क्या राजनीति में अनपढ़ नेता हावी हैं?
Shikshit Neta:हमारे देश में राजनेताओं की शैक्षिक योग्यता को लेकर आमतौर पर नकारात्मक बातें ही ज्यादा बोली जाती हैं। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी जैसी नेता भी इससे बच नहीं सकी हैं। और तो और, प्रधानमंत्री मोदी तक एमए की डिग्री को लेकर आरोपों का सामना कर चुके हैं।
हालांकि हमारे यहॉं 73 सालों से मौजूद जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि किसी को उसकी शैक्षिक योग्यता के आधार पर सांसदी अथवा विधायकी से हटा दिया जाए।

फिर भी राजनेता, शैक्षिक आधार पर अपने विरोधियों की छवि धूमिल करने का प्रयास करने में लगे रहते हैं। रही-सही कसर मसाला फिल्मों और भद्रलोक के लतीफों ने पूरी कर दी है, जो राजनेताओं की भाषा और सामान्यज्ञान की इतनी ज्यादा भद्द पीटते हैं, गोया नेता किसी और ग्रह से आई प्रजाति से संबंध रखते हैं।
हमें स्वतंत्रता मिले आठ दशक होने जा रहे हैं, लेकिन इस मामले में हमारी सोच बिल्कुल नहीं बदली है। आज भी लोगों को विद्रूपता से यह कहते सुना जा सकता है कि ऐसी पढ़ाई-लिखाई का क्या फायदा, जहॉं बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे अधिकारियों तक को अनपढ़ नेताओं के इशारों पर नाचना पड़ता है। हमें आए दिन यह सवाल परेशान करता है कि देश में एक चपरासी तक की नौकरी के लिए जब न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित की गई है तो देश को चलाने का जिम्मा लेने वाले राजनेताओं को इससे बाहर क्यों रखा गया है?
इस प्रश्न का जवाब हमारा लोक-प्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 में निहित है, जिसमें कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि जनप्रतिनिधि के रूप में संसद, विधानसभा, स्थानीय निकायों में आने के इच्छुक व्यक्ति को पढ़ा-लिखा होना चाहिए। वैसे भी बीते कुछ दशकों में इस अधिनियम को प्रासंगिक, प्रभावी और अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए कई बार इसमें बहुत सारे नए प्रावधान जोड़े गए हैं। लेकिन, शैक्षिक योग्यता की आवश्यकता को कभी इसमें नहीं जोड़ा गया है। यह अकारण नहीं है। ऐसी बहुत सारी वजह हैं, जिनके चलते जनप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता की शर्त नहीं रखी गई।
लोकतांत्रिक प्रणाली के मूल सिद्धांतों में से एक समावेशी प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना भी है। यह विचार सुनिश्चित करता है कि समाज के सभी वर्गों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने और अपने लोगों का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिले। लेकिन, शैक्षिक मानदंड लागू किए जाने के बाद आबादी के एक हिस्से, विशेष रूप से शिक्षा या विकास से वंचित पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले लोगों के चुनाव लड़ने और जनसेवा में प्रवेश करने से बाहर हो जाने की आशंका बढ़ सकती है।
उम्मीदवारों की पात्रता तय करते समय अगर शैक्षिक योग्यता को थोपा जाता तो अधिनियम को भेदभावपूर्ण और संविधान में निहित समानता के सिद्धांतों के विरोधाभासी के रूप में देखे जाने की आशंका थी। वैसे भी इसके विरोध में यह तर्क दिया जाता ही है कि इस तरह के मानदंड समाज के कुछ वर्गों को परोक्ष रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि या हाशिए पर रहने वाले समुदायों को, जिन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा तक पहुंचने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
