CWC Elections: सीडब्ल्यूसी जो कभी कांग्रेस की सर्वोच्च संस्था होती थी

सीताराम केसरी के बाद नेहरू परिवार से बाहर मल्लिकार्जुन खड़गे पहले कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए हैं। लेकिन कांग्रेस सोनिया, राहुल, प्रियंका की छत्रछाया में ही काम कर रही है, मल्लिकार्जुन खड्गे नाममात्र के अध्यक्ष हैं।

Congress Working Committee cwc which was once the apex body of Congress

CWC Elections: सवाल यह खड़ा हो रहा है कि लंबे समय के बाद नेहरू परिवार से बाहर से बने कांग्रेस के नए अध्यक्ष को पार्टी संविधान के मुताबिक़ कांग्रेस चलाने दी जाएगी या नहीं| नेहरू परिवार के प्रभाव से बाहर निकल कर कांग्रेस पार्टी अपने आप कुछ फैसले कर पाएगी या परिवार को पार्टी पर हावी रखने के लिए संविधान संशोधन किया जाएगा| 1998 में जब सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थी, तब से कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के चुनाव नहीं हुए, तो क्या अब चुनाव होंगे? क्या मल्लिकार्जुन खड़गे उसी तरह चुनाव करवा पाएंगे, जैसे सीताराम केसरी और नरसिंह राव ने करवाए थे?

Congress Working Committee cwc which was once the apex body of Congress

लेकिन इस बारे में खबरें उत्साहवर्धक नहीं हैं। खबरें आ रही हैं कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी को सीडब्ल्यूसी का स्थाई सदस्य बनाने के लिए संविधान संशोधन की सिफारिश कर दी गई है| अंबिका सोनी की अध्यक्षता में बनाई गई संविधान संशोधन कमेटी ने यह सिफारिश की है| यह कमेटी मल्लिकार्जुन खड़गे ने बनाई थी या उनसे बनवाई गई थी, यह शोध का विषय है|

इतना ही नहीं, खबरें तो ये भी आ रही हैं कि मल्लिकार्जुन खड़गे की इच्छा के खिलाफ कांग्रेस के अधिवेशन में उन्हें ही निर्वाचित सदस्यों को भी मनोनीत करने का अधिकार दे दिया जाएगा| अगर मल्लिकार्जुन अड़ गए तभी चुनाव होंगे| सोनिया गांधी और राहुल गांधी के समय से सीडब्ल्यूसी को मनोनीत करने की परंपरा चल रही है| वैसे संविधान के मुताबिक़ सीडब्ल्यूसी के आधे सदस्य निर्वाचित और आधे मनोनीत होते हैं|

कांग्रेस अपने भीतर के लोकतंत्र का दिखावा करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष पद का डमी चुनाव करवा देती है, बाकी सब मनोनयन प्रणाली से ही होता है| कांग्रेस के सारे नेता यह जानते हैं कि मनोनयन प्रणाली से ही आज कांग्रेस की यह दुर्दशा हुई है| राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद इस प्रणाली को समाप्त करने की कोशिश की थी, लेकिन नेहरू के जमाने से शुरू हुई कांग्रेस की चापलूसी परंपरा के कारण सफल नहीं हुए|

भले ही कांग्रेस की कार्यसमिति के चुनाव की अखबारों में हमेशा चर्चा होती है, लेकिन किसी अन्य राजनीतिक दल के ऐसे लोकतंत्र की चर्चा भी नहीं होती| इसका कारण यह है कि कांग्रेस का संविधान पार्टी में लोकतंत्र की गारंटी देता है| बाकी राजनीतिक दलों में इस तरह चुनाव का संविधान ही नहीं है| आज़ादी से पहले जब कांग्रेस एक राजनीतिक दल न होकर एक आन्दोलन था, तब जमीनी लोगों को साथ जोड़ने की दृष्टि से संविधान बनाया गया था| जिसमें ब्लाक इकाईयों और जिला इकाईयों के अलावा प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के सदस्य भी चुने जाते हैं|

