Hindutva Wave: उत्तर भारत में उफान पर हिन्दुत्व की लहर
Hindutva Wave: इतनी बड़ी जीत की उम्मीद तो खुद भाजपावालों को नहीं थी जैसी जीत मध्य प्रदेश में हुई। भाजपा के नेता छत्तीसगढ में भी 'हारी हुई लड़ाई' ही लड़ रहे थे। राजस्थान में कांटे का मुकाबला था। लेकिन 3 दिसंबर को जब चुनाव परिणाम आये तो पता चला कि तीनों ही राज्य बंपर जीत के साथ बीजेपी की झोली में चले गये। भारत के राजनीतिक मानचित्र पर गुजरात से उत्तर प्रदेश तक एक बार फिर उत्तर भारत भगवामय हो गया है।
अब गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, सिक्किम, अरुणाचल, असम, त्रिपुरा, मणिपुर में भाजपा का भगवा लहरा रहा है। दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, कर्नाटक की हार के बाद भाजपा के लिए जरूरी था कि राज्यों में अपनी जीत के समीकरण ठीक करती। आम चुनाव से पहले राजस्थान, छत्तीसगढ को जीतकर तथा मध्य प्रदेश में मजबूत वापसी करके भाजपा ने राज्यों में अपनी उपस्थिति को मजबूत कर लिया है। इन तीन राज्यों में जीतनेवाले 332 विधायक राज्यसभा में भी उसकी उपस्थिति को अगले पांच साल तक मजबूत बनाकर रखेंगे।

इन तीन राज्यों के इतर तेलंगाना में भी भाजपा ने अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए 8 सीटें हासिल की हैं। तेलंगाना में भाजपा ने 14 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया है जो राज्य में भाजपा के बेहतर भविष्य का संकेत भी कर रहा है। हालांकि उत्तर के तीन राज्यों में हार का सामना करनेवाली कांग्रेस को तेलंगाना ने संजीवनी प्रदान कर दी है और पार्टी ने 39.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 64 सीटें जीत ली हैं जो राज्य की 119 सीटों वाली विधानसभा में पूर्ण बहुमत से चार ज्यादा है।
जहां तक मध्य प्रदेश की बात है तो वहां मानों भाजपा के हिन्दुत्व की सुनामी चली है। गुजरात और उत्तर प्रदेश के बाद अब मध्य प्रदेश ही ऐसा राज्य बन गया है जहां भाजपा को इतने बंपर वोटों और सीटों से जीत हासिल हुई है। भाजपा को 48.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल हुआ है और उसे राज्य की कुल 230 सीटों में 163 सीटों पर जीत मिली है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 109 तो कांग्रेस को 114 सीटें मिली थी। इस बार कांग्रेस घटकर 66 सीटों पर आ गयी।
इसी तरह राजस्थान में 41.70 प्रतिशत वोट शेयर के साथ बीजेपी 115 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि 39.5 प्रतिशत वोट शेयर के बाद भी कांग्रेस 69 सीटों पर सिमट गयी। 200 सीटों वाला राजस्थान ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां छोटे दलों और निर्दलियों को भी कुछ सीटें हासिल हुई हैं। वरना छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा है। यही कारण है कि 39.5 प्रतिशत वोट शेयर होने के बावजूद त्रिकोणीय संघर्ष में कांग्रेस बहुमत से बहुत दूर रह गयी। राज्य में निर्दलियों और अन्य छोटे दलों को 15 सीटें मिली हैं, जबकि अन्य के खाते में 16 प्रतिशत वोट गया है।
छत्तीसगढ में भाजपा और कांग्रेस में सीधा मुकाबला हुआ और भाजपा ने सबसे अप्रत्याशित प्रदर्शन इसी राज्य में किया। राज्य की 90 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा ने 54 सीटें जीत ली हैं जबकि कांग्रेस को 36 सीटें मिली हैं। भाजपा को कुल वोटों का 46.2 प्रतिशत तो कांग्रेस को 42.2 प्रतिशत हासिल हुआ है। बसपा सहित अन्य छोटे दल और निर्दलीय यहां चुनाव मैदान में जरूर उतरे थे लेकिन वो एक भी सीट जीत पाने में सफल नहीं हुए। छत्तीसगढ में मानों मतदाताओं ने भाजपा के लंबे शासन से ऊबकर कांग्रेस को एक कार्यकाल दिया था और फिर से भाजपा को ही शासन सौंप दिया है।
