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सबका साथ सबका विकास के बाद हिन्दू मुसलमान क्यों?

Chunav Prachar: गुजरात दंगे के करीब एक दशक बाद 2011-12 में वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रदेशभर में सद्भावना सम्मेलन किया था। इन सद्भावना सम्मेलनों में वो राज्य के अलग अलग स्थानों पर जाते और दिन भर का उपवास करते।

इन सम्मेलनों में उनकी पार्टी के वर्कर तो रहते ही लेकिन मुख्य रूप से मुसलमानों को बुलाया जाता था ताकि देश में यह संदेश जाए कि मोदी पर मुस्लिम विरोधी होने का जो 'गहरा दाग' लगा है वो उसे धो सकें।

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लेकिन ऐसे ही एक सद्भावना सम्मेलन में सितंबर 2011 में जब कुछ सूफी मुसलमानों ने उन्हें मुस्लिम टोपी पहनाने की कोशिश की तो उन्होंने टोपी पहनाने वाले हाथों को बीच में रोक दिया। दो सेकेण्ड का मोदी का यह व्यवहार देश के हिन्दूवादी वोटरों के मन में गहरे धंस गया। हिंदुओं को लगा कि रोजा इफ्तार वाली कांग्रेस सरकार के दौर में कोई तो है जिसने मुसलमानों की 'टोपी' पहनने से मना कर दिया।

इस घटना के करीब दो साल बाद देश में आम चुनाव होने जा रहा था। मोदी समझते थे कि अगर राष्ट्रीय नेतृत्व पर उभरना है तो अपने ऊपर लगे मुस्लिम विरोधी ठप्पे को मिटाना होगा। वो ऐसे सद्भावना सम्मेलन अपने आपको ऐसे राष्ट्रीय नेता के तौर पर प्रस्तुत करने के लिए कर रहे थे जो 'मुसलमानों का हत्यारा' तो छोड़िए उनका विरोधी भी नहीं है। लेकिन टोपी वाली घटना से देश के हिन्दू मतदाताओं के मन में संदेश गया कि मोदी एक कट्टर हिन्दूवादी नेता हैं जो मुसलमानों से वोट के लिए कोई समझौता नहीं करते।

2013-14 में उनको मिला प्रचंड समर्थन ऐसा था कि पूरी बीजेपी लीडरशिप को उन्हें यह मानकर नेतृत्व सौंपना पड़ा कि वो देश के सबसे 'पॉपुलर लीडर' हैं। वो पापुलर थे भी। 2014 के चुनाव परिणामों ने बता दिया कि देश में मोदी का कोई विकल्प नहीं था। हालांकि सत्ता में आने के बाद उन्होंने अपने आपको हिन्दूवादी लीडर के रूप में प्रस्तुत करने की बजाय 'विकास पुरुष' के रूप में प्रस्तुत किया। ऐसा विकास पुरुष जो सबका साथ सबका विकास चाहता है।

2019 में उन्होंने इस नारे के साथ एक तीसरा वाक्य भी जोड़ा। सबका विश्वास। इस तरह 1014 से 2024 तक दस साल अपने कार्यकाल में मोदी ने सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के मूल मंत्र से ही चलाया। बतौर प्रधानमंत्री उनकी यह पहल सराहनीय थी। मोदी ने 2002 में गुजरात दंगों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दिये गये उस मंत्र को चरितार्थ करने का प्रयास किया कि "राजा को प्रजा प्रजा में भेद नहीं करना चाहिए।"

गौरक्षकों को गुण्डा बताने वाली बात हो या फिर नुपुर शर्मा को पार्टी से बाहर निकलवाने वाली घटना, प्रधानमंत्री रहते मोदी ने यही संदेश देने का प्रयास किया कि वो मुस्लिम समुदाय की भावनाओं की कद्र करते हैं। सरकार में रहते हुए सूफियों का सम्मेलन कराना हो या मेट्रो में किसी मुस्लिम के साथ फोटो खिंचवाना, उनकी ओर से सांकेतिक रूप से हमेशा यही संदेश दिया गया कि वो देश में हर नागरिक के प्रधानमंत्री हैं।

अपनी पार्टी में भी उन्होंने यही संदेश दिया कि एक सत्ताधारी दल को यह शोभा नहीं देता कि वह धर्म के आधार पर नागरिकों में भेद करे। पार्टी के प्रवक्ताओं को भी संदेश भेजा गया कि टीवी पर होनेवाली हिन्दू मुसलमान की बहसों से या तो अपने आप को अलग रखें या फिर बहस के दौरान मुस्लिम विरोधी न दिखें। पार्टी फोरम पर भी पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने की पहल शुरु हुई। मोदी सरकार की योजनाओं के लाभार्थी समान रुप से हर धार्मिक समुदाय के लोग हैं, इस बात को प्रमुखता से उभारने की बात कही गयी। अपने कार्यकाल के दौरान मोदी ने न केवल भारत के मुसलमानों से बेहतर रिश्ता बनाने का प्रयास किया बल्कि अरब देशों का बार बार दौरा करके उनसे आर्थिक सांस्कृतिक संबंध बढ़ाये। कई अरब देशों ने उन्हें अपने यहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी दिया।