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के करीब 10,000 सदस्य कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनते हैं और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के करीब 1200 सदस्य राष्ट्रीय कार्यसमिति का चयन करते हैं| हालांकि इस चयन प्रक्रिया के लिए प्रदेश रिटर्निग अफसर (पीआरओ) और अतिरिक्त प्रदेश रिटर्निग अफसर (एपीआरओ) हर बार नियुक्त किए जाते हैं, वे अपने तय क्षेत्रों में जाते हैं और एक लाईन का प्रस्ताव पास करवा कर दिल्ली को रिपोर्ट कर देते हैं|

ब्लाक कांग्रेस कमेटियों और जिला कांग्रेस कमेटियों के साथ साथ पीसीसी और एआईसीसी सदस्यों के चुनाव भी बंद कर दिए गए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदेश ईकाईयों का गठन करता है इसके बाद मनोनीत प्रदेश अध्यक्ष ब्लाक कांग्रेस कमेटी, जिला कांग्रेस कमेटी, पीसीसी सदस्यों और एआईसीसी सदस्यों की सूची बना कर राष्ट्रीय अध्यक्ष को भेजता है, जिसे दिल्ली से मंजूरी दे दी जाती है|

आज़ादी के बाद कांग्रेस संगठन में एक बड़ा बदलाव आया था| आज़ादी से पहले कांग्रेस के दो अध्यक्ष हुआ करते थे| कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के 15 निर्वाचित सदस्य होते थे, उनमें से एक कार्यकारी अध्यक्ष होता था| कांग्रेस अध्यक्ष को पीसीसी सदस्य चुनते थे| कांग्रेस कार्यसमिति ज्यादा पावरफुल थी, और कार्यकारी अध्यक्ष ज्यादा सक्रिय होता था| सरदार पटेल के देहांत के बाद कांग्रेस धीरे धीरे जवाहर लाल नेहरू के इशारों पर चलने लगी, हालांकि इंदिरा गांधी के जमाने तक प्रदेश कांग्रेस कमेटियां और सीडब्ल्यूसी ताकतवर होती थीं|

1969 में कांग्रेस विभाजित हो गई, क्योंकि इंदिरा गांधी कांग्रेस को अपनी मर्जी से चलाना चाहती थीं, जबकि के.कामराज, प्रफुल्ल चन्द्र सेन, अजय मुखर्जी और मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज जमीनी नेता कांग्रेस को उनकी बपौती नहीं बनने देना चाहते थे| इन्हें सिंडिकेट और इंदिरा गांधी के समर्थकों को इंडिकेट कहा गया| 1969 के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस में विभाजन होने के बाद अंतिम वक्त में कांग्रेस कार्यसमिति में चन्द्रशेखर समेत दस सदस्यों का सर्वसम्मति से चुनाव हुआ था|

विभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी का नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस (आर) और चुनाव निशान गाय बछडा रखा| 1970 कांग्रेस (आर) का नाम बदल कर कांग्रेस (आई) रखा गया, जो बाद में चुनाव आयोग की इजाजत से मूल नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस हो गया| जबकि विभाजन के बाद असली कांग्रेस का नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस (ओ) हो गया। कांग्रेस का मुख्यालय 7, जन्तर मन्तर कांग्रेस (ओ) के कब्जे में रहा, जबकि इंदिरा गांधी ने अपनी इंदिरा कांग्रेस के नाम पर 24 अकबर रोड अलॉट करवा लिया| आपातकाल के बाद जब कांग्रेस (ओ) का जनता पार्टी में विलय हो गया तो 7, जन्तर मन्तर जनता पार्टी का मुख्यालय बन गया| अभी वहां जेडीयू का मुख्यालय है|