भाजपा की यह भीषण जीत जहां पार्टी के स्तर पर संतोष देगी वहीं नेताओं के स्तर पर असंतोष का पारा भी चढेगा। जब से केन्द्र में मोदी सत्तारूढ़ हुए हैं उन्होंने क्षेत्रीय नेताओं को ताकतवर होने देने से परहेज ही किया है। हालांकि सीधे तौर पर उन्होंने क्षेत्रीय नेताओं के काम काज में दखल तो नहीं दिया लेकिन मोदी शाह की चुनावी रणनीति ऐसी रहती है कि पहले वो चुनाव की कमान अपने हाथ में लेते हैं, मेहनत करते हैं और जीत के बाद नेतृत्व तय करते हैं। यही कारण है कि 2014 में चुनाव से पहले अपने आपको प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में प्रस्तुत तो कर दिया था लेकिन राज्यों में वो कमल निशान पर चुनाव लड़ने पर जोर देते हैं।
इसलिए तीन राज्यों की बंपर जीत के बाद सबसे बड़ा उहापोह अब भावी मुख्यमंत्री को लेकर होगा। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान हों, राजस्थान में वसुंधरा राजे हों या फिर छत्तीसगढ में रमन सिंह। सभी ने चुनावी नतीजे सामने आने के बाद सबसे पहले जीत का श्रेय नरेन्द्र मोदी के नाम और काम को दिया। भाजपा के भीतर यह नया चलन है। भाजपा का इतिहास रहा है कि अगर चुुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़े जाते थे तो जीत का श्रेय भी सभी को समान रूप से मिलता था। यह पहली बार दिख रहा है कि कांग्रेस के नक्शेकदम पर चलते हुए भाजपा के नेता जीत का श्रेय पार्टी कार्यकर्ताओं और कमल निशान को देने की बजाय किसी एक नेता को दे रहे हैं जिसके पास उनकी कुर्सी का निर्णय लंबित है।
फिर भी भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व के लिए इन तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री का निर्णय इतना आसान नहीं होगा। शिवराज सिंह चौहान हों, रमन सिंह हों या फिर वसुंधरा राजे। ये सभी नरेन्द्र मोदी के समकक्ष हैं। इसमें दो राय नहीं कि हारी हुई बाजी जीतने के लिए मशहूर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की नीति और रणनीति इन राज्यों में सफल रही है फिर भी इन तीनों नेताओं को दरकिनार करके एकदम से नये नेतृत्व को कुर्सी सौंप देने से विद्रोह, विरोध और भीतरघात के स्वर जरूर उभरेंगे इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। झारखण्ड में अपनी मर्जी से रघुवर दास को सीएम बनाकर दोनों नेता उसका दुष्परिणाम देख चुके हैं। कर्नाटक में येदिय्युरप्पा को किनारे करने का क्या परिणाम निकला, वह सबके सामने है।
बहरहाल, किस राज्य में कौन सीएम होगा ये मोदी शाह ही तय करेंगे लेकिन इसके लिए उन्हें हर पहलू का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा। अगर क्षेत्रीय क्षत्रपों को अपने मातहत रखना ही मंशा है तो शिवराज हों या वसुंधरा उन्होंने पीएम मोदी को जीत का श्रेय दे ही दिया है। लेकिन समग्रता में इन चुनावों से एक बात और साबित हुई है कि जातिवादी राजनीति की व्यूहरचना करनेवाले लोगों की करारी हार हुई है और भाजपा का हिन्दुत्व एक बार फिर स्थापित हुआ है। फिर चाहे राजस्थान में सालेह मोहम्मद की हार हो या छत्तीसगढ के साजा से निर्धन ईश्वर साहू की जीत। ये हिन्दुत्व की ही जीत कही जाएगी जब पाकिस्तान की सीमा वाले इलाके में अपनी मजहबी सियासत चलाने वाले गाजी फकीर का बेटा एक भगवाधारी से चुनाव हार गया और छत्तीसगढ में मुस्लिमों की भीड़ हिंसा के शिकार बने भुवनेश्वर साहू के पिता ईश्वर साहू चुनाव जीत गये तो इसे हिन्दुत्व की जीत नहीं तो और क्या कहा जाएगा?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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