Arvind Kejriwal: राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदने में लगे केजरीवाल

अरविन्द केजरीवाल ऐसे राजनेता हैं जो समान रूप से भाजपा और कांग्रेस दोनों को चुनौती पेश कर रहे हैं। ऐसे में मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से वो हताश होने की बजाय नयी योजनाओं के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

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Arvind Kejriwal: अपने सियासी सफर के खासमखास साथी मनीष सिसोदिया और सतेंद्र जैन के भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाने के बाद भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हौसले में फर्क पड़ता नज़र नही आ रहा और न ही वह परिस्थितियों के आगे हार मानने को तैयार हैं। बल्कि अब भी नुकीले सियासी दांव पेंच से भारतीय जनता पार्टी को ' तू डाल डाल, मैं पात पात' के अंदाज से निपटने में लगे हैं।

नया प्रकरण दिल्ली सरकार की ओर से पहली मार्च को जारी अधिसूचना है। यह मुख्यमंत्री की सहमति से प्रशासनिक स्तर पर जारी की गई है। उसमें गिरफ्तार हुए मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन के नाम को बिना विभाग के मंत्री के तौर पर मंत्रिमंडल में शामिल रखा गया है। यह अधिसूचना दिल्ली के एलजी कार्यालय के लिए मुश्किल का सबब बन गया है। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उप राज्यपाल से विधायक आतिशी मार्लिना और सौरभ भारद्वाज का नाम भेजकर अनुरोध किया है कि दोनों को नए मंत्री के तौर पर शपथ दिला दी जाए। दिल्ली सरकार में सिर्फ सात मंत्री ही होने की संवैधानिक बाध्यता है। लिहाजा, नए मंत्रियों को शपथ दिलाने के लिए अधिसूचना में रिक्त पद दिखाए जाने की अनिवार्यता है।

उटपटांग सी लग रही यह अधिसूचना कानूनी सलाहकारों की नज़र में विधिसम्मत है। वैधानिक रूप से दिल्ली के किसी मंत्री का इस्तीफा मंजूर करने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को है। जब तक राष्ट्रपति कार्यालय से इस्तीफा मंजूर करने की अधिसूचना जारी नहीं होती तब तक उसका नाम मंत्रिमंडल में शामिल रखना कानून सम्मत है। पहली मार्च तक राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से गिरफ़्तार मंत्रियों के इस्तीफे मंजूर किए जाने की कोई सूचना सार्वजनिक नहीं हुई है लिहाजा उनका नाम दिल्ली सरकार की अधिसूचना में मुख्यमंत्री ने शामिल रखा है।

मुख्यमंत्री केजरीवाल को कानून की आड़ में फेंकी गई नई सियासी गुगली के मारक असर का पता है। लिहाजा मुख्यमंत्री ने मीडिया के समक्ष मुस्कुराते हुए कहा कि नए मंत्रियों की शपथ की तारीख हासिल करने में बीस से पच्चीस दिन का समय लग सकता है। नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण के बाद ही इनके बीच विभागों का बंटवारा किया जायेगा। केजरीवाल का सियासी चकल्लस है कि घोषणा के बावजूद आतिशी और सौरभ को फिलहाल मिनिस्टर इन वेटिंग ही रहना होगा।

यह मीडिया में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से जेल गए दोनों मंत्रियों के त्यागपत्र कबूल होने की हंगामेदार उद्घोषणा के बाद की स्थिति है। अब जब राष्ट्रपति कार्यालय से जेल में बंद दिल्ली सरकार के मंत्री सिसोदिया और जैन के इस्तीफे को मंजूर करने की सूचना जारी होगी, फिर मुख्यमत्री कार्यालय की ओर से फिलहाल बिना विभाग मंत्री दिखाए गए दोनों का नाम हटाकर नई अधिसूचना जारी की जाएगी। तब जाकर उप राज्यपाल के लिए दो नए मंत्रियों को शपथ दिलाने का अवसर आयेगा।

केजरीवाल के इस गेमप्लान से जुड़े कुछ आशावादियों की समझ है कि यह विश्वस्त साथी सिसोदिया और जैन के लिए कुछ और समय तक मंत्री पद खाली रखने की चाल है। इस दरम्यान वकीलों की मजबूत दलीलों से न्यायालय अगर मेहरबान हुआ तो सिसौदिया और जैन को जमानत मिल सकती है। जमानत मिलते ही दोनों को तत्काल मंत्री पद लौटाया जा सकता है।

