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Film Star Neta: वो फिल्मी सितारे जिन्हें न दिल्ली रास आयी न राजनीति

Film Star Neta: दिल्ली नेताओं का गढ़ है और मुंबई फिल्मी सितारों का। दोनों के बीच ऐसा ताना-बाना रहा है कि एक दूसरे के बिना चलते भी नहीं और एक दूसरे से पूरी तरह निभती नहीं। ऐसे में कभी राजनीति के दिग्गज फिल्मी सितारों को राजनीति में खींच लाते हैं तो कभी फिल्मी दिग्गज मुसीबत में नेताओं के दर पर चक्कर लगाते हैं।

समझदार फिल्मी सितारे कभी सरकारी ब्रांड अम्बेसेडर बनकर, पीएम आदि के साथ फोटो खिंचाकर या ज्यादा डिमांड आई तो रैलियों में प्रचार कर निकल जाते हैं, लेकिन जो ज्यादा अंदर गए वो अंत में निराश ही हुए, उन्हें दिल्ली रास नहीं आई।

Film Star Neta

अमिताभ बच्चन की जिंदगी में उनकी मां तेजी बच्चन का रोल काफी ज्यादा रहा। यहां तक कि बच्चन परिवार में वो पहली एक्ट्रेस थीं, जो बाकायदा नेहरू परिवार के सहयोग से नाटक आयोजित किया करती थीं। उससे भी ज्यादा दिलचस्प यह है कि अमिताभ को दिल्ली में उन्होंने ही बॉलरूम डांसिंग तक सिखाई थी। चाहे हरिवंश राय बच्चन को नेहरूजी के विदेश मंत्रालय के हिंदी विभाग में नौकरी दिलाकर परिवार को इलाहाबाद से दिल्ली लाना हो, इंदिरा गांधी से कहकर दिल्ली में सरकारी बंगला अलॉट करवाना हो या फिर शास्त्री जी से बतौर फ्रीलांस पत्रकार साउथ दिल्ली में 'सोपान' बंगले की जमीन आवंटित करवाना हो, सब में तेजी बच्चन की अहम भूमिका रही।

लेकिन अमिताभ को राजनीति में लाए जाने से पहले ही उनके परिवार को राजनीति में घसीटा जाने लगा था। नेहरू परिवार ने उनके पिता को राज्यसभा भेजा और पदमभूषण भी दिया। लेकिन मौका आते ही उसकी कीमत भी वसूल कर ली। इमरजेंसी में जहां पूरा देश गांधी परिवार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ तो कांग्रेस द्वारा उन सभी लोगों को आगे किया गया, जिनकी जनता सुनती थी। उनमें हरिवंश राय बच्चन के अलावा फिल्मी दुनिया के सुनील दत्त-नरगिस भी शामिल थे।

''हमने ये माना कि लिखने की आजादी नहीं, जब थी आजादी तभी क्या तीर मारे आपने?'' आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन ये लाइनें इमरजेंसी के समर्थन में कभी हरिवंश राय बच्चन ने अपने एक मित्र को लिखी थीं, जिसका बाकायदा जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा 'दशद्वार से सोपान तक' में किया है।

हरिवंश राय बच्चन ने ये माना था कि उनको इंदिरा गांधी को उस दौर में समर्थन नहीं देना चाहिए था, लेकिन उन पर निजी रिश्तों का जो दवाब था, उसकी भी चर्चा उन्होंने की। ये भी माना कि दोनों बच्चन बाप-बेटे को उसके परिणाम भी भुगतने पड़े। बाद में अमिताभ बच्चन पर भी फिल्म मैगजींस के सम्पादकों ने बैन लगा दिया था और करीब 15 साल तक ना अमिताभ का इंटरव्यू लिया और ना उनकी फोटो छापी। बावजूद इसके इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी ने उनको मजबूर किया कि वो राजनीति में आएं।

दोस्त की मदद के लिए वो मैदान में उतरे भी, लेकिन बाद में एक विदेशी रेडियो ने बोफोर्स घोटाले में उनके भाई का नाम लिया तो नेहरू गांधी परिवार ने भी उनका साथ नहीं दिया। 6 साल तक वो विदेशों के चक्कर लगाते रहे, तब जाकर उस जंजाल से निकले। लेकिन इसके चलते ना केवल उन्होंने राजनीति को तिलांजलि दे दी बल्कि गांधी परिवार से भी रिश्ते बिगड़ गए।

अमिताभ बच्चन से गांधी परिवार के रिश्ते बिग़ड़े, तो जवाब में उतारे गए थे राजेश खन्ना उर्फ काका। राजीव और काका, दोनों ही अमिताभ से खफा थे। काका को चाहिए थी ठाणे सीट, लेकिन राजीव गांधी ने उन्हें नई दिल्ली सीट पर आडवाणी के सामने उतार दिया। वो 1589 वोट से हार गए, लेकिन अगले ही साल 1992 में शत्रुघ्न सिन्हा को हराकर सांसद बन गए। 1996 में फिर जगमोहन ने उन्हें हरा दिया। तीन चुनाव लड़ चुके काका, अब राज्यसभा मांगने लगे लेकिन कांग्रेस ने मौका ही नहीं दिया। राजीव गांधी की मौत पर उनकी पहली प्रतिक्रिया सच ही साबित हुई, 'मेरा भगवान चला गया'।

