प्रशांत किशोर, क्या उद्धव ठाकरे से बीजेपी के पॉलिटिकल एजेंट के तौर पर मिले?

नई दिल्ली। PK यानी प्रशान्त किशोर। वो प्रशान्त किशोर जिन्होंने गुजरात में मोदी-शाह का परचम कभी झुकने नहीं दिया। वो प्रशान्त किशोर जिन्होंने 2014 में पूरे हिन्दुस्तान को मोदीमय कर दिया, वो प्रशान्त किशोर जिसने कैप्टन अमरिन्दर को सत्तानशीं बनाया, वो प्रशान्त किशोर जिन्होंने एनडीए से अलग हुए नीतीश कुमार को महागठबंधन का नेता बनाया, मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलायी। प्रशान्त किशोर का पेशेवर परिचय लम्बा है। मगर, ये अतीत की बात है। अब वे नयी भूमिका में हैं।

प्रशांत किशोर, क्या उद्धव से पॉलिटिकल एजेंट के तौर पर मिले?

प्रशान्त किशोर अब चुनाव को इवेंट मानकर उसे मैनेज करने वाले गुरू से ऊपर उठ गये हैं। अब वे 'पॉलिटिकल एजेंट' हो गये हैं। 'पॉलिटिकल एजेंट' शब्द को बुरा मत समझिए। इसे इज्जत दीजिए। प्रशान्त किशोर जेडीयू के उपाध्यक्ष हैं। मगर, वे देश के पहले ऐसे नेता हैं जिन्हें नेतागिरी किसी के कहने से मिली है। बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने यह घोषणा कर सनसनी फैला दी कि उन्होंने बीजेपी के कहने पर प्रशान्त किशोर को जेडीयू का उपाध्यक्ष बनाया। माना जा रहा है कि उन्होंने इशारा अमित शाह की ओर किया।

मातोश्री में PK के होने का मतलब

मातोश्री में PK के होने का मतलब

प्रशान्त किशोर के मातोश्री पहुंचने और उद्धव-आदित्य ठाकरे से मुलाकात को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। निश्चित रूप से बिहारियों के प्रति खुली नफ़रत दिखाते रहे उद्धव ठाकरे जेडीयू से तालमेल की बात करने पीके के साथ नहीं बैठे होंगे। जेडीयू-शिवसेना में न कोई गठबंधन है और न ही इसका कोई बड़ा राजनीतिक महत्व है। इसलिए पीके को नीतीश ने मातोश्री नहीं भेजा होगा। पीके बीजेपी का पॉलिटिकल एजेन्ट बनकर के ही मातोश्री पहुंचे होंगे।

बीजेपी और शिवसेना के बीच राजनीतिक रणक्षेत्र में इतने गोले एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बरसे हैं कि अब कोई तीसरा ही ‘मध्यस्थता' कर सकता था। ‘मध्यस्थता' शिवसेना की तरफ से होने की अहमियत नहीं थी। यह पहल बीजेपी की ओर से ही हो सकती थी। अगर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह खुद पहल करते, तो उनके मान-सम्मान को ठेस पहुंच सकती थी। ऐसे में एक ऐसा रास्ता निकाला गया कि पहल भी बीजेपी ने की है और पहल करने वाला बीजेपी का है भी नहीं। पहल करने वाला शख्स ऐसा शख्स है जो खुले तौर पर जेडीयू में है और बीजेपी के पॉलिटिकल एजेंट के रूप में है।

ठाकरे पिता-पुत्र से नेता नहीं, पॉलिटिकल एजेंट की मुलाकात

ठाकरे पिता-पुत्र से नेता नहीं, पॉलिटिकल एजेंट की मुलाकात

कहने को जेडीयू के उपाध्यक्ष ने शिवसेना नेताओं से मुलाकात की है। मगर, वास्तव में बीजेपी के पॉलिटिकल एजेंट ने यह मुलाकात की है। क्या फर्क हो सकता है राजनीतिक नेताओं के बीच मुलाकात और पॉलिटिकल एजेंट से राजनीतिक नेताओं की मुलाकात में? पहला फर्क ये है कि राजनीतिक नेता एक-दूसरे को नफा-नुकसान सीधे तौर पर समझाते हैं और उसके लिए तैयार करते हैं। जबकि, पॉलिटिकल एजेंट बातचीत में शामिल राजनीतिक नेता को सिर्फ और सिर्फ फायदे गिनाता है। दूसरा फर्क है कि राजनीतिक नेता गठबंधन या चुनावी तालमेल के लिए परम्परागत आधार, बल्कि कहें कि नीतिगत और सैद्धांतिक आधार का चयन करता है। जबकि, पॉलिटिकल एजेंट इनोवेटिव होता है क्योंकि वह खुद इनोवेशन का नतीजा है।