राजीव गांधी की हत्या के बाद जब नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था, तो उनकी रहनुमाई में 1992 में तिरुपति में हुए कांग्रेस अधिवेशन में आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव हुए थे| लेकिन नरसिम्हा राव ने कांग्रेस कार्यसमिति के चुनावों को यह कहते हुए नकार दिया गया था कि उसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला था| राव की इस तिकडम से निर्वाचित सीडब्ल्यूसी सदस्यों को इस्तीफे देने पड़े थे। हालांकि इसका असली कारण यह था कि नरसिंह राव के उम्मीदवार हार गए थे, जबकि उनके विरोधी गुट के अर्जुन सिंह, शरद पवार और राजेश पायलट चुनाव जीत गए थे|

निर्वाचित सीडब्ल्यूसी को भंग करके नरसिंह राव ने खुद ही सीडब्ल्यूसी बना दी थी, जिनमें जीते अर्जुन सिंह और शरद पवार को मनोनीत कोटे में और हारे हुए सदस्यों को निर्वाचित कोटे में रखा गया था| तो इस तरह से नरसिंह राव के जमाने में बनी सीडब्ल्यूसी भी एक तरह से फ्राड थी|

कांग्रेस कार्यसमिति के असली चुनाव 1997 में सीताराम केसरी के जमाने में कोलकाता अधिवेशन में हुए| जिसमें अहमद पटेल, जितेंद्र प्रसाद, माधवराव सिंधिया, तारिक अनवर, प्रणब मुखर्जी, आरके धवन, अर्जुन सिंह, गुलाम नबी आजाद, शरद पवार और कोटला विजया भास्कर रेड्‌डी जीते थे| तो कायदे से देखा जाए, तो सिर्फ 1997 में एक बार ही सीडब्ल्यूसी के चुनाव हुए| इसी चुनी हुई सीडब्ल्यूसी और उनके द्वारा मनोनीत सदस्यों ने सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटा कर सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया था|

सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कभी भी सीडब्ल्यूसी का चुनाव नहीं हुआ| हालांकि प्रस्ताव पास कर के सीडब्ल्यू के सदस्यों की संख्या 25 कर दी गई, जिनमें से 12 निर्वाचित होने चाहिए और 12 मनोनीत| लेकिन 1998 से मनोनयन प्रणाली ही चल रही है| अगर चुनी हुई सीडब्ल्यूसी होती तो वह सोनिया गांधी से सवाल जरुर पूछती कि उन्होंने पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले अपने आप या राहुल गांधी के कहने पर मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह को कैसे हटा दिया था|

2019 में जब कांग्रेस ने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला किया था, तो उसका विरोध करने वाले मुम्बई प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष संजय निरुपम ने कहा था कि ऐसी सीडब्ल्यूसी को भंग कर दिया जाना चाहिए, जिसने शिवसेना के साथ गठबंधन की इजाजत दी है|

सीताराम केसरी के बाद नेहरू परिवार से बाहर मल्लिकार्जुन खड़गे पहले कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए हैं। वह भी तब जब सोनिया गांधी के परिवार ने अध्यक्ष नहीं बनने का फैसला किया। लेकिन कांग्रेस सोनिया, राहुल, प्रियंका की छत्रछाया में ही काम कर रही है, मल्लिकार्जुन खड्गे नाममात्र के अध्यक्ष हैं|

इस परिवार के लिए कांग्रेस के संविधान को फिर बदला जा रहा है। नया संशोधन यह किया जा रहा है कि सभी पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य होंगे| यानी सोनिया गांधी और राहुल गांधी सीडब्ल्यूसी के स्थाई सदस्य हो जाएंगे, उन्हें कभी भी सीडब्ल्यूसी से हटाया नहीं जाएगा| लोकलाज के लिए इसमें संसदीय दल की नेता और और दोनों सदनों में कांग्रेस के नेताओं को भी शामिल किया जाएगा, ताकि विवाद न हो।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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