काका को सरकारी घर मिला 1992 में जीत के बाद। सांसद बनते ही काका ने 81, लोधी एस्टेट बंगला 'कब्जा' लिया। 25 सितम्बर 1992 को पायनियर ने एक फ्रंट पेज स्टोरी की थी कि कैसे राजेश खन्ना के निजी सचिव दिनेश सिंह ने लोधी एस्टेट के इस बंगले पर अनाधिकारिक रूप से कब्जा कर लिया था।

बाद में इस खबर को मेनका गांधी की 'सूर्या' मैगजीन और ऑर्गनाइजर' अखबार ने भी जमकर उछाला। लेकिन राजेश खन्ना की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। दरअसल पहली बार सांसद बनने के बाद राजेश खन्ना को इतना बड़ा बंगला आवंटित नहीं होना था। लेकिन जगमोहन से हार के बाद राजेश खन्ना सर्वप्रिय विहार के 6/14 नंबर के अपार्टमेंट में किराए पर रहने लगे थे। कई साल वो राज्यसभा के टिकट की आस लिए दिल्ली आते और वहीं रहते। उनकी बालकनी से एक पार्क दिखता था। उनको राज्यसभा सीट तो नहीं मिली लेकिन उनकी मौत के बाद 2012 में उस पार्क का नाम जरूर राजेश खन्ना पार्क करने का ऐलान कर दिया था।

बच्चन परिवार की तरह कभी कपूर परिवार को भी दिल्ली लेकर आए थे नेहरूजी। दिलचस्प बात ये है कि पंडित नेहरू के दादा गंगाधर नेहरू जहां दिल्ली के कोतवाल थे, वहीं पृथ्वीराज कपूर के पिता बशेश्वरनाथ पेशावर में पुलिस ऑफिसर थे। हालांकि दिल्ली से प़ृथ्वीराज कपूर का पुराना नाता था। वो अक्सर कनॉट प्लेस में सोभा सिंह परिवार के रीगल व रिवोली थिएटर्स में अपने नाटकों का मंचन करने आते थे। राशिद किदवई की किताब 'नेता अभिनेता' में जिक्र है कि कैसे कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए आयोजित पृथ्वीराज के एक प्ले 'दीवार' के चलते उनकी निकटता नेहरू से बढ़ गई थी।

जब 1952 में कई जाने माने चेहरों के साथ साथ पृथ्वीराज कपूर भी पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए। बिना चुनाव के राज्यसभा के लिए नॉमीनेशन मिला तो आलोचना भी हुई तो उन्हें सफाई भी देनी पड़ गई थी। 8 साल तक राज्यसभा में रहने के बावजूद उनको दिल्ली रास नहीं आई। नेहरू ने भी उनके बेटे राज कपूर को ज्यादा तवज्जो देनी शुरू कर दी। राज की फिल्मों में रूस का निवेश हुआ, लेकिन राज साहब को राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

हां, एक बार नेहरू जी राजकपूर के कहने पर उनकी फिल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' में अपना ही रोल करने के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन उनके सलाहकारों ने पीएम को फिल्म में काम करना ठीक नहीं कहकर, मना करवा दिया। उसके बाद बच्चन परिवार, सुनील दत्त-नरगिस, दिलीप कुमार आदि नेहरु परिवार के करीबी होते चले गए। राज कपूर के तीनों बेटे भी राजनीति से दूर ही रहे। लेकिन ऋषि कपूर ने दशकों की भड़ास नेहरू-गांधी परिवार पर जरूर कुछ साल तक निकाली। वो सवाल उठाते रहे कि क्यों सारे एयरपोर्ट्स, स्टेडियम्स, गलियों, बाजारों, कॉलेज, पुल आदि के नाम गांधी-नेहरू परिवार के नाम रखे जाते हैं, कभी राज कपूर जैसे दिग्गजों के नाम क्यों नहीं?

सुनील दत्त जो हमेशा कांग्रेस के सिपाही की तरह खड़े रहे, सद्भावना यात्राएं निकालते रहे, उनके लिए चैरिटी शोज करते रहे, इमरजेंसी के समय कांग्रेस ने उनका भी इस्तेमाल किया। इमरजेंसी लगने के बाद जर्मनी से सुनील दत्त का संदेश छपा कि, "आपने बेहतर फैसला लिया है, यहां रहने वाले भारतीय ही नहीं जर्मनी की जनता भी इस फैसले के समर्थन में है'। लोग मानते हैं कि उनसे लिखवाया गया होगा। बाद में संजय दत्त के केस को लेकर जिस तरह से कांग्रेस ने उनसे किनारा किया, उनको बाल ठाकरे की शरण में जाना पड़ा, वो भी दुनियां ने देखा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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