सवाल ये है कि ऐसा क्या इनोवेशन महाराष्ट्र की राजनीति में होने वाला है जो शिवसेना और बीजेपी को एक-साथ चुनावी मंच पर लाकर खड़ा कर दे। शिवसेना को महाराष्ट्र में चाहिए बड़े भाई का दर्जा। बीजेपी घोषित तौर पर ऐसा नहीं कर सकती। ऐसे में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की अलग-अलग रणनीति को पैकेज बनाकर पीके शिवसेना के सामने रख सकते हैं।

नवाचार यानी इनोवेशन के साथ होगा गठबंधन

नवाचार यानी इनोवेशन के साथ होगा गठबंधन

दिखावे के लिए महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना बराबर-बराबर सीटों पर लड़ेंगे यानी कोई बड़ा या छोटा भाई नहीं होगा। मगर, अन्दर ही अन्दर खुद पीके की तरह बीजेपी के कई नेता उम्मीदवार बनाकर शिवसेना में प्लांट कर दिए जाएंगे। अब इस प्रस्ताव को शिवसेना एकतरफा नहीं मानेगी, इसलिए कुछेक प्लांटेशन शिवसेना की ओर से भी बीजेपी में करा दिए जाएंगे। ऐसी कोशिश में ही थोड़ा वजन शिवसेना के हक में देकर उसे बड़े भाई का अहसास करा दिया जाएगा।

राजनीति में यह नवाचार या इनोवेशन दरअसल संबंध को नाजुक दौर से निकालने के लिए है। आगे जब कभी भी शिवसेना विरोध की हद पार करेगी, तो प्लान्ट की हुई पॉलिटिक्स अपनी जड़ें जिस हद तक फैला चुकी होगी, उस हद तक उसे खामियाजा भी भुगतना होगा। इस तरह से राजनीतिक रिश्ते को स्थायित्व देता हुआ यह इनोवेशन एक तरह से पॉलिटिकल ब्लैकमेलिंग को ऑनरेबल यानी सम्माननीय बनाएगा।

राजनीति में नैतिकता की नयी पैकेजिंग हैं PK

राजनीति में नैतिकता की नयी पैकेजिंग हैं PK

राजनीति में अब पीके नया रूप, नया रंग और नया अर्थ बनता दिख रहा है। आधुनिक राजनीतिक नैतिकता की इस नयी पैकेजिंग के भीतर तमाम अनैतिकताएं, जो अब ‘कथित' कहलाने वाली हैं, इतिहास हो जाएंगी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को उद्धृत करते हुए किसी और के हवाले से मीडिया में ये ख़बर आती रही हैं कि पीके में मोल-भाव करने की अद्भुत क्षमता है। दरअसल इस क्षमता में अंतर्निहित जो तत्व हैं वो इनोवेशन ही है जिसकी ऊपर चर्चा की गयी है।

पीके पैरोकार बने हैं तो शिवसेना और बीजेपी के बीच चुनावी गठबंधन अब तय लगता है। गले मिलकर एक फोटो इवेंट होगा। ‘स्वाभाविक मित्र' का नारा बुलन्द होगा। गलतफ़हमियां ख़त्म हो जाने की बातें टॉस होंगी। साझा टास्कफोर्स बनेगा। साझा रैलियां भी आयोजित की जाएंगी। ऐसी बहुत सारी बातें होंगी, जो खट्टी यादों में मिलावट करेंगी ताकि नये गठबंधन का स्वाद जायकेदार हो जाए। यह जायका खट्टे स्वाद के आसपास हो सकता है या फिर कड़वे स्वाद के निकट, मगर मीठा कतई नहीं होगा। हर PK की भी अपनी लिमिट होती है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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