New Cooperative Policy: सहकारी नीति को संजीवनी मिले तो ग्रामीण क्षेत्र का तेज विकास संभव
नई सहकारी नीति अपनाने हेतु केन्द्र सरकार ने सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक समिति की घोषणा की है जिसके 47 सदस्य होंगे। इस समिति के सुझावों पर आधारित नई सहकारी नीति कमजोर हो चुके सहकारी क्षेत्र को पुनर्जीवन प्रदान करेगी।

वैसे सहकारी क्षेत्र भारत के लिए नया नहीं है। सहकारी नीति में भी एक तरह की निरंतरता रही है, क्योंकि यह क्षेत्र स्वतंत्रता के 50 वर्ष पहले से अस्तित्व में है। स्वतंत्रता पूर्व यह क्षेत्र मर्यादित क्षेत्र में और कम सदस्य संख्या के साथ काम करता था। निश्चित तौर पर स्वतंत्रता के बाद सहकारी क्षेत्र को महत्व दिया गया और जिम्मेवारी के साथ इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की गई।
आज लगभग सभी क्षेत्र में सहकारी व्यवस्था काम कर रही है और बहुत ज्यादा संख्या में सदस्य भी इससे जुड़े हुए हैं। लेकिन जब से भारत ने भूमंडलीकरण के साथ निगमीकरण और निजीकरण को अपनाया है, सहकारी क्षेत्र पीछे छूटता जा रहा है। ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के साथ नई सहकारी नीति हेतु सुझाव देने के लिए एक समिति का गठन करना अपने आप में महत्व रखता है। यह समिति आने वाले बजट के पहले अगर कुछ सुझाव देती है तो बजट में इसके बारे में कुछ सुनने को मिल सकता है।
सहकारिता क्षेत्र
आज सहकारी क्षेत्र काफी फैला हुआ है और आर्थिक और सामाजिक सभी क्षेत्रों में विस्तारित रूप में कार्यरत है। 'बिना सहकार नहीं उद्धार' समझ के अनुसार एक दूसरे के सहकार से अपनी और अपने सहयोगियों की प्रगति के लिए काम करने वाले जब एकत्रित होते है तो सहकारी संस्था स्थापित होती है। सभी सहकारी संस्थाओं को कानूनी होना जरूरी नहीं इसलिए इसका स्वरूप ऐच्छिक या कानूनी हो सकता है।
भारतीय कानून व्यवस्था सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को अपना काम करने की सहूलियत देती है और सहकारिता कानून तथा न्यास कानून के तहत काम करने की अनुमति देती है। अब तो इस क्षेत्र को 'कंपनी कानून' में भी लाया गया है। इसलिए इसके कई रूप देखने को मिलते हैं। हाउसिंग सोसायटी से लेकर धर्माथ ट्रस्ट, सहकारी बैंकों तथा एनजीओ और बचत समूह (एसएचजी) से लेकर एफ़पीओ (किसानों की कंपनी) तक संस्थाएं 'सहकारिता' के आधार पर काम करती नजर आती है। सहकारी नीति की दृष्टि से देखा जाए तो नागरी सहकारी बैंक, बुनकर सहकारी संस्थाएं, मत्स्य क्षेत्र, दूध व्यवसाय, कृषि बाजार तथा कृषि ऋण व्यवस्था में काम करने वाली सहकारी संस्थाएं महत्वपूर्ण कही जा सकती है। समिति की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्व की होगी।
सहकारिता का इतिहास
सहकारी क्षेत्र और सरकार का नाता पुराना है। ब्रिटीश अधिकारियों ने इस क्षेत्र का विनियमन करने की शुरुआत की थी और 1904 का कानून एक मील का पत्थर कहा जा सकता है। वैसे किसान तब भी कर्ज में डूबा हुआ था और कर्जे देनेवाले सारे साहूकार थे। उन पर कोई नियंत्रण भी नहीं था। अपनी मर्जी से ब्याज लेते और अपनी शर्तों पर वे कर्जे देते थे। किसान को ऐसे कर्जे से मुक्ति दिलाना और नैसर्गिक आपत्तियों से हुई फसल हानि में किसान को मददगार हो ऐसी व्यवस्था करना जरूरी हो गया था। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने 1871 और 1884 में दो कानून अमल में लाये जिससे किसान अपनी कृषि जमीन ऋण लेकर सुधार सके और सरकार भी किसान को प्रत्यक्ष कर्जे दे सके। इसी के चलते सहकारी संस्था का विकास भी हुआ और उपयोग भी बढ़ा।
स्वतंत्रता के बाद सहकारी क्षेत्र में सरकार का योगदान बढ़ा
