Cisco Caste Controversy: निराधार निकला अमरीका में भी जातिवाद होने का आरोप
अमरीका की सिस्को कंपनी में तीन साल पहले जातिवाद होने का आरोप लगाकर विवाद खड़ा किया गया था लेकिन जांच में यह आरोप ही फर्जी निकला।

Cisco Caste Controversy: आज जब दुनिया भर का काम काज कंप्यूटर नेटवर्क पर आधारित है तो सिस्को जैसी कंपनियों की पहुँच कहाँ तक होगी, इसका अनुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं। स्थिति ये होती है कि जो नेटवर्क को दुरुस्त, चालू हालत में रखने वाले इंजिनियर होते हैं, उनको भी सर्टिफिकेट सिस्को से ही लेना पड़ता है। ऐसी स्थिति में जब एक दिन अचानक सिस्को में काम कर रहे "सवर्ण" इंजीनियर्स सुन्दर अय्यर एवं रमन्ना कोम्पेल्ला पर जाति आधारित भेदभाव का आरोप लगा, वो भी अमेरिकी धरती पर, तो कॉरपोरेट जगत एक बारगी हिल गया।
जून 2020 में कैलिफोर्निया राज्य के "डिपार्टमेंट ऑफ फेयर एम्प्लॉयमेंट एंड हाउसिंग" ने सिस्को सिस्टम्स पर मुकदमा करते हुए कहा था कि एक भारतीय मूल के व्यक्ति ने ये शिकायत की है कि कंपनी में काम करने वाले दो भारतीय मूल के मैनेजर उसके साथ जाति आधारित भेदभाव कर रहे हैं। इस मामले की जब जांच हो रही थी तो दोनों आरोपियों के विरुद्ध सोशल मीडिया पर जहर उगलने वालों की एक बड़ी जमात उठ खड़ी हुई थी। उनकी तथाकथित ऊँची जातियों को लेकर भद्दी टिप्पणियों की मानो बौछार होने लगी। भारतीय जातीय ढांचे के मुताबिक छोटी जाति से आने के कारण हो रहे भेदभाव को कोम्पेल्ला ने विचित्र बताया। अदालत में उन्होंने अपना पक्ष रखा था। जांच में पता चला कि आरोपी और आरोप लगाने वाले, दोनों ने लगभग एक ही समय कंपनी में नौकरी शुरू की थी लेकिन कोम्पेल्ला का पद बढ़ा, जिससे तनख्वाह इत्यादि में तो अंतर नहीं आया लेकिन अब दूसरे व्यक्ति को कोम्पेल्ला को रिपोर्ट करना पड़ता था।
जातिवाद का आरोप लगाने वाले की सच्चाई यह थी कि वह समय पर काम पूरा करने में कोई रूचि नहीं दिखाता था। थोड़े दिन बाद जब सुन्दर अय्यर ने प्रोजेक्ट हेड का पद छोड़ा तो काम के अनुबंध के कारण उस पद की जिम्मेदारियां भी कोम्पेल्ला पर आ गयीं। इस तरक्की से नाराज व्यक्ति अपने दोनों सीनियर्स को एक झूठे अभियोग में फंसा रहा था।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये खबर चली, अख़बारों का शीर्षक बनी और फिर मुक़दमे के बाद जब सच का पता चला तो नजर आया कि इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं थी। जब जांच के बाद सुनवाई के दौरान केलिफोर्निया सिविल राइट्स डिपार्टमेंट को समझ में आया कि उनका मुकदमा तथ्यहीन है, तब 10 अप्रैल 2023 को उन्होंने स्वेच्छा से सुपीरियर कोर्ट से ये मामला वापस ले लिया। ये अलग बात है कि इस प्रक्रिया में अय्यर और कोम्पेल्ला को करीब तीन वर्ष मुकदमा और सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
कैलिफ़ोर्निया में जब ये आरोप लागाया गया था, वो दौर "ब्लैक लाइव्स मैटर" जैसे आंदोलनों का दौर भी था। कहा जा सकता है कि ट्रम्प की सत्ता को हिला देने में इस "ब्लैक लाइव्स मैटर" आन्दोलन का भी ख़ासा योगदान था। इससे जो अराजकता फैली थी, उसे तो विश्व भर के चैनलों पर देखा-दिखाया गया था। ऐसा कैसे हो पाया, इसे समझने के लिए अमेरिका में इस दौर में चल रही "क्रिटिकल रेस थ्योरी" को जानना भी ज़रूरी हो जाता है।
अमेरिकी "सिविल राइट्स" के दौर में, यानि करीब 1960 में इस "क्रिटिकल रेस थ्योरी" का उदय होना शुरू हुआ था। इसमें "क्रिटिकल" का अर्थ निंदा करना, आलोचना करना ही नहीं है, बल्कि ये अकादमिक जगत वाली "क्रिटिसिज्म" या आलोचना के अर्थ में जोड़ा गया है। बारीकी से जांच करना और गुण-दोष का विवेचन करना उद्देश्य है इसलिए "क्रिटिकल"। मोटे तौर पर इस विधा में कई अलग अलग विषयों को जोड़कर ये समझने का प्रयास किया जाता है कि समाज में जातियों में भेदभाव क्यों है और ऊंच-नीच, छुआछूत जैसे भाव कैसे पनपते हैं।
