Congress on Hindutva: जनमानस को समझने में कांग्रेस ने फिर क्यों की चूक?
Congress on Hindutva: इसी हफ्ते जिस समय दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करके कांग्रेस के नेता जयराम रमेश अयोध्या के राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में न जाने का ऐलान कर रहे थे, ठीक उसी समय संघ और भाजपा के कार्यकर्ता पीला अक्षत और राम मंदिर का पर्चा लेकर यूपी में घर-घर पहुंच रहे थे। वो लोगों से आग्रह कर रहे थे कि 22 जनवरी को सब अपने घर पर कम से कम पांच दिए जलाएं और उत्सव मनाएं।

भाजपा और संघ की योजना है कि 22 जनवरी को गांव गांव में जो मंदिर हैं वहां कोई न कोई छोटा उत्सव किया जाए। इसके लिए स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि सामान्य रामभक्त हिन्दू भी योजनाएं बना रहे हैं, बैठकें कर रहे हैं। एक सामान्य हिन्दू के मन में अयोध्या के राम को लेकर वैसा कोई संशय नहीं है जैसा कांग्रेस, कम्युनिस्ट या समाजवादी पार्टी के नेताओं के मन में है। इसलिए उस दिन हर हिन्दू किसी न किसी रूप में इस दिन को उत्सव के रूप में मनाना चाहता है।
दूसरी ओर भाजपा/संघ की योजना जमीन पर ऐसी दिख रही है मानों वो नब्बे का माहौल फिर से पैदा करना चाहते हैं जब लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली थी। उस समय भी कांग्रेस जनता का मन भांपने में पूरी तरह असफल रही थी, आज भी वह पूरी तरह से असफल साबित हुई है। उस समय तक यूपी के ब्राह्मण, क्षत्रिय और मुस्लिम मोटे तौर पर उसके साथ थे। लेकिन महीनेभर की राम रथयात्रा के बाद एकतरफा सवर्ण जातियां भाजपा की ओर चली गयीं।
1985 में उत्तर प्रदेश में बहुमत से सरकार बनानेवाली कांग्रेस 1989 में 94 सीट पर आयी। 1991 में 46 और 1993 में 28 सीट पर आ गयी। यानी 1989 से कांग्रेस यूपी में जो लुढ़कना शुरु हुई तो 2022 के चुनाव में उसके सिर्फ 2 विधायक ही चुने गये। आज हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस यूपी की हर विधानसभा सीट पर ऐसे उम्मीदवार उतारने की हैसियत में नहीं है जो जीत न सकें तो कम से कम दूसरे नंबर पर ही आ जाएं। उम्मीदवार मिल भी जाएं तो रायबरेली, अमेठी जैसी कुछ जगहों को छोड़ दें तो हर बूथ पर एजेंट तक का अकाल पड़ गया है।
यूपी में कांग्रेस का यह पतन सीधे तौर पर राम मंदिर के लिए होनेवाली राजनीति से ही जुड़ा है। जब अटल बिहारी वाजपेयी ने अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया तो 1980 के दशक में कांग्रेस ने विवादित बाबरी मस्जिद के पक्ष में खड़ा होना इसलिए जरूरी समझा क्योंकि उसे लगता था कि यूपी में मुस्लिम उससे अलग नहीं होने चाहिए। उसका सारा प्रयास तब धरा का धरा रह गया जब मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या के रामभक्तों पर गोली चलवा दी और रातों रात मुस्लिम वोटर उनकी ओर घूम गया। अब कांग्रेस दोनों ओर से मात खा चुकी थी। न तो सवर्ण हिन्दू उसके साथ बचे और न ही मुस्लिम। कांशीराम ने उसी दौर में दलितों को कांग्रेस से दूर करना शुरु कर ही दिया था।
इस चौतरफा पराजय के बावजूद यूपी में कांग्रेस ने अपना 'सेकुलर अभियान' जारी रखा। बीजेपी की सरकारों को जगह जगह बर्खास्त करके एक बार फिर मुस्लिमों का दिल जीतने की कोशिश की गयी लेकिन यूपी के मुस्लिम कांग्रेस की ओर नहीं लौटे। जो लोग उस समय कांग्रेस की रणनीति बना रहे थे वो यह नहीं देख पा रहे थे कि अकेले मुस्लिम वोटर को बचाने के चक्कर में उसका सबसे मजबूत आधार ब्राह्मण और क्षत्रिय उनसे दूर होता जा रहा है क्योंकि वह राम के खिलाफ जानेवालों के साथ यूपी में खड़ा नहीं होना चाहता था।
उस समय भी कांग्रेस के सेकुलर नेताओं और कम्युनिस्ट समर्थकों द्वारा अपने द्वारा की जानेवाली राजनीति को ऐसे ही समझाने का प्रयास किया गया, जैसे आज किया जा रहा है। भाजपा को कम्युनल पार्टी घोषित कर दिया गया। सिर्फ घोषित ही नहीं किया गया बल्कि कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों द्वारा इस नैरेटिव को बहुत गहराई से लोगों में स्थापित करने का प्रयास भी किया गया।
कांग्रेस के नेता न उस समय यह बात समझ पाये और न आज समझ पा रहे हैं कि गलत उनके समर्थक और मतदाता नहीं हैं जो उनको वोट नहीं कर रहे हैं। गलत उनकी नीति और नीयत है जिसने कांग्रेस के शासन में सबसे प्रबल लाभार्थी रहे ब्राह्मण और क्षत्रिय समर्थकों को भी उससे दूर कर दिया।
