The Kerala Story: आंकड़ों पर शोर मचाकर समस्या को अनदेखा करने की कोशिश
द केरला स्टोरी फिल्म के आंकड़ों का बहाना बनाकर कुछ खास विचारधारा वाले लोग मूल मुद्दे को ही झूठा साबित करने का प्रयास कर रहे हैं। जब समस्या स्वयं चीख चीखकर अपनी गवाही दे रही हो तो क्या यह संभव हो सकता है?

The Kerala Story: गुजरात दंगों के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री को अभिव्यक्ति की आजादी बताने वाले लेफ्ट लिबरल 'द केरला स्टोरी' को प्रोपेगैंडा फिल्म बता रहे हैं, और इस पर प्रतिबन्ध की मांग भी कर रहे हैं। यहां तक कि फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने को लेकर प्रतिबंधित संगठन पीएफआई के वकील रह चुके कपिल सिब्बल सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए कि माननीय न्यायालय एक बार फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ लें तो जान जाएंगे कि यह कितनी जहरीली है। यह समाज में वैमनस्यता फैलाने के लिए ही बनाई गयी है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने किसी भी प्रकार की आपात सुनवाई से इंकार कर दिया और कहा कि फिल्म को सर्टिफिकेट मिल चुका है और यह हेट स्पीच का मामला नहीं है।
दरअसल कुछ लोगों को समस्या उन आंकड़ों को लेकर है, जिसमें 32 हजार लड़कियों को लव जिहाद का शिकार बताया जा रहा था। अब निर्माताओं ने आंकड़ा उन्हीं 3 लड़कियों तक सीमित कर दिया है जो फिल्म की किरदार हैं। प्रश्न आंकड़ों पर हो सकते हैं, परन्तु प्रश्न इस बात को लेकर नहीं हो सकते हैं कि मजहबी लड़कों द्वारा लड़कियों का ब्रेन वाश नहीं किया जाता है। आये दिन लव जिहाद के लिए ब्रेनवॉशिंग की कोई न कोई घटना सामने आती ही है। इनमें ब्रेन वाश के नये नये तरीके सामने आते हैं। कई घटनाएं ऐसी सामने आती हैं जो चीख चीख कर उस षड्यंत्र को बता रही होती हैं जो गैर मजहबी लड़कियों के साथ किया जा रहा है।
लव जिहाद जैसा शब्द केरल के ईसाई समुदाय द्वारा ही लाया गया था और केरल के ही पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने यह कहा था कि पीएफआई 20 वर्षों में केरल को इस्लामी राज्य बनाना चाहता है। यही शशि थरूर जो आज 'द केरला स्टोरी' पर सवाल उठा रहे हैं वही थे जिन्होनें वर्ष 2021 में यह ट्वीट किया था कि उनसे कई लड़कियों की माताओं ने संपर्क किया है, जो अफगानिस्तान में अपने "मिसगाइडेड" शौहरों के कारण फंस गयी हैं।
समस्या के प्रति जागरूक होने के बाद भी आंकड़ों में फंसकर समस्या को नकारना लेफ्ट लिबरल्स के साथ-साथ उनकी भी आदत है जिन्हें उस वर्ग के वोट चाहिए होते हैं, जिनके लिए मजहबी कट्टरता ही समर्थन का आधार है। वह लोग केरल की उस महिला की कहानी पर विश्वास नहीं करेंगे जो इस ब्रेन वाश का शिकार होकर अफगानिस्तान में फंस गयी थी। निमिशा फातिमा की मां बिंदु संपत की भारत सरकार से गुहार कौन भूल सकता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी बेटी का ब्रेनवाश कर दिया गया था और फिर वह वर्ष 2017 में लापता हो गयी थी। बाद में वर्ष 2019 में उसने अफगानिस्तान सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। हालांकि बाद में उसके साथ क्या हुआ, वह किसी को नहीं पता है।
केरल की ही एक लड़की है श्रुति, जो उस ब्रेनवाश का जीता जागता उदहारण है, जो बेहद ही सुनियोजित एवं संगठित रूप से पीएफआई द्वारा किया जाता है। कैसे शैक्षणिक संस्थानों में साथ पढ़ने वाले बच्चे दूसरी लड़कियों को उनके धर्म के विषय में भ्रमित करते हैं, उनकी धार्मिक मान्यताओं पर प्रश्न उठाकर अपने मत को ऊंचा बताते हैं और एक ऐसा जाल रचते हैं कि लड़की अपने आप ही अपना धर्म छोड़ देती है। श्रुति के साथ किसी प्यार का मामला नहीं था। वह धार्मिक एवं सांस्कृतिक भ्रम का शिकार हुई थी। वह अपने परिवार द्वारा अपने धार्मिक प्रश्नों का उत्तर न दिए जाने की विवशता का शिकार हुई थी। श्रुति की कहानी के विषय में दिल्ली की लेखिका एवं अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा ने अपनी पुस्तक लव जिहाद में विस्तार से लिखा है।
