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देश अस्थिरता के दौर में वापस नहीं लौटना चाहता

Exit Poll: ओपिनियन पोल के मुकाबले एग्जिट पोल हमेशा नतीजों के नजदीक साबित हुए है| पिछले दो लोकसभा चुनावों के एग्जिट पोल इसके गवाह हैं| लगभग सभी न्यूज चैनलों के एग्जिट पोल एक ही दिशा दिखा रहे हैं कि विपक्षी दलों की ओर से मिलकर इंडी एलायंस बनाए जाने के बावजूद विपक्ष को कोई फायदा नहीं हुआ|

किसी भी एग्जिट पोल ने एनडीए को 325 सीटों से कम नहीं दिखाया है, किसी भी चैनल के एग्जिट पोल ने भाजपा को बहुमत के लिए वांछित 272 सीटों से कम नहीं बताया है| बहुत सारे एग्जिट पोल ऐसे भी हैं, जिन्होंने भले ही भाजपा को 370 के आसपास या एनडीए को 400 के आसपास नहीं दिखाया, लेकिन पिछली बार के एनडीए के आंकड़े 353 से ज्यादा दिखाया है| इसका मतलब यह है कि मोदी सरकार के पक्ष में एंटी इनकम्बेंसी नहीं थी, बल्कि प्रो-इनकम्बेंसी थी|

Exit Poll

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने एग्जिट पोल से ठीक पहले फैसला किया था कि उनका कोई प्रवक्ता किसी चैनल पर एग्जिट पोल के समय मौजूद नहीं रहेगा| इसका मतलब यह था कि कांग्रेस का खुद का फीडबैक कोई ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं था| अगर उनका फीडबैक उत्साहवर्धक होता, तो कांग्रेस ऐसा फैसला नहीं करती, लेकिन इंडी एलायंस की बैठक में यह निर्णय बदला गया और शाम को एग्जिट पोल के समय न्यूज चैनलों पर कांग्रेस के प्रतिनिधि मौजूद थे|

अगर एग्जिट पोल के नतीजे ही असल नतीजों में परिवर्तित हो जाते हैं, तो भारतीय राजनीति के लिए सबसे बड़ा संदेश है कि देश 1989-2014 की अस्थिरता से बाहर निकल चुका है| इन पच्चीस सालों में देश ने मजबूरी वाली गठबंधन की सरकारें देखी है, जिसमें सरकारें अपना बहुमत बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ तरह तरह के समझौते किया करती थी| देश की जनता अब खिचड़ी सरकार किसी हालत में नहीं चाहती| इस बीच 1991 में जब कांग्रेस बहुमत के काफी नजदीक थी, उस दौरान भी नरसिंह राव सरकार को कई तरह के समझौते करते पड़े थे| उन्हीं के समय झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों और जनता दल के सांसदों की खरीद फरोख्त का कांड हुआ था|

Exit Poll

इसी तरह 2004 से 2014 के बीच सबसे ज्यादा घोटाले हुए, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह कह कर नजरअंदाज करने की कोशिश की कि गठबंधन में कुछ समझौते करने पड़ते हैं| मनमोहन सरकार ने समझौता तो यहाँ तक किया था कि भ्रष्टाचार में सजा याफ्ता लालू प्रसाद यादव की लोकसभा सदस्यता बचाने के लिए अध्यादेश भी पास कर दिया था|

राहुल गांधी ने उस अध्यादेश को फाड़ कर जो हिम्मत दिखाई थी, अगर वह बाद में भी अपने उसी भ्रष्टाचार विरोधी स्टैंड पर कायम रहते और मनमोहन सिंह को हटाकर किसी अन्य को प्रधानमंत्री बना लिया होता, तो कांग्रेस की ये दिन नहीं देखने पड़ते| राहुल गांधी ने जो स्टैंड अध्यादेश की प्रति फाड़ कर लिया था, उसे राजनीतिक हलकों में भले ही पसंद न किया गया हो, लेकिन जनता के बीच उन्होंने अपनी छाप छोड़ी थी| कांग्रेस ने जिस तरह नरसिंह राव को किनारे कर दिया था, अगर उसी तरह मनमोहन सिंह को भी किनारे कर दिया होता, तो कांग्रेस की इतनी बुरी दशा नहीं होती|

अगर एग्जिट पोल के नतीजे ही 4 जून को नतीजों में परिवर्तित होते हैं, या उसके आसपास भी रहते हैं, तो कांग्रेस लगातार 15 सालों तक सत्ता से बाहर रहने वाली और सौ से कम सीटों वाली पार्टी बन जाएगी| कांग्रेस ने पिछले दस सालों में चिन्तन मंथन की कोशिश ही नहीं की कि वह भारतीय मतदाताओं की पसंद की पार्टी क्यों नहीं रही| नरेंद्र मोदी जो कुछ कहते रहे हैं, अगर कांग्रेस उसी सूत्र को पकड़ कर चिन्तन मंथन करती, तो खुद में सुधार कर सकती थी|

नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तीन आरोप लगाए हैं| पहला-भ्रष्टाचार, दूसरा- मुस्लिम परस्ती और तीसरा- परिवारवाद| कांग्रेस जब तक खुद पर चिपके इन तीनों दागों को धो नहीं देती, और पिछली गलतियों के लिए माफी नहीं मांगती, तब तक उसके उभरने के कोई चांस दिखाई नहीं देते| जब तक कांग्रेस मजबूत नहीं होगी, नरेंद्र मोदी और भाजपा को कोई खतरा नहीं है| जनता तभी मोदी के विकल्प के बारे में सोचेगी, जब उसे कांग्रेस भारत को समृद्ध बनाने के लिए उचित नीतियों के साथ विकल्प के रूप में दिखाई देगी|

कांग्रेस ने गांधी परिवार से इतर अध्यक्ष बनाने में बहुत देर कर दी| अध्यक्ष बनाया भी, तो वह खुद को अध्यक्ष साबित ही नहीं कर पाए, क्योंकि वह गांधी परिवार के दूत की तरह ही काम कर रहे हैं| पूरा गांधी परिवार कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य बना दिया गया| गांधी परिवार ने पिछले तीस-पैंतीस साल से बदल रहे देश के मिजाज को समझने की कोशिश ही नहीं की|

कांग्रेस और गांधी परिवार ने खुद में सुधार लाने के बजाए यूपीए सरकार के समय कुछ बड़ी गलतियाँ की हैं, जैसे पारिवारिक ट्रस्ट बनाकर नेशनल हेराल्ड की सारी सम्पत्ति उस ट्रस्ट में ट्रांसफर कर लेना| कांग्रेस के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, लेकिन गांधी परिवार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था, इस मामले में तो गांधी परिवार ने कांग्रेस को भी आरोपी बना दिया है, क्योंकि पहले कांग्रेस से नेशनल हेराल्ड को कर्ज दिया गया, फिर उसके बदले उसकी सारी सम्पत्ति पारिवारिक ट्रस्ट में ट्रांसफर कर ली| नतीजतन सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी चार्जशीट हो गए, और यह मोदी सरकार के समय नहीं, बल्कि खुद काग्रेस सरकार के समय हुआ|

नरेंद्र मोदी ने दस साल से परिवारवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार को विपक्ष के खिलाफ मुद्दा बनाया हुआ था, इंडी गठबंधन में वे सारे अवगुण पाए जा रहे हैं| लगभग सारी पार्टियां परिवारवाद पर आधारित है, और सारी पार्टियों के शीर्ष नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में सजायाफ्ता हैं, या चार्जशीट हैं, सभी पार्टियां मुस्लिम परस्ती करती हैं|

कांग्रेस को सोचना चाहिए कि देश क्या चाहता है, उसे 2013 से सबक लेना चाहिए, जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लग चुके थे, अदालतों ने कई मंत्री और सांसद जेल भेज दिए थे| उस समय भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर अरविन्द केजरीवाल ने नई पार्टी बनाई और पहले ही चुनाव में कांग्रेस की पन्द्रह साल से चल रही सरकार और उसकी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हरा दिया| लेकिन जब केजरीवाल पर ही भ्रष्टाचार के आरोप लग गए, तो कांग्रेस ने उन्हें गले लगा लिया| यह सब जनता को पचता नहीं है|

एग्जिट पोल के नतीजों से पहले हुई इंडी एलायंस की मीटिंग को ही देख लीजिए, उसमें पांच नेता ऐसे बैठे थे, जो भ्रष्टाचार के आरोपों में चार्जशीटेड हैं| सोनिया गांधी नेशनल हेराल्ड घोटाला, राहुल गांधी-नेशनल हेराल्ड घोटाला, अरविन्द केजरीवाल-शराब घोटाला, संजय सिंह -शराब घोटाला, तेजस्वी यादव- जमीन के बदले नौकरी घोटाला|

इंडी एलायंस की बैठक में झारखंड के मुख्यमंत्री चंपई सोरेन का मौजूद रहना तो वाजिब है, शिबू सोरेन भी पार्टी अध्यक्ष के नाते बैठक में आते तो वाजिब होता, लेकिन सरकारी जमीन हडपने के आरोप में जेल भेजे गए हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन का मौजूद रहना परिवारवाद की पुष्टि करता है| अरविन्द केजरीवाल को भी अगर प्रचार के अंतिम दिन 30 मई तक की अंतरिम जमानत मिली होती, तो उनकी जगह पर भी सुनीता केजरीवाल मीटिंग में बैठी होती| ममता बनर्जी सोच समझ कर ही इंडी एलायंस से दूरी बना रही हैं, उन्होंने अपनी पार्टी के भ्रष्ट नेताओं पर कार्रवाई करके खुद को अलग दिखाने की कोशिश की है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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