कांग्रेस को यूपी में यह तो दिख रहा था कि अगर राम मंदिर के समर्थन में आयेगी तो मुस्लिम नाराज हो जाएंगे लेकिन यह नहीं दिख रहा था कि बदलते वातावरण में अगर उसने राम मंदिर का समर्थन नहीं किया तो उसके सवर्ण वोटर ही सबसे पहले उससे दूर हो जाएंगे। उसके बाद से देश में कहीं भी कांग्रेस आयी गयी हो लेकिन यूपी से जो गयी तो फिर जाती ही चली गयी।
उन दिनों भी कम्युनिस्ट पार्टियों का कांग्रेस नेतृत्व पर गहरा प्रभाव था और जनता दल से निकले सोशलिस्ट भी वैचारिक रूप से उस पर हावी रहते थे। निश्चित रूप से उस समय खुद को हिन्दू कहना भी सांप्रदायिक घोषित करने जैसा था। ऐसे में कांग्रेस भला क्योंकर हिन्दुत्व की राजनीति करती भले ही शाहबानो प्रकरण के बाद अयोध्या में राम मंदिर से उसे बैलेंस करने का राजनीतिक दबाव ही रहा हो।
लेकिन आज लगभग ढाई तीन दशक बाद जब देश का पूरा पोलिटिकल नैरेटिव बदल गया है। हिन्दुत्व अब राजनीति की मुख्यधारा बन गया है, उसके बावजूद भी कांग्रेस नेतृत्व अपना हिन्दू विरोधी नैरेटिव बदलने का नाम नहीं ले रहा है। जब जब अयोध्या में राम मंदिर का सवाल उठा तब तब उसने विरोध के लिए किसी न किसी बहाने का सहारा लिया। कभी सांप्रदायिकता का तो कभी हिन्दुत्व का।
अब कांग्रेस ने एक नया बहाना खोज लिया है कि 'धर्म व्यक्ति की निजी आस्था है' और वह हर किसी की आस्था का सम्मान करती है। लेकिन ऐसा वो तभी बोलते हैं जब बात हिन्दुओं से जुड़ी हो। ईसाई या मुस्लिम समुदाय की बात आते ही वो 'निजी आस्था' को अल्पसंख्यक अधिकार में बदलकर बहुसंख्यक हिन्दुओं के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
फिर सवाल यह भी है कि अगर धर्म निजी आस्था है तो फिर धार्मिक बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद क्या है? कांग्रेस के नेता और उसके समर्थक कम्युनिस्ट विचारक किस आधार पर धार्मिक अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का बंटवारा करते हैं? फिर तो हर प्रकार का धार्मिक मामला कांग्रेस के लिए निजी आस्था का ही प्रश्न होना चाहिए। उसे किसी समुदाय विशेष के हक या अधिकार के रूप में कैसे देखा जा सकता है?
लेकिन यही कांग्रेस का वह दोहरा चरित्र है जो यूपी में बेनकाब हो चुका है। कांग्रेस के भीतर यह दोहरा चरित्र विकसित किया है कम्युनिस्ट विचारकों और बुद्धिजीवियों ने। सोनिया गांधी हों, राहुल हों या फिर प्रियंका वाड्रा। ये सभी इसी दोहरे चरित्र के साथ अपने आपको सहज पाते हैं। वो कहते तो हैं कि वो राम मंदिर के विरोध में नहीं हैं लेकिन समर्थन में एक दीपक जलाना भी जरूरी नहीं समझते। उनके कम्युनिस्ट समर्थक उनको जो चालबाजियां सिखाते हैं कांग्रेस के शीर्ष नेता उस पर ही गुलाटियां खाते हैं। लेकिन वो भूल जाते हैं राम से दूरी ने उन्हें अभी यूपी से ही दूर किया है, कहीं ऐसा न हो कि पूरे उत्तर भारत से उनको मटियामेट कर दे।
कांग्रेस के भीतर हिन्दू धर्म की बात करना अब आरएसएस के एजेंट होने जैसा हो गया है। यह उसका हिन्दू विरोधी कम्युनल नैरेटिव उसे लगातार चोटिल कर रहा है लेकिन शीर्ष नेतृत्व इससे वापस लौटने को तैयार नहीं है। राहुल गांधी कम्युनिस्टों के प्रवक्ता की तरह कांग्रेस को वैचारिक लड़ाई की जगह बना रहे हैं जो कांग्रेस के अपने बुनियादी चरित्र के ही खिलाफ है। कांग्रेस विचारधाराओं का संगम थी, किसी एक विचारधारा की समर्थक या विरोधी नहीं। लेकिन जब से कांग्रेस पर विचारधारा की राजनीति करने का राजनीतिक रंग चढा है तब से वह लगातार चूक रही है।
एक बार अस्सी के दशक में वह चूकी तो यूपी से चुक गयी, इस बार की चूक में वह कहीं समूचे उत्तर भारत से ही न चुक जाए। कम से कम मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के भाई और कांग्रेस के पूर्व विधायक लक्ष्मण सिंह तो यही संकेत कर रहे हैं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए साफ कहा है कि "निमंत्रण ठुकराने का कोई कारण नहीं था। लेकिन अब तो जो निर्णय होना था हो चुका। इसका जो परिणाम होगा वो चुनाव के समय दिख जाएगा।"
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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