श्रुति ने अपनी कहानी में बताया है कि जब वह कॉलेज में पहुंची थी तो उनकी मुस्लिम सहपाठिनें अधिकांशत: अपने रोजे, रमजान आदि की बातें करती थीं और उनसे उनके पर्वों के विषय में पूछती थीं। श्रुति का कहना था कि वह प्रश्नों के घेरे में फंस जाती थीं, चूंकि उन्हें बचपन से धार्मिक शिक्षा नहीं दी गयी थी। तब वह लगातार एक ऐसी दुनिया की ओर खिंचती गईं जहां पर काले बुर्के की कैद थी। श्रुति को उस कैद में आजादी दिखने लगी थी। श्रुति ने अपनी आत्मकथा में भी इस जाल के बारे में लिखा है और आज श्रुति अपनी तरह इसी जाल में फंसी लड़कियों को वापस लाने का कार्य कर रही हैं।
आज जब द केरला स्टोरी में उस जाल को दिखाया जा रहा है, तो लेफ्ट लिबरल या कांग्रेसियों को समस्या क्या है, यह समझ से परे है क्योंकि यह मुद्दा राजनीतिक, धार्मिक न होकर महिलाओं से जुड़ा हुआ है। यह उनके सम्मान, उनकी आजादी और सबसे बढ़कर उनकी सुरक्षा से जुड़ा हुआ मामला है। जो लोग इस फिल्म को प्रोपेगैंडा फिल्म बता रहे हैं क्या वो उस समस्या को अनदेखा कर सकते हैं जिसका सामना आज पूरा विश्व कर रहा है?
Brides of the Islamic State के नाम से यदि गूगल पर खोजा जाए, तो ऐसी तमाम लड़कियों की सूची सामने आएगी जिन्होनें अपना घर, अपना देश आईएसआईएस की ओर से लड़ने के लिए छोड़ दिया था। उसके बाद उन अभागी ब्रेनवाश हुई महिलाओं में किसी को उनके देशों ने अपनाया तो कईयों को उनके हाल पर छोड़ दिया।
कम उम्र में किया गया ब्रेनवाश एक वैश्विक समस्या है, जिसे उसी प्रकार देखा जाना चाहिए। जैसे निमिशा का ब्रेन वाश करके उसे फातिमा बनाया गया और उसकी मां बिंदु संपत ने लड़ाई लड़ी थी वैसे ही कोच्चि के वीजे सेबेस्टियन ने भी अपनी बेटी सोनिया उर्फ़ आयशा को अफगानिस्तान जेल से छुड़ाने की बात की थी। यह मामला भी सुर्ख़ियों में रहा था।
आंकड़ों पर शोर मचाकर समस्या को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसे शोर मचाने वाले भी समझते हैं और जानते हैं। परन्तु उनके राजनीतिक हित और वोटबैंक इसी बात पर निर्भर करते हैं कि वह लोग इस समस्या को नकारने में कितना श्रम कर सकते हैं।
यह दुर्भाग्य है कि राजनीतिक विमर्श उन लड़कियों की पीड़ाओं पर भारी पड़ रहा है जो एक ऐसे युद्ध का शिकार हो रही हैं, जिसका स्वरुप सभी को पता है। कैसे उन्हें मानसिक एवं शारीरिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है, वह भी सभी को पता है। जो घट रहा है वह सब देख रहे हैं। परन्तु विमर्श के धरातल पर क्या करना है, वह नहीं पता है।
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जो विभिन्न माध्यमों से ऐसे ब्रेनवाश के खिलाफ जागृति पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं, उन्हें आंकड़ों के जाल में फंसाकर झूठा साबित करने का प्रयास किया जा रहा है। द केरला स्टोरी का उपहास और उसे एजेंडा फिल्म ठहराना दरअसल सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक ध्वंस को नकारते जाने की प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया इतिहास, फिल्म, साहित्य आदि में दशकों से लेफ्ट लिबरल संचालित करते आ रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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