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Festivals under attack: तमाम चुनौतियों के बीच दीपावली के देशीपन को बचाकर रखने की चुनौती

दीपावली सिर्फ एक त्योहार नहीं है, यह भारत में सवा लाख करोड़ का बाजार भी है जिस पर देशी-विदेशी कंपनियों की नजर बनी रहती है। इसमें जहां बाजार की प्रतिस्पर्धा एक तरफ दिखाई देती है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय त्यौहारों के इंतजार में कुछ कालनेमि और एजेंडाबाज भी घात लगाकर बैठे रहते हैं।

Deepawali

शिवरात्रि पर उन्हें गरीब बच्चों के दूध की फिक्र होने लगती है, होली पर वे पानी बचाने के अभियान पर निकल पड़ते हैं और दीपावली आते ही पर्यावरण के नाम पर शोर प्रारंभ हो जाता है। आम भारतीय उपभोक्ता के सामने जहां एक तरफ बाजार की प्रतिस्पर्धा के सामने अपने उत्सव के देशीपन को बचाकर रखने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें एजेंडाबाजों का भी मुकाबला करना है।

बाजार की चुनौती

दीपावली के सवा लाख करोड़ के बाजार में ई कॉमर्स के माध्यम से होने वाली खरीददारी में 20 फीसदी हिस्सा फैशन उद्योग का है। इस मौसम में बदलते मौसम और फैशन के हिसाब से लोग खूब खरीददारी करते हैं।

जमे जमाए बजार में अपने लिए जगह बनाना किसी के लिए आसान नहीं होता, जैसे ई कॉमर्स वेबसाइट ने बना लिया। वह बाजार से थोड़ी कम कीमत पर आपको सामान उपलब्ध कराते हैं लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि हमारी सोसायटी, मोहल्ले या नुक्कड़ पर जो छोटी दुकानें हैं, उनके घर भी दीपावली होनी है। हमें वहां भी खरीददारी करनी चाहिए।

हलवाई की मिठाई को चॉकलेट की चुनौती

दीपावली का मौसम आते ही अचानक सिंथेटिक दूध और मिलावटी मावे की खबर आने लगती है। दूसरी तरफ चॉकलेट को इन्हीं माध्यमों से बढ़ावा मिल रहा होता है। विज्ञापन में समझाया जाता है कि इस त्योहार में हम अपने रिश्तेदारों को मिठाई के डिब्बे की जगह चॉकलेट का पैकेट उपहार में दें। मिलावटी मिठाई की खबरों से डरे हुए मन को चॉकलेट में एक समाधान दिखाई देता है। शुद्धता की गारंटी और एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी आसान।

लेकिन चॉकलेट के विज्ञापन में जो बताया जा रहा है क्या वह पूरा सच है? चॉकलेट की प्रशंसा करते हुए विज्ञापन नहीं बताता कि लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उसमें अधिक मात्रा में प्रिजरवेटिव्स मिलाया जाता है। उसके अंदर हानिकारक बैक्टीरिया, एंटीऑक्सीडेंट्स, डाएट्री मिनरल्स, फैटी एसिड और थियोफाइलिइन होता है। इन सबकी वजह से अनिन्द्रा, सिर दर्द, जी मिचलाने जैसी समस्या सामने आती है।

चॉकलेट के अंदर कैफीन होता है, जो ब्लड प्रेशर को बढ़ाता है, इसलिए हाई ब्लड प्रेशर के मरीज को चॉकलेट से परहेज करना चाहिए। चॉकलेट में कोकोआ होेता है, जो चॉकलेट के अधिक सेवन से हमारे शरीर के अंदर मौजूद कैल्शियम को धीरे धीरे पेशाब के रास्ते से बाहर निकालता है, जिससे हड्डी कमजोर हो सकती है। इसलिए अपने पड़ोस के दुकान की मिठाई छोड़कर यदि आप उपहार के लिए चॉकलेट के बारे में सोच रहे हैं तो ठहरकर अपने निर्णय पर पुनर्विचार अवश्य कीजिए।

हिन्दू त्योहारों के कालनेमि

यह कोई एक साल की बात नहीं है। ना ही यह एक हिन्दू त्योहार से जुड़ा हुआ मामला है। ऐसा लगता है कि विचारधारा विशेष के लेखक समुदाय ने कोई हिन्दू त्यौहारों का कैलेन्डर बनाकर रखा है। जैसे ही त्यौहार की तारीख नजदीक आती है, उसकी आलोचना या परंपरा पर हमला करता हुआ कोई लेख या वीडियो वायरल हो ही जाता है। कुछ नहीं मिला तो 'त्योहारों पर घर की सफ़ाई कैसे बढ़ाती है, महिलाओं की मुसीबत' ही लिख दिया।

