Election Commission: मोदी ने कांग्रेस की साजिश की नाकाम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने या ये कहिए कि मोदी सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में अडंगा डालने की कांग्रेस की कोशिशों को नाकाम कर दिया है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को रोकने के लिए कांग्रेस ने 11 मार्च को सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
मोदी सरकार ने दिसंबर 2023 में संसद के शीत शिविर में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया के लिए जो क़ानून बनाया था, कांग्रेस ने उस क़ानून को चुनौती दी थी। पहले एक एनजीओ एडीआर जनवरी में सुप्रीमकोर्ट गया, उसने क़ानून पट स्टे लगाने और तुरंत सुनवाई शुरू करने की अपील की थी, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया था।

फिर फरवरी में एडीआर ने दुबारा कोशिश की, तो कोर्ट ने फिर स्टे देने और तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया। लेकिन 11 मार्च को जब कांग्रेस की एक नेता ने याचिका दाखिल की, तो 13 मार्च को सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस के निर्देश पर याचिका 15 मार्च को सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली गई।
हैरानी यह जानकर हुई कि चीफ जस्टिस ने जल्दबाजी में कांग्रेस की याचिका क्यों स्वीकार की, जबकि दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए मोदी सरकार ने 14 मार्च को ही मीटिंग बुलाई हुई थी। राहुल गांधी के इशारे पर कांग्रेस की नेता ने यह याचिका इसलिए दाखिल की थी, ताकि मोदी सरकार नए चुनाव आयुक्त नियुक्त न कर सकें।

सुप्रीमकोर्ट शायद मीडिया की खबरों से गलतफहमी में रहा कि मीटिंग 15 मार्च को है। अब ऐसा संभव नहीं लगता कि सुप्रीमकोर्ट नियुक्ति या नए चुनाव आयुक्तों के चार्ज ग्रहण करने में कोई अडंगा डालने की कोशिश करेगी। मोदी सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर ही संसद से क़ानून बनवा कर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय की है, उसी प्रक्रिया के तहत ही नियुक्ति हुई है।
सरकार ने एक सिलेक्ट कमेटी बनाई है, जो एक पैनल तैयार करती है, उसी के अंतर्गत पहले 212 अधिकारियों का पैनल बना। फिर उसमें से छंटाई करके छह लोगों का पैनल बना, जिसमें संजय मिश्रा, पीसी मोदी, जेपी महापात्रा, दिनकर गुप्ता, सुखबीर संधू और ज्ञानेश कुमार के नाम थे।
उम्मीद के मुताबिक़ ही कमेटी के कांग्रेसी सदस्य अधीर रंजन चौधरी ने चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए, लेकिन कमेटी में सरकार का बहुमत होने के कारण सुखबीर संधू और ज्ञानेश कुमार के नाम तय हो गए। जिस क़ानून के अंतर्गत दोनों अधिकारियों का चुनाव आयुक्त के तौर पर चयन हुआ है उस क़ानून पर खुद सुप्रीमकोर्ट ने स्टे लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन अधीर रंजन चौधरी का एतराज उसी क़ानून पर था, जिसे संसद ने पास किया है।
पिछले 75 सालों में कांग्रेस और गैर कांग्रेस सरकारों ने भी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का कोई क़ानून नहीं बनाया था। सरकार की मशीनरी एक पैनल बना देती थी, जिसे प्रधानमंत्री के सामने रखा जाता था, प्रधानमंत्री सबका रिकार्ड देख कर, अपने विधि मंत्री से सलाह करके उनमें से एक का नाम नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को भेज देते थे।
1992 तक चुनाव आयोग एक सदस्यीय था, उस समय के चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने जब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से टकराव शुरू किया तो राव सरकार ने क़ानून बना कर चुनाव आयुक्तों की संख्या एक से बढ़ा कर तीन कर दी, और तीनों के अधिकार भी बराबर कर दिए, लेकिन उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया वही की वही रही।
