Gender Equality: भारत में लैंगिक समानता के लिए दिल्ली अभी दूर है
Gender Equality: देश में जारी नारी सम्मान और अधिकार की बहस के बीच संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट सामने आयी है। इस रिपोर्ट का नाम है द पाथ्स टू इक्वल (The Paths to Equal)। यह रिपोर्ट पिछले माह जून में आयी विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की रिपोर्ट, 2023 के ठीक एक महीने बाद आयी है जिसमें कहा गया था कि लैंगिक समानता के मामले में भारत 146 देशों में से 127वें स्थान पर है जो कि 2022 की तुलना में आठ स्थानों का सुधार दर्शाता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट "द पाथ्स टू इक्वल" ने भारत में महिलाओं से जुड़े कई चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए हैं।
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में केवल एक प्रतिशत महिलायें उन देशों में रहती हैं जहां हम उच्च महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता दोनों को एक अच्छी दशा में देखते हैं। यह अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है जो महिलाओं और लड़कियों के मानव विकास में हुई प्रगति का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसे संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों, संयुक्त राष्ट्र महिला और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा संयुक्त रूप से बनाया गया है।

18 जुलाई, 2023 को किगाली, रवांडा में आयोजित वीमेन डिलीवर कॉन्फ्रेंस में जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि नेतृत्व और निर्णय लेने की भूमिका समाज में अभी भी ज्यादातर पुरुषों के पास ही है और महिलाएं कई जगहों पर इन भूमिकाओं से बिल्कुल ही अछूती हैं और बहुत जगह नाम मात्र की भागीदारी को लिए हुए हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के मामले में भारत की वैश्विक स्थिति दयनीय है और यह "पिछड़े देश" की श्रेणी में आता है। जीजीपीआई यानी वैश्विक लिंग समानता सूचकांक में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भारत में महिलाओं की भागीदारी का आंकलन किया गया है। इसके अनुसार 2023 में संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 14.72 प्रतिशत है वहीं स्थानीय सरकार में उनकी भागीदारी 44.4 प्रतिशत है।
इसी तरह यदि शिक्षा की बात करें तो जहां 2022 में केवल 24.9% महिलाओं ने माध्यमिक या उच्चतर शिक्षा हासिल की थी वहीं पुरुषों में यह आंकड़ा 38.6% दर्ज किया गया था। 114 देशों से लिये गये डेटा आंकलन के अनुसार महिलाएं अपनी शारीरिक और बौद्धिक क्षमता का मात्र 60 प्रतिशत ही उपयोग कर पाती हैं और पुरुषों की तुलना में 28% कम उपलब्धि को प्राप्त करती हैं।
भारत ही नहीं पूरा विश्व ही जेंडर असमानता की समस्या से जूझ रहा है। यह सच है कि नारी अब भी समाज में, परिवार में, आर्थिक व्यवस्था में अपनी निर्णायक भूमिका के रूप में स्वीकृति के लिए लड़ाई लड़ रही है। इस सृष्टि में प्राण संचार का माध्यम बनने वाली स्त्री अभी भी अपने लिए यथोचित सम्मान के लिए जूझ ही रही है। इस रिपोर्ट ने स्त्री पुरुष के बीच की इस खाई को पाटने के लिए कुछ सुझाव भी दिये हैं।
1. महिलाओं के खिलाफ हिंसा: महिलाओं के प्रति हो रहे शारीरिक, मानसिक, यौन और भावनात्मक हिंसा के रोकथाम, सामाजिक मानदंडों को बदलने और भेदभावपूर्ण कानूनों और नीतियों को खत्म करने के उपायों को लागू करने की आवश्यकता है।
2. कार्य-जीवन संतुलन और पारिवारिक सुविधाओं का समर्थन: ऐसी नीतियों और सेवाओं पर ध्यान देने की जरूरत है जो कार्य-जीवन संतुलन को बढ़ावा देती हो। कामकाजी महिलाओं के बच्चों की उचित देखभाल के लिए सस्ती सुविधाएं उपलब्ध हों। माता-पिता के लिए छुट्टियों की सरल योजनाएं उपलब्ध हों और महिलाओं के लिए काम के घण्टों में लचीलापन रखा जाए।
3.स्वास्थ्य नीतियां: महिलाओं के स्वास्थ्य, विशेष रूप से यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत है। महिलाओं के लंबे और स्वस्थ जीवन का समर्थन और प्रचार करने के लिए सरकारी व्यवस्थाओं को प्रतिबद्धता दिखानी होगी।
4. महिलाओं की समान भागीदारी: सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों में लैंगिक समानता हो। महिलाओं को पीछे रखने वाले भेदभावपूर्ण कानूनों और नियमों को समाप्त करना जरूरी है।
5. शिक्षा में समानता: डिजिटल युग में महिलाओं और लड़कियों को शैक्षणिक रूप से सशक्त बनाने के लिए विशेष योजनाओं की जरूरत है।
ध्यान देने योग्य यह भी है कि विश्लेषण किए गए 114 देशों में से 85 में महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता निम्न या मध्यम स्तर पर है और मज़ेदार बात यह कि इस समूह के आधे से अधिक देश मानव विकास श्रेणी में उच्च (21 देश) या बहुउच्च समूह (26 देश) में आते हैं। कितनी विचित्र बात है न कि जिन देशों में मानव विकास अग्रणी है उन देशों में भी महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता अधर में है।
भारत जहाँ वर्तमान में राष्ट्रपति पद पर एक आदिवासी महिला हैं और यह इस देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति हैं, उस देश ने महिला प्रधानमंत्री भी विश्व को दिया है। वहीं अमेरिका जैसा विकसित और लैंगिक समानता को धरातल तक बहुत हद तक लाने वाला देश भी अभी तक सर्वोच्च पद पर महिला को नहीं बैठा पाया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में लैंगिक भेदभाव नहीं है। भारत में आज भी दहेज़, यौन हिंसा से जूझती लड़ती महिला यदि उच्च शिक्षा प्राप्त कर किसी पद पर बैठ भी जाती है तो उसे आर्थिक स्वतंत्रता और कार्य स्थल पर भी निर्णायक की भूमिका के रूप में स्वीकृति का संघर्ष करना पड़ता है।
हम एक ऐसे समाज हैं जहाँ मणिपुर, बंगाल जैसी घटनाएं घटित हो रही हैं। ऐसे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि देश की महिलाओं ने समानता के मानक तो कुछ सीमा तक पाएं है लेकिन समाज में पुरुष वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए दिल्ली अभी दूर है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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