जमानत मिलने की उम्मीद में साढ़े आठ महीने तक मंत्री सतेंद्र जैन से इस्तीफ़ा नहीं लिया गया था। वह आर्थिक अपराध के लिए ईडी के शिकंजे में फंसे हैं। जेल में उनके लिए उपलब्ध सुविधापूर्ण जीवन की लीक हुई वीडियो ने जमानत की आस को धूमिल कर रखा है। इसी तरह मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के साथ ही सीबीआई को अदालत से पांच दिनों का रिमांड हासिल करने में कोई मुश्किल नहीं आई। उसे देखते हुए आने वाले दिनों में मनीष की मुश्किल और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। सबसे मजबूत साक्ष्य आबकारी घोटाले के सबूतों को मिटाने की कोशिश का है। साथ ही अधिकारी अनिल अरोड़ा का 164 का बयान है। जिसे अदालत ने शराब घोटाले में मंत्री सिसोदिया की संलिप्तता का ठोस सबूत मान रखा है।

गौरतलब है कि 28 दिसंबर 2013 को आम आदमी पार्टी ने पहली बार दिल्ली में सरकार बनाई थी। अब यह सवा नौ साल बाद मार्च 2023 का वक्त है जब आप को उन्हीं आरोपों ने अपने आगोश में समेट लिया है जिसके खिलाफ लड़ती हुई दिखते हुए उसने सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान उसने अद्भुत प्रयोग से सबको बताने की कोशिश की कि इश्क और राजनीति में सब कुछ जायज़ है। दिल्ली के बाद पंजाब में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हटाकर सरकार में बैठ गईं है। गुजरात में भाजपा को झटका देने की फिराक में रही। अब जब 2024 में लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के खिलाफ मजबूत विपक्ष को उतारने की कोशिश हो रही है तो उसमें केजरीवाल नई संभावना टटोल रहे हैं। यह संभावना उनको फिलहाल राजनीति में बचाए रखने की उम्मीद से जुड़ी है।

केजरीवाल अकेले हैं जिन्हें भाजपा और कांग्रेस समान रूप से पसंद नहीं कर रहे। अर्थात वह विपक्ष में तीसरा मोर्चा की संभावना तलाश रहे हैं। यह एक संयोग है कि शराब घोटाले की बढ़ती जांच ने उनको तेलंगाना के मुख्यमंत्री सी चंद्रशेखर राव के नज़दीक पहुंचा दिया है। सबूतों के आधार पर दिल्ली शराब घोटाले में तेलंगाना के मुख्यमंत्री की बेटी के. कविता सीबीआई की राडार पर है। समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव आम आदमी पार्टी के खड़े होने में पुराने मददगार हैं। यह एक ऐसा कोण है जो 2024 लोकसभा चुनाव में गैर भाजपा, गैर कांग्रेस दलों के गठजोड़ बन जाने का त्रिकोण बन रहा है।

यही उम्मीद है कि विरोधियों की नजर में चक्रव्यूह में बुरी तरह फंसे होने के आंकलन के बावजूद आईआईटी ग्रेजुएट और पूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी के जीनियस माइंड का फिरकी अंदाज बरकरार है। केजरीवाल सियासत में ऊंची उड़ान की उम्मीद छोड़ते नज़र नही आ रहे। एकला चलो की नीति पर आगे बढ़ते हुए वह पूरे दम के साथ केंद्र में सत्तारुढ़ भाजपा और प्रतिपक्षी कांग्रेस से पार पाने के लिए आड़ी तिरछी राह बनाने में लगे है।

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    नए सियासी संकट में जब सब मानकर चल रहे हैं कि केजरीवाल किला बचाने के लिए दिल्ली में सिमटकर रह जायेंगे तब वह दिल्ली के बाहर सक्रिय होने का रोडमैप तय कर रहे हैं। दिल्ली और पंजाब सरकार की बड़ी प्रचार राशि के साथ वह राष्ट्रीय मीडिया टीम को राष्ट्रव्यापी अभियान पर साथ ले चलने की नई दावत दे रहे हैं। मुश्किल घड़ी में इतना धीरज और योजनापूर्ण तरीके से बाहर निकलने का साहस शायद ही किसी राजनेता में झलका हो।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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