Delimitation 2026: परिसीमन की आहट, दक्षिण के राज्यों में घबराहट

नये संसद भवन के निर्माण के साथ ही परिसीमन की आहट भी सुनाई देने लगी है। नई लोकसभा में जो सीटें बढाई गयी हैं उन्हें 2026 में परिसीमन से भरा जाना है। ऐसे में दक्षिण के नेताओं को कई तरह का डर सता रहा है।

Delimitation 2026 panic over Delimitation in southern states after new parliament

Delimitation 2026: भाषा और संस्कृति के रूप में दक्षिण भारत का उत्तर भारत से विरोध बहुत पुराना है किन्तु अब इसमें राजनीति का तड़का भी लगने वाला है। दरअसल, नए संसद भवन के उद्घाटन के बाद यह संभावना जताई जा रही है कि 2026 में प्रस्तावित परिसीमन के चलते संसद में दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों की अपेक्षा कम हो जाएगा।

2019 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा में 1000 सीटें करने की मांग की थी। नई संसद के उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा कि आने वाले समय में लोकसभा की सीटें बढ़ेंगी। वहीं राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और भाजपा से राज्यसभा सांसद सुशील मोदी भी परिसीमन की बात कर रहे हैं। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि 2026 में परिसीमन किया जा सकता है।

वैसे भी जनसंख्या के आधार पर लोकसभा की सीटों की संख्या वर्तमान में अप्रासंगिक है और इसमें बढ़ोतरी समय की मांग है किन्तु यही जनसंख्या अनुपात अब दक्षिण भारत के राज्यों के लिए गले की फांस बन गया है। पिछले चार दशक में हिंदीभाषी राज्यों में जनसंख्या बढ़ी है जबकि दक्षिण भारत के राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतर कार्य हुआ है। ऐसे में जनसंख्या अनुपात के आधार पर परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों में लोकसभा सीटें हिंदीभाषी राज्यों की अपेक्षा कम बढ़ेंगी। इसी कारण दक्षिण भारत के राज्यों में अभी से विरोध के स्वर प्रबल होने लगे हैं।

दक्षिण भारत के नेताओं का मानना है कि बेहतर स्वास्थ्य, उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसरों की अधिकता के बावजूद संसद में उनका प्रतिनिधित्व न बढ़ना उनके साथ अन्याय है। हालांकि संभावित परिसीमन के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार सदन में 550 से अधिक निर्वाचित सदस्य नहीं हो सकते। फिर अभी 2021 की जनगणना भी नहीं हुई है। यदि परिसीमन आवश्यक है तो सरकार को पहले जनगणना करानी पड़ेगी। यदि 2021 की जनगणना नहीं होती है तो वह 2011 की जनगणना को आधार मानकर परिसीमन करा सकती है किन्तु इससे भी दक्षिण भारत के राज्यों के साथ अन्याय होगा।

क्या होता है परिसीमन?

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    लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों की सीमाओं के पुनर्निर्धारित कार्य को परिसीमन कहा जाता है जिसका उद्देश्य है परिवर्तित जनसंख्या का समान प्रतिनिधित्व तय करना। उक्त प्रक्रिया के चलते लोकसभा में अलग-अलग राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या तथा विधानसभाओं की कुल सीटों की संख्या में परिवर्तन आ सकता है। परिसीमन से भौगोलिक क्षेत्रों का विभाजन इस आधार पर किया जाता है कि चुनाव में किसी राजनीतिक दल को अन्य के मुकाबले अनुपयुक्त लाभ न मिले।

    परिसीमन का कार्य एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है और इसके आदेश को अंतिम माना जाता है, जिस पर किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। ऐसा माना जाता है कि यदि इसे चुनौती दी गई तो यह अनिश्चितकाल के लिए चुनावों को बाधित करेगा जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठप कर देगा।

    भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, देश में ऐसे परिसीमन आयोगों का गठन 4 बार किया गया है -1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1963 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1973 में परिसीमन अधिनियम और 2002 में परिसीमन अधिनियम। वर्ष 1981 और 1991 की जनगणना के बाद परिसीमन का कार्य नहीं हुआ।

    2026 तक परिसीमन पर रोक क्यों?