डेरिक अल्बर्ट बेल जैसे लेखकों ने लिखा है कि नस्लों या जातियों में बराबरी "असंभव दिवास्वप्न" जैसा है और अमेरिका में नस्लीय भेदभाव होगा ही। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के मुताबिक "क्रिटिकल रेस थ्योरी" अकादमिक जगत से बाहर आ चुकी है और सामाजिक-आर्थिक भेदभाव और विषमताओं को समझने के लिए इसका प्रयोग हो रहा है। कई मुद्दे जैसे गरीबी, पुलिस/सरकार द्वारा जुल्म, मताधिकार या मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों पर लेखों-भाषणों में इसका प्रयोग दिखने लगा है।
इस थ्योरी का प्रयोग चूंकि कथानक गढ़ने (नैरेटिव बनाने) में होने लगा है और माना जाने लगा है कि भोगा हुआ सत्य ही वास्तविक है, इसलिए कोई एक व्यक्ति अगर ये लिखता है कि उसे लगा कि उसके साथ जाति/नस्ल या गोरे/काले होने के आधार पर भेदभाव हुआ तो बाकी सभी बातें गौण हो जाती हैं। इसी बात को अंतिम सत्य मानकर आगे जांच शुरू होगी, और दूसरे पक्ष से ये तक नहीं पूछा जाता कि आखिर हुआ क्या था?
भारत में भी आये दिन ऐसे मामले देखने को मिलते रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में (9 जनवरी 2023) एक मामले में कहा कि सिविल के मामलों को एससी/एसटी एक्ट के क्रिमिनल मामलों में नहीं बदला जायेगा। इस मामले में पी भक्तवत्सलम ने एक खाली जमीन पर मकान बनवाया, जिसके बगल में बाद में एक मंदिर बना। पी भक्तवत्सलम द्वारा अवैध निर्माण करने की मंदिर बनाने वालों ने शिकायत की और जवाब में पी भक्तवत्सलम ने उन पर एससी/एसटी एक्ट का मुकदमा कर दिया। इसी की सुनवाई के दौरान माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने ये फैसला दिया कि इस तरह के परिवाद जब पहले से हो, तब एससी/एसटी एक्ट के क्रिमिनल केस नहीं किये जा सकते।
ये सब हमें इस बात पर ले आता है कि आखिर इस तरह के मामलों के सामने आने का समाज पर क्या असर होता होगा? ये बिलकुल आम बात है कि सोशल मीडिया की पहुंच बढ़ने के साथ साथ कई ऐसे ट्विटर हैंडल और सोशल मीडिया प्रोफाइल भी उभर आये हैं जो ऐसी "फाल्ट लाइन" (समाज की कमियों) को ढूंढकर उन्हें बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं। भारत सरकार की नींद भी इस मामले में हाल ही में खुली है।
एक समुदाय को दूसरे से धर्म-जाति के आधार पर लड़वा देने का प्रयास करने वाले विदेशों से नियंत्रित होने वाले कई प्रोफाइल्स पर प्रतिबन्ध भी लगे हैं। फिर भी इनकी एक अच्छी खासी संख्या भारत में ही मौजूद है और उनपर नियंत्रण नहीं किया गया है। आईटी एक्ट में परिवर्तन के जरिये पीआईबी (प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो) को तथ्यों की जांच (फैक्ट चेक) का जिम्मा देने की कोशिश भी मौजूदा सरकार ने की है। हाल तक कांग्रेस से जुड़े रहे कपिल सिब्बल ने इसका विरोध करते हुए अदालत में पहुँचने में भी कोई देरी नहीं की। ऐसा तब है जब सर्वोच्च न्यायलय ने आईटी एक्ट की जिस धारा 66ए को असंवैधानिक बताते हुए हटाया था, वो असंवैधानिक कानून खुद कपिल सिब्बल की रचना बताई जाती है।
इतने से केवल ये पता चलता है कि हमें प्रतिदिन जिन देशविरोधी ताकतों से निपटना होता है, उनकी पहुंच कहां तक है। उनके कुकर्मों से आम भारतीय का एक दूसरे पर जो विश्वास कम हो रहा है, उससे निपटने में ही संभवतः दशकों का समय लगेगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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