जवाहर लाल नेहरू के काल से चली आ रही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं हुआ, सरकार ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करती थी। पचहतर साल से एक ही परंपरा चलती रही, लेकिन जैसे ही केंद्र में स्पष्ट बहुमत वाली पहली गैर कांग्रेस सरकार आई, कई एनजीओ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोर्ट चले गए। उन्हें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में खोट दिखाई देने लगा। कांग्रेस ने जब नवीन चावला और एमएस गिल को पहले चुनाव आयुक्त बनाया और बाद में वे मुख्य चुनाव आयुक्त बने, तब तक इन एनजीओ को कोई एतराज नहीं था।
एमएस गिल के रिटायर होते ही जब सोनिया गांधी ने उन्हें राज्यसभा में लाकर केंद्र में मंत्री बना दिया था, तब भी इन एनजीओ को कोई चुनाव आयुक्त पक्षपाती नहीं लगा। जबकि अहमदाबाद के दस आईआईएम प्रोफेसरों के एनजीओ एडीआर ने मोदी सरकार बनने के छह महीने बाद पहली जनवरी 2015 को ही सुप्रीमकोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया बदलने की याचिका दाखिल कर दी। याचिका में कहा गया था कि जैसे जजों की नियुक्ति के लिए कोलिजियम बना हुआ है, वैसे ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोलिजियम बने, जिसमें सरकार का कोई दखल नहीं हो।
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले एडीआर ने तुरंत सुनवाई की दरख्वास्त लगाई तो 23 अक्टूबर 2018 को सुनवाई के बाद दो जजों की बेंच ने यह केस पांच जजों की बेंच को रेफर कर दिया था। जिस पर पांच जजों की बेंच ने 2 मार्च 2023 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद से क़ानून बनवा कर चयन कमेटी का गठन करे।
जब तक क़ानून नहीं बनता तब तक सुप्रीम कोर्ट बेंच ने खुद ही एक कमेटी बना दी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता और चीफ जस्टिस को मेम्बर बना दिया गया। यह कार्यपालिका में न्यायपालिका का सीधा दखल था, जिसे मोदी सरकार ने स्वीकार नहीं किया। मोदी सरकार की जगह कोई भी सरकार होती, इसे स्वीकार नहीं करती।
मोदी सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर अमल करते हुए दिसंबर 2023 में संसद से बिल पास करवा कर नियुक्ति कमेटी बना दी, जिसमें प्रधानमंत्री, एक मंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को रखा गया। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का क़ानून तो यूपीए सरकार में बना था, उसकी प्रक्रिया भी इसी लाईन पर है।
अहमदाबाद का एनजीओ एडीआर इस क़ानून के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में गया हुआ है। चुनाव आयुक्त का एक पद खाली था, दूसरे चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के अचानक इस्तीफे के कारण अगर चुनाव आयोग के तीन में से दो पद खाली न होते, तो शायद मोदी सरकार लोकसभा चुनावों से पहले चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया शुरू ही न करती।
अरुण गोयल के इस्तीफे के बाद सरकार ने 14 मार्च को कमेटी की मीटिंग बुलाई, तो कांग्रेस ने 11 मार्च को अपनी नेता जया ठाकुर के माध्यम से सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल करवाई कि मोदी सरकार से कहा जाए कि वह 2 मार्च 2023 के सुप्रीमकोर्ट के फैसले के मुताबिक़ नियुक्ति कमेटी बनाए, यानी नियुक्ति कमेटी में चीफ जस्टिस को रखा जाए।
चीफ जस्टिस ने ही 13 मार्च को खुद दखल देते हुए 15 मार्च को सुनवाई के आदेश दिए थे। इस आदेश के मुताबिक़ कांग्रेस और एडीआर की याचिका पर तुरंत सुनवाई शुरू होनी थी, शायद क़ानून पर स्टे की तैयारी भी थी। सवाल यह है कि चीफ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड ने अचानक यह केस तुरंत सुनवाई के लिए क्यों मंजूर किया।
क्या चीफ जस्टिस 2 मार्च 2023 के फैसले की तरह कार्यपालिका में दखल का इरादा रखते हैं? इससे पहले भी एक बार सुप्रीमकोर्ट कह चुकी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य सूचना आयुक्त सुप्रीमकोर्ट का रिटायर्ड चीफ जस्टिस होना चाहिए, लेकिन सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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