्शी गुलाम मोहम्मद को अलग होना पड़ा और इन राज्यों में कांग्रेस कमजोर होना शुरू हुई।"
गुलाम नबी आजाद लिखते हैं कि इस योजना के बाद कांग्रेस के ताकतवर और कद्दावर लोग सत्ता से दूर हुए। इसके बाद ही कांग्रेस में आलाकमान संस्कृति का बोलबाला बढ़ा। फिर मुख्यमंत्री भी मनोनीत होने लगे। जबकि अव्वल तो उन्हें विधायकों द्वारा चुना जाना चाहिए था। जाहिर है कि अगर चुनाव होता तो जो कद्दावर होता, वही चुना जाता। इसके बाद कांग्रेस में चाटुकार संस्कृति पनपी। गुलाम नबी लिखते हैं कि "एक बार कांग्रेस के एक कद्दावर नेता और राष्ट्रपति रह चुके व्यक्ति से कामराज प्लान की वजह पूछी तो उन्होंने जो बताया था, उसे वे अपनी आखिरी सांस तक जाहिर नहीं करेंगे।"
लेकिन गुलाम नबी आजाद उस व्यक्ति का संकेत दे चुके हैं। कांग्रेस में 1967 से ही प्रणब मुखर्जी इंदिरा और उनके परिवार के नजदीक रहे। वे पढ़े-लिखे व्यक्ति माने जाते रहे। 2010 में अपनी सवा सौंवीं वर्षगांठ पर कांग्रेस ने दो खंडों में अपना इतिहास प्रकाशित किया था। उसके संपादक प्रणब मुखर्जी थे। जबकि उसकी सह संपादक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी थीं। माना जा सकता है कि कामराज प्लान की वजह के बारे में आजाद को जानकारी देने वाले प्रणब मुखर्जी ही रहे होंगे। रही बात उस तथ्य को छुपाने की, जिसे आजाद जाहिर नहीं कर रहे, वह भी स्फटिक की तरह साफ है।
कामराज प्लान के ठीक चार साल पहले महज 42 साल की उम्र में इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनीं थीं। उस समय कांग्रेस दिग्गज नेताओं से भरी हुई थी। तब उनके अध्यक्ष चुने जाने पर कांग्रेस के अंदर सवाल उठ रहे थे। इसी बीच 1963 में चार लोकसभा सीटों जौनपुर, फर्रूखाबाद, अमरोहा और राजकोट पर उपचुनाव हुए। इसी चुनाव में डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत दिया और कांग्रेस विरोधी दलों को साथ लाए थे। इस चुनाव में जौनपुर से जनसंघ महासचिव दीनदयाल उपाध्याय को हार का मुंह देखना पड़ा, अलबत्ता फर्रूखाबाद से डॉ. लोहिया और अमरोहा से आचार्य जेबी कृपलानी एवं राजकोट से पीलू मोदी की जीत हुई।
इसके बाद माना गया कि नेहरू का करिश्मा खत्म हो रहा है और कांग्रेस कमजोर हो रही है। उसे बचाने के लिए कामराज प्लान आया। लेकिन उसकी असल वजह यह थी कि इसी बहाने कांग्रेस के दिग्गजों को सत्ता से बाहर कर दिया जाए। धीरे-धीरे वे अपनी चमक खो देंगे और इंदिरा गांधी स्थापित हो जाएंगी।
अपनी किताब में गुलाम नबी आजाद ने असम के नेता हेमंत विश्वशर्मा का जिक्र करते हुए कहा है कि "उनके कांग्रेस छोड़ने से हुए नुकसान को लेकर भी राहुल गांधी को आगाह किया था। लेकिन राहुल गांधी ने उनकी नहीं सुनी थी।" आज स्थिति यह है कि कांग्रेस का उत्तर पूर्व से सफाया हो चुका है।
गुलाम नबी आजाद ने अपनी किताब में यह भी लिखा है कि कांग्रेस में इन दिनों चाटुकारिता अपने चरम पर है। उन्होंने लिखा है कि अब कांग्रेस अध्यक्ष से बिना अप्वाइंटमेंट लिए मिलना संभव नहीं है। अगर कोई बिना अप्वाइंटमेंट मिलना चाहे तो उसे मौका नहीं मिल सकता। चाटुकार लोग आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि खुद गुलाम नबी आजाद पर अतीत में ऐसा ही आरोप लगता रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस का आलाकमान इन दिनों हमलावर है। उसकी वजह से पूरी कांग्रेस के निशाने पर मोदी हैं। मोदी पर कांग्रेस की ओर से आरोप लगता है कि वे बदला लेने वाले राजनेता हैं। लेकिन आजाद ने लिखा है कि "उन्होंने कई मौके पर राजनीतिक रूप से मोदी का विरोध किया है, लेकिन मोदी ने बदले की भावना से कभी कोई कदम नहीं उठाया।" जाहिर है कि आजाद के इस कथन से कांग्रेस में बवाल होना स्वाभाविक है।
गुलाम नबी आजाद ने जब कांग्रेस छोड़ी तो उन पर कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया कि आजाद ने कांग्रेस और उसके कई नेताओं को सीढ़ी बनाया और शिखर पर जाने के बाद सीढ़ियों को छोड़ दिया। आजाद ने अपनी किताब में इसका जवाब देते हुए लिखा है कि कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि हमारे कंधे को सीढ़ी बनाकर शिखर पर पहुंचे। आजाद लिखते हैं कि वे खुद सीढ़ी बने। किसी और को सीढ़ी बनाकर खुद आगे नहीं बढ़े।
आजाद ने अपनी किताब में कई दावे किए हैं। उनका एक दावा यह है कि संजय गांधी की विमान हादसे में मौत के चालीस दिन भी नहीं बीते कि उनकी पत्नी मेनका वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रमों में शामिल होने लगीं। इससे इंदिरा गांधी चौंक उठीं। आजाद का दावा है कि उन्होंने ही राजीव को राजनीति में लाने के लिए इंदिरा जी को सुझाव दिया था। उन्होंने उस घटना का भी जिक्र किया है, जब युवा कांग्रेस की एक सभा में उन्होंने अपने भाषण में राजीव से राजनीति में आने की अपील की। तब मंच पर इंदिरा गांधी भी बैठी थीं। आजाद के मुताबिक, तब इंदिरा गांधी बहुत खुश हुई थीं।
इंदिरा, राजीव, नरसिंह राव और मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के महत्वपूर्ण सदस्य, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और राज्यसभा में कांग्रेस की ओर से नेता प्रतिपक्ष रहे आजाद अपने नाम के अनुरूप कांग्रेसी हलके में पार्टी छोड़ने से पहले कभी आजाद नहीं माने गए। वो कांग्रेस के एक समर्पित सिपाही थे। पार्टी और गांधी परिवार के 'वफादार गुलाम'। लेकिन जिस तरह के तथ्यों को उन्होंने अपनी आत्मकथा में उजागर किया है, आत्मकथा अपने नाम आजाद को सही मायने में सार्थक सिद्ध करती नजर आ रही है।












Click it and Unblock the Notifications