दीपावली, लक्ष्मी पूजा, भैया दूज, धनतेरस, गोवर्धन पूजा वाला यह हिन्दूओं का फेस्टिवल वीक है। इस पूरे सप्ताह हिन्दू समाज उत्सव के मनोभाव में होता है। दूसरी तरफ विचारधारा विशेष की तरफ से इन त्यौहारों के बहाने हमारी परंपराओं पर प्रत्येक साल हमले किए जाते हैं। ऐसे हमलों की आम तौर पर हिन्दू समाज उपेक्षा ही करता रहा है। सोशल मीडिया आने के बाद अब एक छोटा सा समूह अपने स्तर पर जवाब भी दे रहा है।

यहां समझने वाली बात यह है कि भारतीय त्यौहार और परंपरा पर जो हमले हो रहे हैं, उसकी लंबी योजना बनती है और वह सामूहिक प्रयास का नतीजा होता है। इसलिए वह कन्टेन्ट जैसे जारी किया जाता है, सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है और उसका जवाब लिखने वालों को ट्रोल बता दिया जाता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि त्यौहारों और परंपराओं पर किए जा रहे हमलों का तर्कसंगत तरीके से जवाब दिया जाए। यह जवाब तर्कसंगत और तथ्यपूर्ण हो।

दीपावली आते ही जाग जाते हैं पर्यावरण प्रेमी

हम सभी जानते हैं कि पटाखों का प्रभाव पर्यावरण पर अच्छा नहीं पड़ता। जानते तो हम यह भी हैं कि सड़क पर चल रही गाड़ियों से निकलने वाला प्रदूषण हमारे वातावण को जहरीला बना रहा है। दिल्ली में कई बार जहर इतना बढ़ जाता है कि लोगों को घर से बाहर ना निकलने की हिदायत तक देनी पड़ती है। सरकार को कहना पड़ता है कि यदि बहुत आवश्यक काम ना हो तो घर में ही रहें।

कायदे से तो सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। कारखानों के प्रदूषण को सीमित करने के लिए दिशा निर्देश दिया जाना चाहिए। शहर में अधिक से अधिक वृक्षारोपण हो इस दिशा में काम करना चाहिए। इन सभी उपायों पर विचार किए बिना हर साल पर्यावरण को बचाने का अभियान सिर्फ दीपावली के समय चलाया जाता है। पटाखों का तो एक दिन है। इस पर इतनी हाय तौबा क्यों? क्या एक दिन पटाखे ना जलाने से पूरे साल का पर्यावरण संकट हल हो जाएगा?

कुछ सुखद परिवर्तन भी उल्लेखनीय हैं

वैसे इस बीच कुछ सुखद परिवर्तन भी दिखाई दे रहे हैं। एक परिवर्तन मिट्टी के दीयों से जुड़ा है। पिछले कुछ सालों से सोशल और मुख्य धारा की मीडिया पर दीये के पक्ष में चले अभियान का लाभ जमीन पर दिखने लगा है। अब लोग मिट्टी के दीये खरीदने लगे हैं। हमारी दीपावली, मिट्टी के दीयों से ही दीपावली बनती है। एक सीमित वर्ग में ही सही अब दीयों के प्रति जागरुकता बढ रही है।

बीते कुछ सालों में दीपावली से जुड़े कई अच्छे विज्ञापन भी बने हैं। जैसे इस साल एक सीमेन्ट कंपनी ने अपने विज्ञापन 'अंदर से सुंदर' में एक सुंदर संदेश दिया है कि जो लोग आपकी दीपावली को जगमग बना रहे हैं, आप भी उनकी दीपावली सुंदर बनाने में सहयोग कीजिए। इसी तरह एचपी कंपनी का वह विज्ञापन भी चर्चा में है जिसमें एक बच्चा एक बूढी औरत के मिट्टी के दीयों को बेचने में मदद करता है। वास्तव में यही दीपावली का संदेश है कि सबकी दीपावली हो जगमग। हमारे घर, गली, मोहल्ले, सोसायटी का हर एक कोना रोशन हो जगमग।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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