सवाल यह है कि अगर सरकार में रहते हुए मुसलमानों को लेकर मोदी का सबकुछ ठीक चल रहा था तो फिर अचानक से आधा चुनाव बीतते बीतते वो हिन्दू मुसलमान की राजनीति पर क्यों उतर आये? बार बार अलग अलग मंचों से वो मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने का प्रयास क्यों करने लगे? 'मेरे जीते जी कोई धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण नहीं दे सकता" जैसे जुमले क्यों बोलने लगे? उन्हें मुसलमानों का 'वोट जिहाद' भला क्योंकर याद आ गया जिसके विकल्प में उन्होंने हिन्दुओं को रामराज्य के नाम पर वोट करने की अपील शुरु कर दी है?

लेकिन अब जबकि तीसरे चरण का मतदान समाप्त हो चुका है और लोकसभा की 285 सीटों के लिए मतदान हो चुका है तब हिन्दू मुसलमान का ध्रुवीकरण करने का प्रयास यह बताता है कि 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से एक कामयाब फार्मूला नहीं रहा है। इसलिए पुन: देश में हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण का चुनावी प्रयास किया जा रहा है।

लेकिन यह नीति एक दोधारी तलवार की तरह है कि सत्ता में रहते हुए आप कुछ और नीति अपनाएंगे और चुनाव में जाते ही कुछ और नीति अपना लेंगे। इससे मोदी के कहे अनुसार ही पसमांदा मुसलमानों को जिस तरह से भाजपा के पाले में लाने का प्रयास शुरु हुआ था या फिर तीन तलाक को कानूनन खत्म करने के बाद जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं को भाजपा के साथ जोड़ने की कोशिश शुरु हुई थी, उसको धक्का लगेगा। साथ ही साथ उस कोर हिन्दू वोटर के मन में भी अविश्वास पैदा होगा जो चुनाव के दिनों में कुछ और तो सरकार के दिनों में कुछ और भाषा सुनता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि मुस्लिम समुदाय दुनिया में जहां भी है वह अलग-थलग ही रहता है। उसके इस्लामिक सिद्धांत इस प्रकार के हैं कि वह बाकी समाज के साथ समरस नहीं हो पाता। अगर अल्पसंख्यक है तो अल्पसंख्यक के नाम पर अलग-थलग रहता है और जब बहुसंख्यक हो जाता है तो बाकी अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करके उन्हें खत्म करने का प्रयास करता है। वह लोकतंत्र का इस्तेमाल लोकतंत्र को खत्म करने के लिए करता है।

इसलिए वह जहां कहीं भी अल्पसंख्यक है उसका वोटिंग पैटर्न बाकी लोगों से बिल्कुल अलग होता है। जैसे मजहब के मामले में वह मुल्ला मौलवी पर निर्भर रहता है वैसे ही चुनाव में वोट देने के मामले में भी उनके इशारे का इंतजार करता है। वह एक व्यक्ति बनकर कभी मतदान नहीं करता। वह एक मजहबी समूह बनकर लोकतंत्र में हिस्सेदार होता है और जिस पार्टी के पास जाता है उससे अपने वोट की पूरी मजहबी कीमत वसूलता है।

हिन्दुओं का स्वभाव इस प्रकार का नहीं है, और कभी होना भी नहीं चाहिए कि वह लोकतंत्र में मुसलमानों की तरह एक ब्रेन डेड व्यक्ति की तरह व्यवहार करे। हिन्दुओं का ध्रुवीकरण जातीय आधार पर तो हो सकता है लेकिन धार्मिक आधार पर उन्हें इकट्ठा करना बहुत कठिन काम है। बीजेपी ने बड़े लंबे समय के संघर्ष के बाद इसमें कुछ हद तक कामयाबी पायी है लेकिन अगर उसकी भाषा चुनाव में कुछ और तथा सरकार में कुछ और हो जाएगी तो इस दोहरेपन को उसके समर्थक ही नहीं पचा पायेंगे।

बेहतर होगा कि अगर भाजपा के रणनीतिकार अगले पचास साल तक सत्ता में रहने की बात करते हैं तो वो मुसलमानों को लेकर भी एक स्पष्ट नीति बना लें। अगर सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की नीति ही उचित है तो इसे सिर्फ सरकार बनने के बाद लागू न किया जाए। इसी आधार पर भाजपा द्वारा चुनाव भी लड़ा जाए। अगर उसे यह हितकर नहीं लगता है तो सरकार में आने के बाद गौरक्षकों को गुण्डा कहने या हिन्दू मुस्लिम बहस के दौरान अपने आपको तटस्थ रखने से भी बचना होगा। वरना यह भाजपा के लिए दोधारी तलवार जैसा होगा जिस पर चलने से उसे न माया मिलेगी न राम।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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