निश्चित तौर पर स्वतंत्रता के बाद सरकार ने कृषि ऋण, कृषि बाजार, बुनकर, ग्रामीण हस्तकला एवं संबंधित कारीगरी, दूध और चीनी उद्योग जैसे क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं के विकास का प्रयत्न किया। रिजर्व बैंक की ग्रामीण ऋण सर्वे समिति (1954) ने मुख्य तौर पर सहकार क्षेत्र विकास के सारे रास्ते खोल दिये और सरकार की भागीदारी से इस क्षेत्र के विकास की बात कही।
सरकार की भागीदारी की यह नीति आगे चलकर बहुत उपयोगी रही। सरकार की भागीदारी पूंजी तथा अन्य आर्थिक सहायता में मुख्य रूप से रही। इसमें संस्थाओं का विनियमन और कार्यक्षम व्यवहार तथा संस्थाओं के विकास के उपयुक्त संस्थाओं का निर्माण करना शामिल था। इसी का नतीजा था कि कृषि बाजार समितियां, चीनी सहकार उद्योग, दूध सहकार संस्थाएं, बुनकर सहकारी संस्थाएं, मत्स्य सहकारी समितियां खड़ी हुई और सफल भी रही। रिज़र्व बैंक ने भी सहकारी संस्थाओं को वित्त सहायता सरल कर और पुनर्वित्त की व्यवस्था कर अपनी जिम्मेवारी निभाई।
वैश्वीकरण के दौर में सहकारिता कमजोर हुआ
भारत की आर्थिक नीतियों के दो दौर कहे जा सकते हैं। एक स्वतंत्रता के बाद के 30-40 साल और 1990 दशक के बाद के 30 साल। पहले दौर में सरकार सब कुछ खुद करना चाहती थी और इसलिए समाजवादी रचना के नाम पर सब कुछ सरकार कर रही थी, चाहे सड़कें बनाना हो या रेल/बस चलाना हो। चाहे होटल व्यवसाय करना हो या खाद बनानी हो। सब कुछ सरकार ने अपने हाथ में लिया हुआ था।
1990 के दौर में सरकार ने एकदम अपनी चाल बदल दी और सब कुछ निजी हाथों में सौंपने की बात कही और वैसी ही नीतियाँ अपनाई। पहले दौर में जो भी सहकारी क्षेत्र विकसित हुआ था वह दूसरे दौर में कमजोर होता गया। इतना ही नहीं इस दौरान सहकारिता को भी 'कंपनी कानून' में लाने की कोशिश कर निजीकरण का रास्ता ढूँढना शुरू हुआ। ऐसे वातावरण में केन्द्र सरकार द्वारा 'सहकारिता मंत्रालय' बनाकर नई नीति बनाने का प्रयत्न करना थोड़ा अजीब लगता है।
नई सहकारिता नीति के पहलू
सहकारी क्षेत्र के अनेक प्रश्न है लेकिन सबसे बड़ी समस्या है राजनेताओं का इस क्षेत्र पर कब्जा तथा उनकी दखलअंदाजी, जिसका परिणाम है इन संस्थाओं के कामकाज में आयी राजनीति और अकुशलता। इसके साथ ही अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्र की तुलना में कानून, व्यवहार करने के नियम, सरकारी योजना के लाभ तथा 'कर' जैसी व्यवस्था में इस क्षेत्र को मिलने वाली अलग ट्रीटमेंट भी एक बड़ी समस्या है। नई नीति हेतु समिति क्या सुझाव देती है, यह ध्यान देने की बात होगी।
यह जरूरी है कि समिति सहकारिता क्षेत्र को ग्रामीण विकास के लिए उपयोगी माने और सबसे पहले इस क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने की बात सोचे। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि सहकारिता क्षेत्र को अपने व्यवहार में सभी नियमन और कानूनी व्यवस्था में बराबर का स्थान मिले और यह विषय राज्यों पर न छोड़ा जाए। नागरिक बैंकों की उपस्थिति जनसामान्य का आधार बनी हुई है और इनकी भूमिका तय करते समय यह बात ध्यान में रखनी होगी।
राजनीतिक दखलंदाजी के बिना उनको स्वतंत्रता के साथ काम करने देने से इनकी स्थिति सुधर सकती है। कृषि बाजार व्यवस्था में भी सहकारी क्षेत्र को बड़ी जिम्मेवारी देने से किसानों की बहुत सी समस्याओं का समाधान मिल सकता है। सहकारी क्षेत्र को सरकार की भागीदारी और आर्थिक सहायता आवश्यक है, यह समझकर ही समिति को इस पर सुझाव देने होंगे ताकि सहकारी क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दे सके।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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