बेशक औपचारिक शिक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन यह किसी व्यक्ति की प्रभावी ढंग से नेतृत्व करने या शासन करने की क्षमता का एकमात्र निर्धारक नहीं है। व्यावहारिक अनुभव, लोगों की सेवा, संचार कौशल और स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ जैसे अनेक कारक हैं, जो जन-प्रतिनिधियों के लिए शिक्षा से अधिक या उतने ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसके पीछे यह सोच भी रही हो सकती है कि शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता लागू करने को कहीं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ऐसे नियम के रूप में न देखा जाए, जो संभावित रूप से उम्मीदवारों और मतदाताओं दोनों की स्वतंत्रता और विकल्पों को सीमित कर सकता है।
शायद यही वजह रही होगी कि मतदाताओं के चयन के अधिकार का सम्मान करते हुए समावेशी और विविधतापूर्ण प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने के लिए जानबूझकर शिक्षा को पात्रता शर्तों में शामिल न करने का विकल्प चुना गया। वैसे भी अनुभव यही बताते हैं कि शिक्षा से योग्यता जरूर बढ़ती है, लेकिन अशिक्षित होना अयोग्य होने का परिचायक नहीं माना जा सकता।
लेकिन, जनप्रतिनिधियों के लिए शिक्षा को आवश्यक मानने वाले विचारकों की संख्या भी कम नहीं है। उनका तर्क है कि भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में, शासन की गुणवत्ता काफी हद तक सुशिक्षित और सक्षम जन प्रतिनिधियों पर निर्भर करती है। शिक्षा नेताओं को प्रभावी नीति निर्धारण और राष्ट्र के सामने आने वाली जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान, विश्लेषणात्मक सोच और निर्णय लेने की क्षमता से लैस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
दोनों पहलुओं पर विचार करते हुए अब उस मिथक पर वापस आते हैं जो नेताओं की शिक्षा को लेकर हमारी परंपरागत सोच में गहरे तक जड़ जमाये हुए है। लेकिन, थोड़ा विवेकपूर्ण ढंग से सोचिए कि क्या वाकई राजनीति अनपढ़ नेताओं की शरणगाह है? क्या हमारे ज्यादातर नेता अंगूठाछाप हैं?
वास्तविकता इससे एकदम अलग है। हमारे जनप्रतिनिधियों के लिए भले ही शैक्षिक योग्यता अनिवार्य न हो, लेकिन इसकी आवश्यकता और उपयोगिता को राजनेताओं ने बहुत गंभीरता से लिया है। इसी का नतीजा है कि आज बड़ी संख्या में शिक्षित और उच्चशिक्षित लोग संसद या विधानसभाओं में मौजूद नजर आते हैं। इसे समझने के लिए 17वीं लोकसभा का ही उदाहरण लेते हैं। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, निवर्तमान लोकसभा के कम से कम 75% सांसद ऐसे थे, जिनके पास स्नातक डिग्री है, जबकि इनमें करीब 25% के पास तो स्नातकोत्तर डिग्री भी है। 10% एमपी ऐसे थे, जिन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की है।
इस लोकसभा में ग्रेज्युएट, पोस्टग्रेज्युएट ही नहीं, पीएचडी, सीए, डॉक्टर, वकील भी शामिल थे। 543 सदस्यों में से सिर्फ एक ही सांसद ऐसा था जिसने कोई स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। हमारी दिक्कत यह है कि हम लालू यादव जो कि एमए एलएलबी हैं, उनको भी अनपढ गंवार समझ बैठते हैं। हम उनकी चर्चा तो करते हैं लेकिन पुडूचेरी के पूर्व शिक्षामंत्री पीएमएल कल्याणसुंदरम की नहीं, जिन्होंने 34 साल की उम्र में पढ़ाई की जरूरत को महसूस किया और एक सामान्य छात्र की तरह दसवीं की परीक्षा देने गए।
फिर भी मूल बात यह है कि राजनीति समझ और व्यवहार का विषय है। किसी व्यक्ति में व्यवहार और समझ कैसी होगी, इसको विकसित करने में वर्तमान शिक्षा की भूमिका बहुत सीमित है। समाज और सार्वजनिक जीवन ही वो सच्ची पाठशाला है जहां आपको जीवन से जुड़ी वास्तविक शिक्षाएं प्राप्त होती हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि इस शिक्षा में नेता किसी और के मुकाबले अधिक समझदार और दक्ष होते हैं। वो जनता को समझते हैं। उनके बीच रहते हैं। आखिरकार इसी समझ और अनुभव की जरूरत राजनीति में होती है जिसकी उनके पास कोई कमी नहीं होती। भले ही वो स्कूल गये हों या कि न गये हों।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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