    संविधान के अनुसार किसी राज्य को आवंटित लोकसभा सीटों की संख्या और राज्य की जनसंख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों के लिए एक समान होना चाहिए किन्तु इसी प्रावधान के चलते जनसंख्या नियंत्रण में फिसड्डी रहने वाले उत्तर भारत के राज्यों को संसद में अधिकाधिक सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है। जबकि परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाले दक्षिण भारत के राज्यों को अपनी सीटें कम बढ़ने का अंदेशा है।

    दरअसल, जनसंख्या के अनुपात में परिसीमन 1971 की जनगणना के बाद होना था जिसके लिए 1973 में परिसीमन अधिनियम का गठन हुआ किन्तु उस समय परिवार नियोजन को लेकर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा जो कार्यक्रम चलाये जा रहे थे उनका व्यापक प्रभाव दक्षिण भारत के राज्यों में हो रहा था। उस समय भी यह अंदेशा जताया गया था कि यदि जनसंख्या के अनुपात में परिसीमन हुआ तो दक्षिण भारत का संसद में प्रतिनिधित्व उत्तर भारत की अपेक्षा कम होगा। इस परिस्थिति को भांपते हुए इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान संविधान में संशोधन कर परिसीमन को वर्ष 2001 तक के लिए स्थगित कर दिया था। यद्यपि लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों की संख्या में परिवर्तन पर रोक को वर्ष 2001 की जनगणना के बाद हटा दिया जाना था किन्तु पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा एक अन्य संशोधन द्वारा इसे वर्ष 2026 तक के लिये स्थगित कर दिया गया।

    इस रोक को इस आधार पर उचित ठहराया गया कि 2026 तक देश में समान जनसंख्या अनुपात हो जाएगा जिससे दक्षिण भारत के राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व उत्तर भारत के राज्यों के बराबर होगा। अतः 2002 के परिसीमन अधिनियम ने मात्र पहले से मौजूद लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं का पुनः समायोजन करने के साथ ही आरक्षित सीटों की संख्या को पुनः निर्धारित किया।

    भाजपा के अजेय बनने के अंदेशे से सहमे दक्षिण भारत के राज्य

    वर्तमान संसद में दक्षिण भारत से कुल 129 सांसद चुनकर दिल्ली जाते हैं जिनमें कर्नाटक से 28, आंध्र प्रदेश से 25, तेलंगाना से 17, तमिलनाडु से 39 और केरल से 20 सांसद हैं। जबकि केवल उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से ही 134 सांसद चुनकर सदन में बैठते हैं। इसमें यदि राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, जम्मू, कश्मीर, लद्दाख को भी जोड़ लें तो इनकी कुल लोकसभा सीटें हो जाती हैं 244। इसमें महाराष्ट्र, गोवा, उत्तर-पूर्व के राज्यों सहित पश्चिम बंगाल और उड़ीसा को जोड़ा ही नहीं गया है, जो उत्तर, पूर्व या उत्तर पूर्व के राज्य कहे जाते हैं।

    ऐसे में आशंका है कि 2026 में जनसंख्या के अनुपात से परिसीमन के चलते लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 850 से अधिक होगी जिसमें हिंदीभाषी राज्यों की सदस्य संख्या में 85 प्रतिशत तो दक्षिण भारत के लोकसभा सदस्यों की संख्या में 42 प्रतिशत का इजाफा होगा। हिंदीभाषी राज्य भाजपा की ताकत बन चुके हैं। अकेले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के लोकसभा सांसदों की संख्या 110 है। भाजपा इन तीन राज्यों में बहुत मजबूत है। परिसीमन के बाद अगर सीटें बढती हैं तो उत्तर भारत में भाजपा के संख्याबल में वृद्धि होगी।

    अब दक्षिण में भाजपा सफल हो या न हो लेकिन उत्तर में उसकी सफलता दक्षिण की राजनीति को ही बेमतलब कर देगी। यही कारण है कि दक्षिण भारत के राजनीतिक दल परिसीमन की आहट से ही सहमे हुए हैं। उन्हें लगता है कि संसद में उत्तर का प्रतिनिधित्व बढेगा जिसके कारण आर्थिक रूप से उत्तर के मुकाबले समृद्ध होने के बावजूद राजनीतिक रूप से पिछड़ जाएगा।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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